ये उन दिनों की बात है (लघुकथा)

अनोखी नहीं, अलग भी नहीं..
एक बिलकुल सामान्य सी कहानी है...सबके जैसी ही..ये कहानियाँ प्रत्येक काल में घटती हैं...नए चेहरों के साथ...हां सबको अपनी कहानी दुनिया से अलग लगती है...है न

खैर , प्रेम जैसा कुछ रहा होगा, पता न।
या कि आज के जमाने में जिसे क्रश कहते है वही था या आकर्षण । जो भी हो, इतना सच है कि उन दिनों दुनिया बेहद खूबसूरत लगती थी। सच में।

पढ़ने के दिन थे। आँखों में सपने थे। सपनों को पूरा करने का जोश भी भरपूर था।

लक्ष्य को पाने के लिए संन्यास सा ले लिया था। नाते-रिश्ते भूल गयी थी। तीज त्यौहार सब अनामिका के लिए अवांछित थे।

क्या? अनामिका कौन है?
अरे वही ...जो पड़ोस में गुप्ता जी के मकान के बगल में रहती हैं...हाँ, हाँ वही, जो कहानियां लिखती हैं....

हां, तो किताबें और बस किताबें इतनी भर दुनिया थी अनामिका की। वह सिविल-सेवा की तैयारी कर रही थी। पटना के एक कोचिंग में एडमिशन लिया था। 'वो'वहीं मिला था।
छः फीट लंबा। गेंहुआ रंग। नुकीली नाक।
बड़ी-बड़ी गहरी आँखें। इन आँखों से घबराती थी अनामिका। उसे लगता था कि वो आँखें उसके सारे राज जान लेंगी, जिसे वह खुद से ही छिपाए फिरती है।

 नाम ...?

हंस पडी अनामिका ....

इतनी जोर हंसी थी कि उस पार्क में योग कर रहा एक समूह उसे गौर से देखने लगा था...

सकपका गयी अनामिका...

पर उसे अपनी यह घबराहट बहुत दिनों बाद भली सी लगी कि उम्र की इस दहलीज़ पर भी एक नाम दिल में हलचल मचा ही देता है, जैसे उन दिनों हुआ करता था...

अनामिका फिर मुस्कुराई।

वह नाम ही ऐसा था । अनाम था वो पर जाना-पहचाना भी।
मतलब.......??

मतलब कि अनामिका ने उसका नाम 'बत्तख' रख दिया था।

हंसो मत। पूरी कहानी तो सुनो।

क्लास में आगे के बेंच पर उस तरफ के 'रो' में वो, इस तरफ अनामिका बैठती थी। बीच में सर का डायस होता।

सर पढ़ाते होते और उसकी नज़रें अनामिका के चेहरे को पढ़ती होती। जब पहली बार नज़रें मिलीं तो अनामिका ने  झट से सिर पीछे किया। मुंह से निकला-"अरे।"

फिर धीरे-धीरे सिर आगे बढ़ाकर झाँका तो देखा वो गर्दन उचकाकर मुस्कुरा रहा था। अनामिका झेंप गयी, बुदबुदाई-'बत्तख'।

तभी से नाम बत्तख हो गया।

ये सिलसिला चलता रहा।

एक दिन क्लास में पहले पहुँच गयी। सीट पर बैठी कि वो आता दिखाई दिया।

उसे जाने क्या शरारत सूझी, अनामिका के बिलकुल सामने की मेज पर बैठ गया। अनामिका की धड़कनें तेज हो गईं। चेहरा लाल हो गया था। जी चाहा कि धरती फटे और वो समा जाए।उसने कॉपी पढ़ने का अभिनय किया। कुछ लिखने का प्रयास किया। सब असफल रहा।

बत्तख उसकी इस हड़बड़ाहट के मज़े ले रहा था। तबतक दूसरे लोग भी आ गए। वो मुस्कुराते हुए निकल गया।

दिन बहुत तेज़ी से बीत रहे थे। दोनों को हर दिन एक-दूसरे का इंतज़ार होता। लेकिन बात देखने-मुस्कुराने तक ही अटकी थी और अटकी रह गयी।

कहानी कहीं नहीं बढ़ी।

क्योंकि ये लड़की अनामिका निरी बुद्धू थी। या कहें डरपोक। या कहें कि उसे अपनी धड़कनो का कारण पता था, पर लक्ष्य हासिल करना प्रायोरिटी थी। उसे अपने और परिवार के सपनों को पूरा करना था। उसे सिविल सेवा परीक्षा पास करना था।

पी टी का रिजल्ट आ गया। अनामिका का चयन हो गया। पढ़ाई-लिखाई और जोर-शोर से होने लगी। इधर कोचिंग ख़त्म होता कि अनामिका की तबियत बुरी तरह खराब हुई।उसे लाद कर घर लाया गया।

और यह मीठी सी कहानी शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गयी।

हर उम्र की अपनी लज्जत होती है। वो उम्र भी ऐसी थी शायद। भावुक। नासमझ। कच्ची धूप सी।

सोचते-सोचते अनामिका को सिसकी सी आयी।

अब तक पार्क में अँधेरा होने लगा था। योग करनेवाला समूह जा रहा। बच्चे भी माता-पिता का हाथ पकडे ठुमकते -हुमकते हुए लौट रहे थे। चिड़ियों का झुण्ड घोंसलों की तरफ आ रहा था।

अनामिका को भी लौटना था, वहीँ , जिसे सब घर कहते हैं।
-----स्वयंबरा
ल 

Comments

Popular posts from this blog

एक थी राजकुमारी

भूले बिसरे लोक खेल

भोजपुरी चित्रकला कोहबर