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डोली में बिठाई के कहार

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हुनहुना रे हुनहुना, हुनहुना रे हुनहुना का समवेत स्वर ...........लाल जोड़े में शरमाई सकुचाई सी दुल्हन .......और डोली...... कैसा रूमानी सा दृश्य लगता है. है न!!!! डोली और दुल्हन........इनके बीच का नाता इतना गहरा है की एक का नाम लेते ही दूसरे का चित्र आँखों के सामने खिंच जाता है. कहारों के ललकारे व मधुर गीत, कंधे पर डोली और डोली में बैठी दुल्हन, जैसे किसी दूसरी दुनिया में ही ले जाते है ....... सपनो की दुनिया ........जिसे कभी हमने यथार्थ में भी देखा था. 
 मुझे याद है बचपन के वो दिन जब किसी के घर शादी होती तो बारात लगने और बिदाई होने का हम घंटों इंतजार किया करते थे ताकि डोलियों पर लुटाये जानेवाले पैसे हम लूट सकें. डोली हमारी समस्त उत्सुकता का केंद्रबिंदु होता था. उसमे बैठे दूल्हा और दुल्हन को पहले देख लेने की होड़ लगी रहती थी. डोलियों के पीछे दौड़ना हमारा प्रिये शगल था. वो वक़्त था कि दूल्हा अपनी दुल्हन से शादी करने डोली में बैठ कर ही जाता था और उसे डोली में बिठाकर घर लाता था. कई किलोमीटर की ये यात्रा कहारों के गीत, कहानियां और ललकारों से पल भर में कट जाती थी. शादी की कई परंपरा डो…