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दहेज़- बापू का dar

अरी ओ बडकी की अम्मा! मुंह मीठा कर, ब्याह तय हो गयालड़केवाले ने मोटरसाईकल , रंगीन टीवी, फ्रिज, दस भर सोना और कुल जमा 'पांच लाख' रुपये के लिए कहा हैअब सोच मतइंतजाम हो जाएगाहाँ री, मैंने घर को गिरवी रख दिया है ,न होगा तो बेच देंगे,अरे क्या रखा है इसमें याद है पिछली बरसात?पहली बारिश में ही हमारे इस कमरे की पूरी छत बरस पड़ी थी हाँ, रिश्तेदारों के पास भी दौड़ना होगा क़र्ज़ के लिएअब गाढे समय में वही तो काम आयेंगे भले ही मूल के साथ सूद भी मांगेंगे सुन तो,कल पी. ऍफ़. के लिए अर्जी दे दूंगाअब तो,पार्ट टाइम भी करना होगा,न न !अरे, डर मत!अब तबीयत को कुछ नहीं होगा'मरूँगा' भी नहींबेटी की शादी जो है सुन बडकी की अम्मा!छोटकी की पढाई रोकनी होगी ,कुछ सालों तक हाथ तंग रहेंगे न,समझा लेना उसे, अच्छा! बडकी की अम्मा !बस, कभी-कभी डर लगता है किइतने पर भी जो न हो सका दहेज़ पूरातो क्या हमारी बडकी को भी जलना होगाया गले में फंदा डालकर झूल जाना होगाऔर हमें इस संतोष के साथ जीना होगा किहमने तो अपनी बडकी का ब्याह कर दिया था न?कर दिया था न अपनी बडकी का ब्याह?
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आईनाआईना bal पत्रिका का लोकार्पण १४ नॉवेम्बर को हो गया। पत्रिका का मकसद बाल पत्रिकाओं की भीड़ में एक नया दावेदार खड़ा करना नही है क्योंकि यह एक nई क्रांति का सूत्रपात है, एक नया pरयोग है , एक नई पहल है। अबतक बड़े अपने विचारो को बचो पर थोप दिया करते थे, परंतु यहाँ बचों ने अपने लिए नयी रह तलाश ली है। वे अपनी पत्रिका में लिख रहे हैं, आपसे हमसे, अपने प्रश्नों का जवाब पूछ रहे हैं, नए नए विचार गढ़ रहे है। पत्रिका में बच्चो ने एक नया दायित्व लिया है समाज को एक दिशा देने का। पत्रिका का आधार आरा,बिहार जैसे छोटे से शहर में होनेवाला बाल महोत्सव बना, जहां बच्चों से बातचीत के दौरान उनमे एक बेचैनी दिखाई दी। ये वर्ग समाज के उन आयामो पर भी नज़र रखता ,जो हम बडो की नजरों से थे। यानि की इन बच्चो को एक ऐसे मंच की जरूरत थी,जहा वे खुलकर अपनी बाते कह सके.फिर क्या था नए साधन गरहे गए, नई राहे बनी और हम अपने बाल रचनाकारों के साथ सफर पर निकल पड़े। हमने नन्हे हाथो में लेखनी थमा दी है,अब इन रचनाकारों को आपके आशीर्वाद की जरूरत है। आप अपने बच्चो को भी इससे जोड़े और उन्हें इसमे लिखने के लिए प्रेरित करे।