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Showing posts from 2015

सफ़ेद रंग (कविता)

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कई रंग बटोरे
कुचियों को भी पकड़ा
आड़ी तिरछी रेखाएँ खींच ली
और कैनवास तो
जैसे तैयार ही बैठा था
सज जाने को
निखर जाने को

पर ज्यूंही भरनी चाही
लाल, पीली, हरी,
गुलाबी, नीली, मुस्काने
सब उड़ गयीं
गायब हो गयीं
जैसे कभी थी ही नहीं
जैसे कभी होंगी भी नहीं
बचा रह गया एक कोने में
सहमा सिकुड़ा सफ़ेद रंग
अपने होने पर घबराता सफ़ेद रंग
अनचाहा, पर जाना-पहचाना सफ़ेद रंग

मान लिया, सोच लिया ,स्वीकार किया
न हो दूसरे रिश्ते जीवन के
पर यह तो है न
जीवन का साथी, मेरी पहचान
सब रंगो का मूल
यह उदास सफ़ेद रंग
-----स्वयम्बरा






कर्फ्यू -लघु कथा

खूब धूमधाम से विसर्जन संपन्न हुआ। नगाड़े बजे । जयकारे लगे। लाउडस्पीकर पर फ़िल्मी गाने भी बजे। भक्तगण नाचते -गाते- झूमते गए भी।

अब जाके चैन आया तो थकान का अहसास हुआ। लगा कि दस दिनों की जोरदार भक्ति के बाद थोड़ा मनोरंजन तो बनता है ।

तो अख्तर के ठेके पर मिलना तय हुआ। खा के, पी के तृप्त हो गए तब बचे पैसे का हिसाब शुरू हुआ। सब ठीक चल रहा था कि ललन अटक गया। उसने ज्यादा चंदा काटा था तो हिस्सा भी ज्यादा चाहिए था।

बहस से शुरू हुई बात गाली-गलौज से होती हुई लाठी-डंडे पर उतर आयी।अब गुत्थम-गुत्था होने लगा। घमासान चल ही रहा था कि ललन ने कब कट्टा निकाला और कब दाग दिया, पता ही न चला। गोली, बीच-बचाव कर रहे अख्तर को जा लगी।

आज पांच दिन हो गए हैं। हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो गया था। कई लोग मारे गए। कितनी दुकाने जला दी गयीं .....और उसी दिन से शहर में कर्फ्यू जारी है....

बाँझ ( लघुकथा)

राजकुमारी के पाँव आज जमीन पर धरे नहीं धरा रहे थे । क्या करे ...किधर जाए ।..कभी सोहर गानेवालियों पर रूपए न्योछावर कर रही थी। कभी महाराज जी को नमक, हरदी दे रही थी। इधर से मुहबोली छोटकी ननदिया उससे हँसी कर रही थी तो उधर बगल की अम्मा जी अछ्वानी बनाने के लिए गुड मांग रही थी ।

..और बीच-बीच में राजकुमारी की नज़रे ‘उनपर’ भी टिक जाती। ...आज कितने वर्षों बाद उन्हें खुश देखा। ...एकदम निश्चिंत।कनपट्टी की सफ़ेद रेखाएं भी आज नहीं दिख रही थी। असमय उग आयी झुर्रियां अचानक से कम हो गयी थी। आखिर विवाह के बीस साल बाद दोनों को औलाद का सुख मिला और जैसे जीवन ही बदल गया।
सोच रही थी राजकुमारी ।सोलह साल की उम्र में उसका विवाह छोटन से हुआ था ।छोटा परिवार था छोटन का ।दो भाईयोंवाला।बड़े भाई की शादी हो चुकी थी ।उसके तीन बेटे थे। छोटन का विवाह भी धूमधाम से हुआ। राजकुमारी घर में आयी ।.शुरू के साल तो भाप जैसे उड़ गए।पर जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, बाते होने लगी ।पहले दबी जुबान से, फिर एकदम सामने से । निरबंस...बाँझिन...कोख खानेवाली जैसे ताने से शुरुआत होती, मार-पीट पर ख़त्म होती । गालियाँ तो एकदम आम थी। छोटन सब देखता...शुरू म…

