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भ्रम

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भ्रम का बने रहना जरुरी है
भ्रम कि चाँद सुन्दर है
भ्रम कि सूरज उगता है
भ्रम कि उम्र बीतने पर
दर्द कमता जाता है
भ्रम कि दुःख बांटने से
बंटता-छंटता जाता है
भ्रम कि ईश्वर है
भ्रम कि कर्ताधर्ता भी वही है
भ्रम कि तुम्हें मुझसे प्यार है
भ्रम कि तुझसे सारा संसार है
भ्रम कि लोकतंत्र सच में लोक का है
भ्रम कि देश आज़ाद जनो का है

भ्रम न रहे तो जाने क्या हो मन का
भ्रम से परे कहाँ हास जीवन का
भ्रम भरम में सारा जग भरमाया
फिर भी जीना इसी भरम से आया
---स्वयंबरा

पेंशन

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माई बीमार थी...
अब-तब की बात थी...
बड़कावाले अस्पताल में भर्ती कराया गया
पांच हज़ार खर्चा हुआ...
बहुत दौड़-भाग हुआ...
दिन-रात का सेवा हुआ...
भाग था कि बच गयी...
बची साँसे मिल गईं

नहीं तो भारी आफत था ...
बहुत बड़ा आफत था
परिवरवे बर्बाद हो जाता..
एकदमें बर्बाद हो जाता...
तब बंद हो जाती गीतवा की पढ़ाई....
बंद हो जाता परबीनवा का दूध...
सुधवा का बियाह त होबे नहीं करता....
बाबू-मान के आँखे अंधार छाया रहता...

बाकि बच गयी माई
बरहम बाबा को मनाया गया था
बुढ़िया माई भीरी भी गोहार लगाया गया था
ए माई  ए माई कहते भर रात काटा गया था

आ बच गयी माई...
मने कि बच गया माई का परिवार
मने कि सुखी रहेगा माई का परिवार
बस जीती रहे माई

काहे कि जबले जीती रहेगी माई
तब ले मिलता रहेगा माई का 'पेंशन'
तब ले मिलता रहेगा परबीनवा को दूध,
गीतवा को किताब
आ सुधवा के बियाहो होईये जाएगा
-----स्वयंबरा

जिंदगी और कुहासा

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घने कुहासों में
जब कुछ नहीं सूझता
जब पेड़ मौन साये से बन जाते है
दिन सहमा-सिकुडा बेरौशन सा
जब 'जीवन' जी लेने की जद्दोजहद में लगा होता है
बर्फ होती साँसों को बचाए रखने की कोशिशें करता है जब सफ़ेद धुंधलके के सामने हम बेबस हो जाते हैं
जब सारे रस्ते खो जाते हैं....
तब ......
सड़क पर दोनों ओर खींची सफ़ेद पट्टी राह दिखाती हैं
या दूर से आती टिमटिमाती रौशनी दिलासा दे जाती है
बच्चों की एक टोली खिलखिलाते हुए गुज़र जाती है
एक माँ अपने कई छौनों को दूध पिलाती है
और .......
और एक पेड़ की शाख पर बने घोंसले में जिंदगी
धीमे-धीमे मुस्कुराती है..
---स्वयंबरा

हैप्पी बर्थडे किंग खान

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शाहरुख खान से मेरा प्रेम लव ऐट फर्स्ट साइट तो बिलकुल नहीं था...डी डी एल जे देख लिया था कई और मूवी भी आई...
फिर आया मौसम 'कुछ कुछ होता है' का...

तब पटना में रहा करते थे..एक चुलबुली सी दोस्त थी सुमन ...उसने ये मूवी देख ली थी....जब हम मिले उसने एक्टिंग कर-कर के कहानी बतानी शुरू कर दी थी...

मेरे एग्जाम पास थे ...और ये मेरे लिए अति गंभीर मसला हुआ करता था...उस दौरान पूरे सन्यासी बन जाया करते...नो मूवी..नो घूमना फिरना ..नो होली..नो दिवाली...बस पढ़ाई-पढ़ाई...

तो वो बखान करती जाती और मेरा चैन छिनती जाती ....पर मूवी देखने के कई खतरे थे..पहला पहली बार अकेले सिनेमा हाल जाने का खतरा...(अब तक तो मम्मी के साथ ही देखा था),दूसरा परीक्षा के दौरान तीन-चार घंटे समय बर्बाद होने का खतरा ,....तीसरा  ऐसा कर देने पर अपने गिल्ट से जूझने का खतरा 😃😃😃..

