मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Monday, October 9, 2017

ट्रूथ या डेयर

ट्रुथ एंड डेयर
लगभग सबने खेला होगा...
तब बचपन था और बचपना भी...
जीवन में मुद्दे ही कम थे... जो थे उनमे झूठ बोलने की गुंजाइश भी कम थी ...इसलिए ट्रुथ सुनना बेमज़ा सी बात थी...
तो चुन लिया जाता था डेयर....
देनेवाले और लेनेवाले दोनों को फिर तो खूब मज़ा आता ...
जो चाहे करवा लो बन्दे से.....करनेवाला भी थोड़े नखरे के बाद करने को तैयार....

पर अब जबकि कई अनुभवों से गुजर चुके...समय की मार भी झेल लिया...भावनाओं को नियंत्रित कर मुखौटा लगाना सीख चुके...

अब भी कोइ कहे ट्रुथ या डेयर तो शायद डेयर ही चुना जाएगा...क्योंकि आज तो हम अपनेआप से भी सच नहीं बोल पाते....

कई सच के मुंह पर पट्टी बाँध मन के तहखाने में डाल देते हैं...

आज मुद्दे भी कई हैं और झूठ बोलने की गुंजाइश भी ज्यादा है...

उम्र ने समझदार बनाया तो सबसे पहल स्वयं का सच, स्वयं से छिपाना सिखाया है...

-----स्वयंबरा

Friday, October 6, 2017

पटना का संजय गांधी जैविक उद्यान

नाम है संजय गांधी जैविक उद्यान....
सच में ये एक वृहत बागीचा ही है...या फिर एक छोटा सा जंगल....

पटना की साँसे इसी से चलती हैं....ये न हो तो इस प्राचीन नगर का दम घुट जाएगा...पक्का..

अंदर एक चिड़ियाघर भी है, साँपघर और मछलीघर भी है.....हालांकि जहां जानवर ज्यादा हो, उसे चिड़ियाघर क्यों कहते, मेरी समझ के बाहर है....(कोई मेरे ज्ञान में वृद्धि कर दे प्लीज)

खैर, मेरी बेटू को तो मछलीघर बेहद पसंद आया...पूरे समय गाती रही-" मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है..."

मैं भी देख रही थी अक्वेरियम में बंद उन मासूम सी आँखोंवालियों को... ताल, तलैया, नदी, समंदर से बिलकुल अलग है ये पानी...क्या यह  भी उनका जीवन है? ... कहाँ स्वतंत्रता की अठखेलियां....बहते चले जाने का सुख...कहा कुछ वर्गफुट में कैद , ठहरे हुए पानी में रुक जाने की मजबूरी..
(सॉरी, यह शुद्ध भावना है)

हालांकि मुझे इसकी हरियाली भा गयी...यहाँ कई प्रकार के पेड़-पौधे हैं...उन्हें पूरी तरह निरखने में घंटो लग जाएं...इसीलिये ऐसी जगहों पर अकेले जाना बेहतर या किसी ऐसे साथी के साथ जो आपकी तरह ही पक्का घुमक्कड़ हो...
(परिवार का साथ बहुत अच्छा लगता है पर यायावर मन को संतुष्ट करने में समय लगता है)

झील के किनारे पहुँचने पर लग रहा था कि ये जगह पटना की नहीं...कही पहाड़-वहाड़ पर चले आए हैं घूमने...बीच में विशाल फव्वारे लगे थे...बोटिंग का मन हो आया...पर घड़ी की टिक- टिक इतनी तेज थी कि भागना पड़ा...

जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वो ये कि इस शानदार उद्यान की परिकल्पना बिहार के पूर्व  राज्यपाल नित्यानंद कानूनगो के कारण यथार्थ में तब्दील हुई...

राज्यपाल एक राजनैतिक पद माना जाता है...केंद्र-राज्य विवाद का एक प्रमुख कारण भी.....पर यहाँ यह पद एक शहर को ऑक्सीजन देने का हेतु बन गया...माननीय राज्यपाल ने 1970 में राजभवन की भूमि का ही एक भाग इस महती कार्य हेतु दे दिया....1973 में यह नागरिकों के लिए खोल दिया गया...

धन्यवाद सर...
आपने शायद उस समय ही भांप लिया था कि आनेवाले समय में पटना मात्र कंक्रीट के ढेर में बदल जाएगा...चारो ओर शोर, प्रदुषण ही होगा....राहत मिलेगी तो बस इसी उद्यान में...

बहुत सी कमियां होंगी यहाँ...सब जगह होती हैं...पर मुझे खूबसूरती ज्यादा दिखी ....मेरा मन अभी संतुष्ट नहीं...तो मौका मिला और 'जान' बची रही तो कुछेक बार जरूर जाउंगी वहाँ...
---स्वयंबरा



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Sunday, September 3, 2017

कच्ची धूप

बहुत रोई थी उस दिन घर आकर, जब जूलॉजी (इंटर) के क्लास में बेंच पर किसी ने लिख दिया था लव यु स्वयम्बरा....सहपाठियों (लड़कियों ने ही) ने दिखाया...फिर कलम से स्याही गिराकर उसे पोत दिया ताकि मेरी बदनामी(?) न हो...😂

मुझे भी लगा कि किसी ने सरे बाजार मेरी इज्जत उछाल दी...अजीब से ख्याल आने लगे थे कि पापा-मम्मी को पता चल गया तो ...मैंने तो उनका विश्वास ही खो दिया है...मानो ये कितनी भयानक गलती हो गयी हो...जबकि लिखनेवाले का पता तक नहीं था....

