Posts

Showing posts from August 17, 2008

दिल्ली प्रवास का पहला अनुभव

लगता नहीं,
ये जहाँ मेरा है
जलती-बुझती, चमकीली रोशनियों से
चोंधिया गई हैं मेरी आँखे
देखो न
यहाँ खो गई है आदमियत
चारों ओर है आत्मियता का अभिनय करते
रंगे -पुते चेहरे
जहाँ मेरे 'गवईपन' की मासूमियत 
'मिसफिट' पाती है ख़ुद को
बड़े शहर के 'सतरंगे सपनो' का
'यथार्थ' यही है क्या
कि मुझसे मुझी को छीन कर
बना दे एक 'विदूषक'
और मिटा दे
मुझमे बसी मिटटी की मोहक गंध

मेरी प्रेरणा

छोटे से शहर से निकलकर दिल्ली में आना और अपनी जगह बनाना कम से कम मेरे लिए एक बहुत बड़ी बात है । ऐसे में कई बार हार जाने जैसा अहसास होता है । पर हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तिया हमेशा मुझे हौसला देती है।मेरे जैसे और लोगो के लिए समर्पित है ये कविता.........

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती...

भूले बिसरे लोक खेल

बचपन ........मस्ती शरारतो एवं जिज्ञासाओं से भरी बेपरवाह उम्र..... ना कमाने की फिक्र होती है न ही जिन्दगी जीने की चिंता... न ही जिन्दगी की सच्चाईयों  का सामना करने की जरूरत ....अगर कुछ होता है तो सिर्फ  खेल.... खेलो की दुनिया ही बच्चो की वास्तविक दुनिया होती है....

कभी खेल प्रकृति की गोद में खेले जाते थे.... इनकी मस्ती का आलम ये था कि बच्चे बिल्कुल उन्मुक्त होकरखिलखिलाते थे.... इनमे सामान्य लोक खेलो के अलावा मौसमो के खेल भी थे....यहाँ तक कि ' चिढाना' भी एक खेल ही  होता था...जब बच्चो की भीड़ किसी चिढनेवाले बूढ़े  को देखती तो समवेत स्वर में गाने लगती...
" बुढवा  बेईमान मांगे करेला के चोखा"


गाँव में कोई नई दुल्हन आती तोपिचा-पीछे  लग जाती बच्चो की टोली ......
"ऐ कनेवा , 
दुगो धनिया द, 
लाल मरचाई के फोरन द"


किसी नंग-धरंग बच्चे  को देखा और चिढाना शुरू........
"लंगटा  बे लंगटा , 
साग रोटी खो ,
गधा  प् चढ़  के बियाह करे जो "



मौसमो के भी खेल हुआ करते थे। बरसात आई। बूंदे बरसने लगी। सूखने के लिए रखे गए उपले या कहे तो गोइठे भींगने लगे ....घर की बूढी औरते दौड़-दौड़ कर…