मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Monday, December 29, 2014

जाड़े की धूप
















(चंद पंक्तिया ) 

कुनमुनाई
अलस सुबह की
ठिठुरी धूप
*****
कुहरा घना
स्तब्ध पवन
सिकुड़ी धूप
*****
सूरज हंसा
अंगडाई लेकर
निखरी धूप
*****
अनमनी सी
खड़ी क्षितिज पर
विरही धूप
............स्वयंबरा 

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Monday, November 3, 2014

दरद न जाने कोए .....

कहते हैं
जिन्नाद ने पकड़ा है उसे
वो चीखती है, चिल्लाती है
अट्टाहास लगाती है
गुर्राती है, मुट्ठियाँ भींचती है
खरोंच डालती है खुद को
और कभी-कभी,
एकदम गुमसुम सी हो जाती है
चुप्पी बैठ जाती है होंठो पर
खारा पानी समूचे जिस्म पर छा जाता है
‘बाबा हो बाबा’ की गुहार लगाती है
उसकी चीत्कार से आकाश तक काँप उठता है
कहते हैं कि
यह जिन्नाद पड़ोस के उसी लडके का है
हाँ, तभी तो एक माह पहले
जब खेत के बीचोंबीच
उसकी कटी हुई लाश मिली थी
यह बदहवास सी भागती गयी थी वहाँ
और लौटी तो.......
तो वह थी ही नहीं भई
उसे तो जिन्नाद ने पकड़ लिया था  

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Wednesday, October 1, 2014

था एक धनुर्धर राम

सूर्य-प्रभ-सम आलोकित,
वह वीर धनुर्धर था अद्भुत,
रावण-तम का संहार किया,
पुरुषोत्तम जग में कहा गया .

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शर- संधान करो तुम
तम जन-मन का हरो तुम
माया मृग फिर छलने आया
अब तो हुंकार भरो तुम

     





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Friday, September 26, 2014

लडकी


लडकी,
बोल मत,
हंस मत,
देख मत,
सुन मत
ढांप खुद को,
खाना बना,
सफाई कर
और इन आवाज़ो से
थोडी सी फुरसत मिलते ही
लडकी
चुपके से
खोल देती है खिडकी
एक टुकडा धूप
और मुट्ठी भर हवा मे
अंगडाई लेकर
ठठाकर  हंस देती है
......स्वयम्बरा

Saturday, August 23, 2014

उर्मिला कौल : कुछ यादे

उर्मिला कौल......बचपन की यादे है धुंधली सी....मम्मी ‘मनोरमा’ पत्रिका लिया करती थी ....एक दिन उन्होने उसमे से एक फोटो दिखाया कहा कि ये उर्मिला आंटी का है .... इनकी लिखी एक कहानी छपी है...ये हमारे मुहल्ले मे ही रहती है...तस्वीर मे एक महिला शाल ओढे थी...मुस्कुराती हुई....बहुत सुंदर.....बाद मे बार एक बार मम्मी के साथ जाते हुए वे मिली...उन्होने मम्मी को घर मे बुलाया....मम्मी ने बताया कि ये वही है जिनकी कहानी छपी थी... .मै बहुत गर्व मह्सूस कर रही थी कि वो हमारे परिचितो मे है...उन्हे देर तक देखती रही... गौर वर्ण ......ऊंचा कद...प्रभावशाली व्यक्तित्व....बाद मे हमारे स्कूल मे कई बार अतिथि के तौर पर आयी.... साल बीते फिर वो हमारी संस्था द्वारा आयोज़ित कार्यक्रमो मे अभिभावक के तौर पर शामिल होकर हौसला अफजाई करती रही....संस्था द्वारा आयोजित कवि सम्मेलनो मे उन्हे कई बार सुना...बाल महोत्सव मे कविता पाठ, कविता लेखन की जज वही हुआ करती थी...वर्ष २०११ मे हमारी संस्था यवनिका ने उन्हे ‘यवनिका सम्मान’ से सम्मानित किया...हालांकि इससे स्वयम ‘सम्मान’ का सम्मान बढा.... उनके स्नेहमयी व्यवहार ने मुझे ज्यादा आकर्षित किया था....सरल...सहज...मुस्कुराती हुई....मिलने पर गले लगा लेती....ढेर सारा आशीर्वाद देती...मम्मी से कहती नीलम, तुम्हारी बेटिया बहुत प्रतिभाशाली है....उनसे बहुत प्यार मिला...दुलार मिला....जाने-अनजाने उनसे प्रेरणा मिलती रही...कई साल पहले उनको सुनकर ही 'हाइकु' बारे मे जाना....उनकी कई हाइकु तो जुबान पर है-