कुछ दिनों तक रोती रही थी...कॉलेज जाने की हिम्मत नहीं थी...असल में बहुत संकोची थी उन दिनों...एकदम शर्मीली..खुद को गलत मान लिए जाने के डर से किसी से कह भी न पाई...ऐसी ही कुछ और घटनाएं हुई...

परिणाम ये हुआ कि लड़कों से घबराने लगी.. लो सेल्फ एस्टीम की शिकार..संकोच अब अति संकोच में बदल गया...हालांकि बाद में मेरी खुद से खुद की लड़ाई शुरू हुई और स्वयं को पूरी तरह बदल दिया...

और अब, पिछले दिनों मेरी एक स्टूडेंट हाथ में एक पूर्जा लिए रोती हुई आयी...किसी ने लिख दिया था उसके नाम के साथ किसी का नाम...

मुझे सब कुछ याद आ गया....असल में इस उम्र की सबसे बड़ी परेशानी खुद को ही गलत समझ लिए जाने की होती है...... ये डर इतना ज्यादा कि बच्चे स्वयं को हानि भी पहुंचा दे..भावुकता भी अत्यधिक ... एकदम अनियंत्रित...इतनी कि उसके सैलाब में सबकुछ बह जाए.....

 ऐसे में बच्चों को एक ऐसा साथ चाहिए जो उनपर पूरा विश्वास होने का भरोसा दे सके ..जो उन्हें तसल्ली दे कि गलत हो या सही हम हर पल  तुम्हारे लिए खड़े है.... तो तुम जो चाहो, गलत या सही मुझसे कह सकते/सकती हो...कुल मिलाकर ये कि उनका सच्चा दोस्त बन जाने की कोशिश की जानी चाहिए...

तो शायद अपने बच्चों से खूब बातें करने का ही ये परिणाम था कि ये  बच्ची बिना झिझक मेरे पास आ गयी.... उसे चुप कराया....खूब इधर- उधर की बातें की..फिर शुरू हुई काउंसलिंग...

अंततः उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी...राहत भरी मुस्कान..शायद उसे विश्वास हो रहा था कि कोई और उसे समझे न समझे मैं हूँ उसके साथ....तो कभी भी, कही भी, बेझिझक वह कुछ भी कह सकती है...

सुकून तो मुझे भी मिल रहा था जैसे मैंने खुद को ही सहलाया, दुलराया हो...आश्वश्त किया हो कि कोई हो न हो मैं हूँ न....

😊😊😊

Wednesday, August 30, 2017

ताकि रुमानियत बची रहे

दूर से देखो चाँद कितना सुन्दर....
पास जाओ तो पर्वतों, क्रेटरों, चट्टानों से भरा
एकदम निर्जीव, एकदम निस्पंद
कि सारे अहसासों, कल्पनाओं का 'दी एन्ड' हो जाए
इसलिए कुछ दूरी जरुरी
ताकि भ्रम बना रहे
रुमानियत बनी रहे
😃😃
----स्वयंबरा

Tuesday, August 22, 2017

आँखें

बहुत गहरी है आँखे
एकदम तीक्ष्ण, बेधती सी
जैसे सारे राज एकबारगी ही जान लेंगी
मन का कोना-कोना छान लेंगी
बचना चाहती हूँ अक्सर
कस कर लपेट लेती हूँ खुद को
आँखें मूँद लेती हूँ
कानों को ढांप लेती हूँ
होंठों को भींच लेती हूँ
अभिनय की चरम सीमा भी पार हो जाती है
पर मेरी सारी बेफिक्री धरी रह जाती है
सारे आवरण ग़ुम हो जाते हैं
बेबस, बेचैन सी देखती रह जाती हूँ
पल भर की बात होती है
उसकी एक नज़र
सारे राज जान लेती है
फिर वो बेहद मासूमियत से मुस्कुराता है
और हौले से पूछ बैठता है-ठीक तो हो?

---स्वयंबरा

Friday, August 18, 2017

आत्महत्या क्यूँ?



जिंदगी सबसे बड़ी चीज़ है....बाकि सब इसके बाद...
तो कोई यूँ ही नहीं आत्महत्या कर लेता...
ये बस आख़री दांव होता है ....सारे दुःखों से निजात पाने का....
उस इंसान को पलायनवादी, स्वार्थी मानकर भर्त्सना की जा सकती है पर यह सूचक है हमारे 'स्वार्थी' हुए जा रहे समाज का भी.....जो या तो अनभिज्ञ रहता है या अनदेखा करता है...कभी कभी तो क्रूर भी हो जाता है..
असल में जब जूझने की क्षमता चूक जाती है...सब कुछ नियंत्रण से बाहर हो जाता है तब इंसान ऐसा कदम उठाता है...
सबकी अपनी क्षमता होती है ....सभी अपने-आप अपनी यातनाओं से उबर नहीं पाते....ऐसे लोगों को मदद की दरकार होती है....
मुझे उस इंसान से हमदर्दी है ....कि उसके आस पास कोइ भी ऐसा नहीं रहा जो उसे तनाव से बाहर निकलने में सहयोग कर सके?....
आशा साहनी फिर ये....दोनों ही अकेलेपन के कारण हुए हादसे हैं....जाने हम किस समाज का निर्माण कर रहे जहां लोग अभिशप्त है अकेले रहने को...
---swayambara

Tuesday, July 25, 2017

जिंदगी

जिंदगी
मेरी यारा
न हो उदास ऐसे भी
रंग भरेंगे तुझ में भी
पल भर का इन्तजार है बस

देख न
बूंदें बरस चुकी हैं
धरा भी तृप्त हो चुकी है
खुशबु घुल रही हवाओं में
इंद्रधनुषी रंगत छा चुकी है
--स्वयंबरा