भारत भाग्य विधाता (लघुकथा)

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    लघुकथा                                 भारत भाग्य विधाता
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चोर कही का ? चोरी करता है ? .....लात घूंसों की बौछार के बाद उसे घसीटते हुए  नाले के पास फेंक दिया गया ...गलती तो की थी उसने . दूकान में सजे तिरंगे को छूने की कोशिश की थी . अरे ये तिरंगे बिकने के लिए थे. बड़ी बड़ी जगहों पर फहराए जाने के लिए थे. पैसे मिलते उसके पैसे. और ये जाने कहा से आ गया नंग धडंग. लगा उन्हें छूने . गन्दा हो जाता तो कौन खरीदता ?  इन्हें सिर्फ बच्चा समझने की भूल मत कीजिये ...बित्ता भर का है  पर देखी उसकी हिम्मत ?  ये हरामी की औलाद होते है ? इनकी जात ही ऐसी होती है कि सबक नहीं सिखाया गया तो ...

                         उधर उसका चेहरा सुबक रहा था ....चोटों के नीले निशान उभर आये थे .....जिन्हें वह रह रह कर सहला रहा था ....पर आँखे तो अब भी चोरी-चोरी उधर ही देख रही थी जिधर तिरंगे टंगे थे .... जाने क्यों उसे ये बहुत भाते है ...केसरिया, हरा, सफ़ेद रंग ...जैसे इन्द्रधनुष हाथ में आ गया हो ...इसलिए तो आज  के दिन का वह महीनो  इंतज़ार करता है ....वैसे तो …

चिमनिया

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उग आयी है चिमनिया चारो ओर
गुरुता का गुरुर है इनमे
ये अट्टाहास लगाती है
छिन लेती हैं मिट्टी की चिर-परिचित गंध 
सुलगती हैं 
उगलती है गहरा काला कोहरा 
सिकुड़ता जाता है नीला आकाश
और
हवा की साँसे घुटती चली जाती है

जिजीविषा

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वे जो हैं न
जिद्दी लोग
पनप जाते हैं, 
दिख जाते है चारों ओर

ये मदमस्त लोग
जमा लेते हैं जड़ें
जंगलों में, झाडो में,
खँडहर में, दीवारों में
बंजर में, वीरानों में
खेत में, खलिहानों में

इन्हें चाहिए ही नहीं
किसी की नेह
बागी है ये
कुचल दो, उखाड़ दो,
फेंक दो, जला दो
पर मुह चिढ़ाते, ठेंगा दिखाते
जी जाएंगे ये
उग ही आएंगे ये
गाएंगे राग जीवन के

असल में
किसी कोने में
बची होती है जिद
अस्तित्व को बचाए रखने की
जीवन को मुकम्मल बना लेने की
ज़िंदा रहने की

