मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Monday, June 26, 2017

उफ़ , ये उबाऊ प्लेन यात्रा

बड़ा बोरिंग होता है प्लेन से यात्रा करना...एकदमे असामाजिक टाइप...

न चाय गरम, गरम चाय की मधुर आवाज़... न मूंगफली बेचनेवालों की पुकार...चढ़ने-उतरने की धक्कम-धक्का भी नहीं...और तो और दुनिया भर की पॉलिटिक्स पर छिड़ी 'जोरदार', 'हंगामेदार' बहस भी सुनाई नहीं देती है...😕

एकदम शांत माहौल....बनावटी.... बहुते 'सभ्य' लोग...बातें होती भी हैं तो ऐसे फुसफुसा के कि 'आएं' 'आएं' करते रहो...बइठे रहो चुपचाप, जइसे कोई 'पनिशमेंट' मिला हो...

मने कहना ये कि जब तक बहुते जरूरी न हो तब तक प्लेन से यात्रा नहींए करना है...बुझाया कि नहीं...😉😉😉😉😉😉😉😉
(आत्मालाप)

उपनिवेशवाद के दौर में भारतीय क्रिकेट

क्रिकेट इतना नहीं पसंद कि बेचैन रहूँ देखने के लिए...पर इसके बारे में जानना रुचिकर लगा कि कोलोनाईजेशन के दौर में यह जेंटलमैन गेम आखिर इंग्लैण्ड से भारत कैसे आया...कैसे इसका विकास हुआ..

इंग्लैंड, जहां क्रिकेट का जन्म हुआ, वहाँ ये वर्गीय विभेद का बड़ा उदाहरण था...उच्च आय वर्ग वाले शौक के लिए इसे खेलते इसलिए वो बैट्समैन होते...निम्न आयवर्ग वाले पैसे के लिए खेलते इसलिए बॉलर थे...और एक बॉलर कभी कैप्टेन नहीं बन सकता था...शायद इसलिए शुरुआती नियम अधिकतर बैट्समैन के पक्ष में ही बने थे...

ब्रिटिशों ने भारतीयों को असभ्य, जंगली ही माना था...उन्होंने कभी सोचा भी नहीं कि भारतीय इसे खेल पाएंगे...पर ऐसा हुआ नहीं..भारतीयो में पारसी समुदाय ने क्रिकेट खेलने की शुरुआत की...बाद के एक टूर्नामेंट में इनलोगों ने अंग्रेजों के जिमखाना क्लब को हरा दिया...ये एक बड़ी बात थी..

अंग्रेजों ने इस खेल को भी फूट डालने के लिए इस्तेमाल किया और हिन्दू, इस्लाम, पारसी आदि धर्मों  के आधार पर क्रिकेट क्लब बनाने पर जोर दिया....

आज की रणजी ट्रॉफी की तरह एक टूर्नामेंट आज़ादी से पहले भी हुआ करता था पर उसमे धार्मिक आधार पर बने क्लब भाग लेते...इस कारण गांधी जी ने भी इस टूर्नामेंट की आलोचना की थी....

बढ़ चले हैं
रुकेंगे नहीं कभी
साथ दो, न दो
--स्वयंबरा

शिकार

दिल्ली के लगभग हर मोहल्ले घर में कबूतरों का बसेरा है ....आज बालकनी में खड़ी थी.. कबूतरों के झुण्ड पास वाले कई छतों पर बैठे थे.. कुछ इधर-इधर मंडरा रहे थे ...कुछ दाने चुग रहे थे...कुछ आपस में खेल रहे थे....सब खुशनुमा था....

अचानक एक बाज आसमान से नीचे की ओर झपटा .....कबूतरों का झुण्ड फड़फड़ा उठा... जान बचाने के लिए सब इधर-उधर उड़ गए ....वो बाज जिधर को उड़ान भरता कबूतरों के फड़फड़ाते पंखो की आवाज गूंजने लगती ....

शिकार - शिकारी का खेल कुछ देर चलता रहा....और कुछ सेकेण्ड बाद ही एक कबूतर उसके पंजे में नज़र आया....फिर वो बाज़ दूर बहुत दूर उड़ता गया....कबूतरों के झुण्ड वापस अपनी-अपनी जगह बैठ गए ....यहां वहाँ फुदकने लगे...गुटरगूं की आवाज़े आनी शुरू हो गयी

Thursday, June 15, 2017

पापा मेरे पापा

वो दिन गर्मियों के थे।
लू चलने लगी थी। मीठे-मीठे आम मिलने लगे थे । स्कूल की छुटियाँ हो गईं थीं। अब मेरे पास पूरा एक महीना था, धूम मचाने के लिए। खेलने के लिए। शैतानी करने के लिए।

ऐसे तो हर शाम मोहल्ले भर के बच्चों की जमघट छत पर लग जाती और खूब धमाचौकड़ी मचती। पर छुट्टियों की बात ही निराली होती है। स्कूल जाने का झंझट ही नहीं ।रूटीन लाइफ से मुक्ति।रोज-रोज की चिक-चिक से पूरी आज़ादी। अब तो बस खेल, खेल और खेल।

पर घर के बड़े हमारी इस आज़ादी से जलते थे। वो इन ख़ूबसूरत छुट्टियों में भी हमें बांधकर रखना चाहते थे।
"बाहर नहीं निकलना है।"
" लू लग जाएगी।"
"होमवर्क पूरा करो।"
"घर में ही खेलो।"
(अब घर में कोई खेलता है क्या)

