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Showing posts from June 22, 2008

डोमकच

डोमकच स्त्री-पुरुष के रागात्मक संबंधों एवं सुखद दांपत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यहां न पुरुषत्व के अहं का भय होता है, न ही लज्जाशील होने की झूठी जरूरत। यहां बस औरतें होती है और होती हैं उनकी उन्मुक्तता। यहां वे खुलकर सांसें लेती हैं, हंसती हैं। गाती हैं चुहल करती हैं। वह भी बगैर पुरुषों की अनुमति के।

दरअसल ‘डोमकच’ बिहार की एक ऐसी परंपरा है जो औरतों का मनोरंजन करने के साथ उनके अंदर की कुंठा को बाहर निकाल कर उनमें नया उत्साह, आत्मविश्वास पैदा करती है। इसके माध्यम से हर पुरानी पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को दांपत्य जीवन जीने का तरीका बताती है। जबकि, इसका व्यावहारिक पक्ष यह है कि बारात में घर के सभी पुरुषों के चले जाने के बाद घर की सुरक्षा के लिए औरतों द्वारा मनोरंजन युक्त रतजगा का कार्यक्रम है- डोमकच।
यह परंपरा कितनी पुरानी है कहा नहीं जा सकता। किंतु, इसमें जिस तरह की क्रीड़ाएं की जाती हैं उससे स्वत: सिद्ध होता है कि जबसे हिंदू धर्म में ‘विवाह’ नामक संस्कार अस्तित्व में आया होगा, इस प्रथा का भी उसी समय से आरंभ हुआ होगा। विवाह-संस्कार रात में होने से वर पक्ष के घर भी रात्रि शयन अशुभ माना जाता है…

यूँ कहिये

यूँ कहिये कि झड़ा हुआ पत्ता हूँ मैं साँसे, नही देती किसी को धूप की, तपिश में  सूख जाती हूँ  रेशा-रेशा होकर , बिखर जाती हूँ टूटता तारा हूँ मैं अभिशप्त होकर भी  वरदान देती एक बारगी चमक कर,  राख बनकर गिर जाती हूँ, आसमा से उम्मीदों के दम तोड़ने की  आहट हूँ  डरते हैं  सब, मेरी छाया से भूत बनकर पीछा कर रही हूँ इसका, उसका,  स-ब-का हाँ, हाँ, पगली हूँ मैं कोई अक्स नही, पहचान नही श्मशान की भटकती रूह बनी चीखती-चिल्लाती  भागती रहती हूँ बंद 'सलाखों' के पीछे