अमावस
............
किसने बांधा,
पोटली मे अपने,
भोला सा चांद

इस उम्र मे भी उनकी कलम चलती रही थी.....शहर मे जिसने भी उनका आशीर्वाद चाहा, उसे मिला.....मै १५ अगस्त को स्कूल से आयी थी कि बहन ने उनके निधन का समाचार दिया....ये बहुत बडा झटका था... आशीर्वाद मे उठनेवाले हाथ सदा के लिये थम गये थे.....शब्द गुम गये थे....मेरे समझ मे कुछ नही आ रहा था....बस एक चुप सी लग गयी.... उनको नमन कर रही...विश्वास है वो जहा भी होगी, उनका आशीर्वाद सदैव हमे मिलता रहेगा.

Wednesday, July 30, 2014

मेरे तुम !


तुमने कहा
अकेले हो जाते हो
जब नही होती पास तुम्हारे
फिर तुम कह्ते हो
एकाकार हो मुझसे
आत्मा हूँ तुम्हारी
सुनो तो,
यह कैसी अजब बात है
अकेले होने का अह्सास
और एकत्व
अलग नही एक-दूसरे से?
लेकिन शायद यह ठीक भी है
क्युंकि तुम खुद भी विरुद्धो का सामंजस्य हो
बिल्कुल मेरे आराध्य की तरह
.......स्वयम्बरा
( विरुद्धो का सामंजस्य 'भगवान शंकर' के लिये कहा जाता है)

किस गांव की बात करते हो जी ?



किस गांव की बात करते हो जी ! 
किस्से- कहानी  वाले
मन को बहलानेवाले
सपनो मे आनेवाले

दिखाओ जी दिखाओ,
कहाँ हैं ये गांव ?
किस जगह जमती है चौपाल?
कहा सुने जाते है बिरहा, चैता, फगुआ के तान
किस डाल पर पडता है झुला
कहा गाती है वे बेखौफ, कजरिया
मिहनत और श्रम, भोले से जन
होते है क्या?

ना जी ना
वो गांव एक छलावा था
बस, एक दिखावा था
सच तो यह कि
शहर बनने की होड मे
विद्रुप हो गए गांव
कुरुप हो गए गाव

डर है वहा, खौफ भी वहा
कोलाहल है वहा, नरभक्षी भी वहा
भाग जाना चाहे, जो बसते है वहा

तो दोस्तो, अब का किस्सा यह कि
भारत गांवो का देश नही
लोभ और लालच ने लील लिया उन्हे
अब, लुप्त्प्राय है गाव
और हमने ही 
न्हे संरक्षितघोषित कर दिया है

.......स्वयम्बरा

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Tuesday, April 1, 2014

नेताजी भाई नेताजी

saabhar : google
दो दिन पहले अपने स्कूल में एक प्रयोग किया ...बच्चो को कविता लिखना सिखाया गया ..ये कविताएं हमारे स्कूल के बच्चो की है... पहली बार उनलोगो ने कविता लिखना सीखा ...हालांकि अभी सिर्फ तुकबंदी की कोशिश भर की गयी... पर कविता रचने का उनका उत्साह देखते ही बनता था...इन्हे विषय दिया गया था 'नेताजी' .....सभी ने लिखा ....कुछ चुनी कविताये यहाँ है....आप भी इन्हे पढ़े ....