वो हमें हमारी आज़ादी देना ही नहीं चाहते थे(उस वक़्त लेकर रहेंगे आजादी वाली बात प्रचलन में नहीं थी, नहीं तो हम भी आवाज़ बुलंद करते)। विशेष तौर पर पापा। उनके कोर्ट की भी छुटियाँ हो गईं थीं। वो भी घर पर ही रहते। बुलंद स्वर में आदेश जारी हुआ कि घर से बाहर (छत पर भी) शाम को ही निकलना है। दोपहर का खाना खाने के बाद एक घंटा आराम करना है।और उसके बाद पढ़ाई करनी है। तो तय हुआ कि दोपहर में बस्ता लेकर पापा के पास बैठ जाना है।शाम तक पढ़ाई चलती। फिर छत पर जाने का मौका मिलता।

एक दिन की बात है पढ़ाई होते-होते शाम हो गयी। दोस्त आ गए। पापा गणित समझा रहे थे (असल में कमजोर थी उसमें)। पापा ने उन्हें  जाने को कह दिया और मुझे बिठाए रखा। अब मुझे व्याकुलता ने घेर लिया। बेचैनी की हद हो गयी। गणित के सारे सूत्र, जोड़-घटाव सर के ऊपर से निकलने लगे।
"सारे दोस्त छत पर खेल रहे और मैं यहाँ पढ़ रही। लानत है मुझपर।"
अब दिमाग चलने लगा। कैसे यहाँ से निकले। पापा से कहा बाथरूम जाना है। पापा बोले जाओ। तो गयी बाथरूम, फिर सीधे छत पर।

खूब इतरा रही थी, अपनी चालाकी पर। खेल शुरू हुआ। दौड़ा-दौड़ी, पकड़ा-पकड़ी। विशेष तौर पर कबड्डी, जो बेहद पसंद था। थोड़ी थकान हुई तो वहां एक पुरानी, लकडी की बनी आराम कुर्सी थी, उसपर बैठ गयी। गप्प का दौर शुरू हुआ। खूब मस्ती हो रही थी कि अचानक मेरी बीचवाली ऊँगली दो लकड़ी के बीच लगे पेंच में  फंस गयी। पहले आराम से कोशिश की निकालने की। नहीं निकली। दोस्तों ने कोशिश की। नहीं निकली। अब मेरी परेशानी बढ़ने लगी। रुआंसी हो गयी। दोस्तों ने सबको पुकारा। मम्मी और अम्मा (दादी) दौड़े-दौड़े आयीं। उन्होंने भी कोशिश की। अबतक मेरी ऊँगली से खून निकलना शुरू हो गया था। दर्द भी अपने चरम पर पहुँच गया। मैंने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। आवाज़ सुनकर पापा आये। उन्होंने सुपर मैन की तरह काम किया। पता न कैसे कुर्सी को मोड़ा और ऊँगली एकदम से निकल गयी। अब तो और जोर का रोना आया। पापा से चिपककर देर तक रोती रही।

चुप हुई तो पापा ने कहा - "बेटा, पापा-मम्मी से झूठ नहीं बोलना चाहिए। देखी न क्या हुआ।"

ये बात धक्क से लग गयी। ऐसी लगी कि अब तक लगी हुई है। बड़े होने पर भी यही माना कि पापा-मम्मी से झूठ बोलने की सजा ईश्वर देता है। उसके बाद याद नहीं कि बचपन में या बड़े होने के बाद भी, फिर कभी किसी बात के लिए इनसे झूठ बोला। किसी-किसी गलती के लिए खूब डांट खाती रही। गुस्सा भी आता रहा। पर बचपन की यह बात कभी भूल नहीं पायी। पापा का कहा वह वाक्य पैठ गया है मन में। अब तो मृत्यु तक यह न निकले।
----स्वयंबरा

Monday, June 12, 2017

जब हमारे घर देवी माता पधारीं😃

कुछ दिनों पहले हमारे घर देवी माता आयीं थी....

उनके साथ, सहायिका माता भी थीं...जिसका परिचय वो गर्व से करा रही थीं कि बेटा हम दाई लेकर घूमते है..इसलिए भरोसा करो...साईं बाबा ने मुझे तुम्हारे लिए भेजा है..

और उसके बाद असल बात शुरू हुई- मैं माता हूँ....दान दो बेटा..... सारे सुख मिलेंगे...घर आबाद होगा... नहीं दोगी तो भस्म हो जाओगी...सब ख़त्म हो जाएगा..

हमसब ने कहा कि माताजी ऊपर अभी-अभी हमारे पालतू कुत्ते को घूमने के लिए छोड़ा गया है....खूंखार है... जाइए जल्दी, वो नीचे ही आ रहा...

और देवी माँ, अपनी सहायिका के साथ तुरंत अंतर्ध्यान हो गयी...


(एकदमे सच्ची घटना...हां माता जी को डराने के लिए कुत्ते की मनगढ़ंत बात कही और वो जादू सा असर कर गया😂😂)

मन

बहुत रौब झाड़ता है मुझपर
दिमाग की सुनने ही नहीं देता
मन को चिनवा देती हूँ दीवारों में
उसकी बक-बक घुट जाए वहीँ पे
----स्वयंबरा