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जै गंगा....!

रेनू जी की एक दुर्लभ रचना http://www.phanishwarnathrenu.com/ से साभार  जै गंगा......
इस दिन आधी रात को ' मनहरना ' दियारा के बिखरे गांवों और दूर दूर के टोलों में अचानक एक सम्मिलित करूण पुकार मची , नींद में माती हुई हवा कांप उठी - ' जै गंगा मैया की जै...!!
अंधेरी रात में गंगा मैया क्रुद्ध लहरें हहराती, घहराती पछाड़ खाती और फुफकारती हुई तेजी से बढ़ रही थीं।
लहरें उग्र होती र्गइं , कोलाहल बढ़ता गया - ' जै गंगा मैया ... मैया रे ... दुहाई गंगा मैया... भगवान..... ।'
...... गाय बैलों का बंधन काटो ... औरतों को चुप करो भाई , कुछ सुनने भी नहीं देती है , बच्चों को देखो , उॅचला बॉध पर औरतों को भेजो , अरे बाप रे , पानी बढ़ रहा है , रे बाप ! .... ! ... दुहाई ...
पानी उपर की ओर बढ़ रहा था , मानो उपर की ओर उठती हुई क्रंदन-ध्वनि को पकड़ना चाहता हो । ...
- ' दुहाई गंगे ....
' कलकल कलकल छहर छहर - एक फूट । '
- बचाओ बाबा बटेश्वरनाथ ...
' ओसारे पर पानी ' ।
- बाप रे , दुहाई गंगा.......
लहरें असंख्य फण फैला कर गांव में घुसीं । घर के कोने कोने में छिपे हुए पापों को खोजती हुई पतितपा…