1) हमारे प्यारे नेताजी
बड़े निराले नेताजी
करते मनमानी नेताजी
बाते आसमानी नेताजी
वोट मांगते नेताजी
वादे भी करते नेताजी
हम तो जाते पैदल-पैदल
ए. सी. बोलेरो में जाते नेताजी
......हनुमत कुमार, IV

2) नेता होशियार होते है,
घोटालो को तैयार होते है
वोट देने पर खुश हो जाते है
नहीं देने पर डरा भी देते है
बड़े वादे वे करते है
जो कभी न पूरे होते है
अपने अधिकार की मांग करो
तो दरवाज़े से दुत्कार भी देते है
......रितेश , क्लास 4

3) नेताजी भाई नेताजी ,
जनता को पागल बनाते नेताजी
उन्हें फुसलाते नेताजी
वोट मांगते नेताजी
चुनाव जैसे आता नज़दीक
खुश करते सबको नेताजी
जीत जाने के बाद सबको
भूल जाते नेताजी
जो कहते वो कभी न करते
ऐसे प्यारे नेताजी
......शिव नारायण , कक्षा - VI

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Thursday, February 6, 2014

साँझ नही प्रतिबिम्ब है मेरा

my click
साँझ  नहीं
प्रतिबिम्ब है मेरा
डूबते सूरज के साथ
तिरोहित मै ही होती हूँ
आकाश का लाल रंग है न
लहू है मेरी ख्वाहिशों का,
लौटते परिंदे
कुछ और नही
अकुलाया मन है मेरा
जो 'घर' को तलाशते फिरते है
प्रारब्ध के गहराते अंधेरे
धीरे-धीरे
लील जाते है सबकुछ
और मै
स्तब्ध देखती रह जाती हूँ
समय-चक्र की इस बाज़ीगरी को 
(बस एक चुप सी लगी है ...)



Monday, January 13, 2014

खेतो से दूर होते हम

.
         
         दूर तक फैली थी हरियाली...बीच मे थे चटख पीले रंग के फूल...ऊपर से बरस रहा था गहरा नीला रंग..और किनारे था गंगा का सफेद निर्मल जल...एक वृहद रंगोली थी वो...जिसे अबतक न देखा था ना ही मह्सूसा था कभी..नतमस्तक थी उस महान कलाकार के सामने...अब किनारे खडे रहने का कोई मतलब नही था..उतर पडी मै भी रंगो के महासमंदर मे...दौड पडी...भागती रही...कभी सरसो के पौधो को निहारा ....कभी चने के साग को दुलराया... मटर की फलियो का ऐसा स्वाद होता है पहली बार जाना.....जी चाहा वही सो जाऊ धरा की गोद मे... ओढ लू उनका आंचल.....खूब रो लू....अपनी सारी गलतियो की माफी माग लू, जिसे जाने-अनजाने हम मनुज करते आ रहे है...पर नही.. कुछ नही किया बडप्पन का झूठा चादर ओढ लिया...और चुपके से खेत की मिट्टी उठाकर माथे से लगा लिया. 

हा से लौटते समय कई विचार उठने लगे..कि वसुंधरा हमारी हर इच्छा की पूर्ति करती है. हमारी क्षुधा मिटाती है. और हम उसी की सबसे ज्यादा उपेक्षा करते है...देखिये न कितने पास तो है गाव, खेत..इतना कि हाथ बढाकर छू ले पर हम तो उसकी ओर ठीक से देखते तक ही...सह्यात्री भर मानते है...या सैर-सपाटे की एक जगह..किताबो, अखबारो से किसानो के हालात की जानकारी लेते है...पर कुछ मीटर के फासले पर खेत जोतते इंसान से मिल नही पाते? हमारी शहरी जिंदगी मे उनकी समस्यायो का कोई स्थान नही..मिलियन मे कमा रहे पर खेतो से दूर हो रहे...प्रकृति से भाग रहे...सोचिये तो कैसी जिंदगी जी रहे हम? आखिर कैसी जिंदगी है ये?