और ये अक्खड़ लोग
उठा लेते हैं सर
हर बार
बार – बार
लगातार
.....स्वयम्बरा

वह एक पागल बुढ़िया थी

वह एक पागल बुढ़िया थी
अनजानी सी
पर पहचानी भी
शहर का हर कोना था
उसका ठिकाना
दिख जाती थी चौराहे पर
मूर्तियों के पीछे
गोलंबर पर
फुटपाथ पर भी
बसेरा था उसका सब डरते, पास न जाते
फेक जाते बचा-खुचा
संतोष पा लेते
वह हरदम बड़बड़ाती आकाश तकती
हाथ उठाकर
गालियाँ देती
कि जैसे चल रही हो
एक लडाई
उसके और
भगवान के बीच एक बड़ी सी गठरी में
छिपाए रहती
अपनी पूंजी
कोइ देखने की
कोशिश भी करता
तो पत्थरें चलाती
बहुत जतन से संजोया था उसने
कतरनो को
चिथडो को
पन्नियों को
रंगीन धागों को
फूटे बर्तनो को
बेरौनक आईना को
और
टूटी टांगो वाली एक गुडिया को
जिसे चिपकाये रहती थी
सीने से
उसके बाल बनाती
कपडे पहनाती
टांगो की पट्टी करती
और जब वह
उसे सुला रही होती
तो धीमे -धीमे
लोरी भी गाती
इस थाती को सहेजते
दिन गुज़रता
इश्वर से लड़ते
राते गुज़रती पर कभी -कभी
सुनाई देती थी
एक तीव्र कांपती आवाज़
जो चीर दे किसी का कलेजा
तब वह
कसकर चिपटाए रहती गुडिया को
पनीली आँखे
ऊपर ही देखती जाती
उस पल वह कुछ न कहती
कुछ न करती और एक दिन
बस अचानक ही
बुढ़िया मर गयी
सुना था
किसी ने
उसकी गुडिया चुरा ली
वह दिन भर
बदहवास भागती रही थी
यहाँ वहा ढूढती रही थी
जाने कितन…

मेरा हक

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तरस मत खाओ
मै नहीं हूँ बेचारा
मत दो खाना ,
कपडे भी मत दो
बस एक कलम दो
और कुछ किताबें दो
सोचने का विवेक दो
सपनो का अधिकार दो
और फिर देखना
छीन लूंगा उनसे
अपने हक की रोटी
अपने हक का कपड़ा
अपने हक का मकान
अपने हक का जीवन
(एम डी एम पर सोचते हुए )
........स्वयम्बरा

उदासियों की नदी

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मेरे भीतर बहती है उदासियों की एक नदी एकदम भीतर मन की परतों से बंधी चुपचाप बहती है खारे पानी की नदी न उद्गम ना अंत बस घूमती रहती है गहरी  खाईयों में कभी-कभी या अचानक ही बादलों के फट जाने से परत दर परत गाद के जमते जाने से आ जाती है    भावनाओं की  बाढ़ कटने लगते है किनारे टूटने लगती हैं सांसे हाहाकार सा उठता है फ़ैल जाता है रेतीला पानी तटों को तोड़ते हुए जाने कहाँ तक क्षण मात्र में समूचा अस्तित्व डूब जाता है

एम डी एम : आखिर कैसी योजना ?

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दृश्य 1
घंटी बजती है .....बच्चो के बीच घर से थाली लेकर स्कूल भागने की होड़ मच जाती है ...छोटी-बड़ी थालियाँ ...पिचकी -फूटी थालियाँ ...किसी ने दो-तीन थालियाँ भी ली है ...कोई बच्ची अपने नन्हे से भाई को गोद में लिए जा रही कि आज अपने खाने में उसे भी खिला देंगे...सभी दौड़े जाते है ... 

दृश्य २
एम् डी एम् का खाना बंट रहा... बच्चो को लगातार घुडकी दी जा रही ...उन्हें धकेला जा रहा ...और मांगने पर डांटा जा रहा...

दृश्य ३
बच्चे जैसे-तैसे, जहाँ -तहां बैठ कर खाना खा रहे...कोई बतानेवाला नहीं ...दुलार से समझानेवाला नहीं ...

दृश्य 4
 एक ३-४ साल का बच्चा रोते हुए घर जा रहा कि उसे खाना नहीं मिला...और ऐसा तो रोज ही होता है ...कुछ बच्चो को खाने के बदले झिडकिया मिलती है ..

दृश्य ५
पोशाक की राशि अब तक नहीं बंटी ...बच्चे हंगामा कर रहे ...बेंच, कुर्सिया तोड़ रहे ....सड़क जाम कर रहे

और ये किसी एक विद्यालय के दृश्य नहीं ...आखिर ये कैसी योजना ....आखिर ये कैसा बचपन... जिसे मांग कर खाने, पहनने की सीख दी जा रही..जिनके स्वाभिमान को अभी से कुचला जा रहा....अगर ये योजनाये बच्चो का अधिकार है तो सम्म्मानजनक तरीके से उनका क्रियान्वयन क्…