पर अंततः मेरे दिल की जीत हुई ...सोचा चार घंटे की भरपाई नींद से करूंगी..पर मूवी तो देखनी ही है....प्लान बना...जिंदगी में पहली बार अकेले, सिर्फ हम दो यारा, पिक्चर -हाल में, मूवी देखने गए..सारे रास्ते दिल धक्-धक् करता रहा...एक तरफ थ्रिल दूसरी तरफ आशंका कि स…

अहंकार या हीन भावना

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कोई-कोई इंसान अंदर से खाली होता है या खुद में किसी चीज की कमी महसूस करता है...तो उसे उजागर होने देने से बचने के लिए एक झूठ ओढ़े रहता है ... यह आवरण ही उसके दंभी होने का आभास देता है...हालांकि वह वास्तव में अहंकारी नहीं होता बल्कि कमी के अहसास को दिखने नहीं देने के लिए एक्स्ट्रा एफर्ट करता है... तो अगली बार जब किसी अहंकारी इंसान को देंखे तो उससे सहानुभूति रखें... क्योंकि असल में तो वह हीन भावना से ग्रस्त है...

ट्रूथ या डेयर

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ट्रुथ एंड डेयर
लगभग सबने खेला होगा...
तब बचपन था और बचपना भी...
जीवन में मुद्दे ही कम थे... जो थे उनमे झूठ बोलने की गुंजाइश भी कम थी ...इसलिए ट्रुथ सुनना बेमज़ा सी बात थी...
तो चुन लिया जाता था डेयर....
देनेवाले और लेनेवाले दोनों को फिर तो खूब मज़ा आता ...
जो चाहे करवा लो बन्दे से.....करनेवाला भी थोड़े नखरे के बाद करने को तैयार....

पर अब जबकि कई अनुभवों से गुजर चुके...समय की मार भी झेल लिया...भावनाओं को नियंत्रित कर मुखौटा लगाना सीख चुके...

अब भी कोइ कहे ट्रुथ या डेयर तो शायद डेयर ही चुना जाएगा...क्योंकि आज तो हम अपनेआप से भी सच नहीं बोल पाते....

कई सच के मुंह पर पट्टी बाँध मन के तहखाने में डाल देते हैं...

आज मुद्दे भी कई हैं और झूठ बोलने की गुंजाइश भी ज्यादा है...

उम्र ने समझदार बनाया तो सबसे पहल स्वयं का सच, स्वयं से छिपाना सिखाया है...

-----स्वयंबरा

पटना का संजय गांधी जैविक उद्यान

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नाम है संजय गांधी जैविक उद्यान....
सच में ये एक वृहत बागीचा ही है...या फिर एक छोटा सा जंगल....

पटना की साँसे इसी से चलती हैं....ये न हो तो इस प्राचीन नगर का दम घुट जाएगा...पक्का..

अंदर एक चिड़ियाघर भी है, साँपघर और मछलीघर भी है.....हालांकि जहां जानवर ज्यादा हो, उसे चिड़ियाघर क्यों कहते, मेरी समझ के बाहर है....(कोई मेरे ज्ञान में वृद्धि कर दे प्लीज)

खैर, मेरी बेटू को तो मछलीघर बेहद पसंद आया...पूरे समय गाती रही-" मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है..."

मैं भी देख रही थी अक्वेरियम में बंद उन मासूम सी आँखोंवालियों को... ताल, तलैया, नदी, समंदर से बिलकुल अलग है ये पानी...क्या यह  भी उनका जीवन है? ... कहाँ स्वतंत्रता की अठखेलियां....बहते चले जाने का सुख...कहा कुछ वर्गफुट में कैद , ठहरे हुए पानी में रुक जाने की मजबूरी..
(सॉरी, यह शुद्ध भावना है)

हालांकि मुझे इसकी हरियाली भा गयी...यहाँ कई प्रकार के पेड़-पौधे हैं...उन्हें पूरी तरह निरखने में घंटो लग जाएं...इसीलिये ऐसी जगहों पर अकेले जाना बेहतर या किसी ऐसे साथी के साथ जो आपकी तरह ही पक्का घुमक्कड़ हो...
(परिवार का साथ बहुत अच्छा लगता ह…