मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Saturday, June 10, 2017

अबोला

कहाँ सोचा था
कि हमारे बीच का 'अबोला,'
इतने शब्द, इतनी ध्वनिया छोड़ जायेगा
कि बदहवास-सी दौडती फिरुंगी
उन्हें आँचल में समेट लेने को
---स्वयंबरा

बोलो न माँ

उन्होंने कहा कि मृत्यु का शोक एक साल तक मनाया जाता है...कोई मांगलिक कार्य नहीं...
पर हमारा दुःख तो जीवन भर का ठहरा.. फिर ?

तय किया कि इसे उत्सव की तरह मनाएंगे....दुःख का उत्सव ...शोक का उत्सव...

तो गीत सुना, गुनगुनाया भी, यायावरी की, बगिया सजाया भी, पेड़-पौधों, चिड़ियों से बातें की...और जब-जब तुम्हारी याद आयी न, बच्चों को गले लगाया भी...

खूब-खूब प्यार भर लिया है मन में..

और तुम्हारे जाने के बाद के छः महीने निकाल ही लिए ...हँसते हँसते...तुम खुश हो न ..अब बोलो भी
--स्वयंबरा

Thursday, June 8, 2017

पीड़ा

यहाँ-वहाँ बिखरे हर्फों को जोड़ दूं...
तो एक मुकम्मल वाक्य बन ही जाएगा
फिर तो तुम पकडे जाओगे ...
पर नहीं करती कोशिश
कि जो कह न सको उसे समझ ही क्यों लूं....
जो बता न सको उसे मान ही क्यूँ लूं
जाओ,
नहीं सुनती तुम्हारे अबोले को
नहीं पढ़ती तुम्हारी खामोशी
कि समझ कर भी ना समझने की टीस
नकारे जाने की पीड़ा से
कम ही दुःखती है यारा
----स्वयंबरा

Monday, June 5, 2017

रेखाएं

माँ कहती थीं
कि कम रेखाओं वाले हाथ सौभाग्य लाते हैं.....
कुछ दिन हुए, नहीं रहीं वो ..
और आजकल
मेरी हथेलियों पर ढेर सारी लकीरें उग आयीं हैं..
-स्वयंबरा

आवारगी

परिंदों का उड़ना
महज अपने आकाश को पाना नहीं होता
वो फड़फड़ाते है पंख
लगाते हैं गोल-गोल चक्कर
कि कभी-कभी
बिलावजह की आवारगी भी
जरुरी है यारा
----स्वयंबरा

शोर

नींद नहीं आती अक्सर
अनंत आवाजों ने
मन की परतों के भीतर
डेरा जमा लिया है
ये अपनी ही सुनाए जातीं हैं
और सारी रात आँखों में कट जाती है
खीझ उठती हूँ ..झल्लाती हूँ..
फटकार भी लगाती हूँ
सब व्यर्थ
पर कल खूब गहरी नींद आयी
जेनरेटर के गड़ गड़
लाउडस्पीकर के बेसुरे कंठस्वर
पटाखों के धमाकों
लोगों के कहकहों के बीच
बेसुध सो गयी
पूरे सात घंटे सोयी रही
आज जाना मैंने
कि 'भीतर के शोर' से बचने के लिए
बाहर,'शोर' का होना जरुरी है यारा
---स्वयंबरा

Sunday, June 4, 2017

अकेलेपन का मान

अकेले रहना किसे पसंद
पर जब मज़बूरी ही हो
कि कोई साथ न हो
तो 'एकांत' खुद की तलाश है - कह देना
और अपने एकाकीपन को
उनकी 'सहानुभूति' में बदल जाने से रोक लेना जरुरी होता है
कि अकेलेपन का भी तो 'मान' होता है यारा
-----स्वयंबरा

ओ सूरज

सूरज...
प्रखर ...तेजस्वी...
इसके बिना जीवन नहीं..
पर कितना अकेला...
अक्सर जी चाहता है कि माथा सहला दूँ.... पूछ ही लूँ - कैसे हो भाई? ठीक ठाक न? खाना वाना हुआ? सोए भी थे या रात भर भटकते रहे?
😊😊

बातें लोगों की

विवाहितों के कन्धों पर ही जिम्मेदारी का बोझ होता है ...कर्तव्य-निर्वहन भी वही करते हैं...बंधे होते हैं...पहले दूसरों की सोचते फिर अपने बारे में ....(उफ़ ये महान लोग)

जबकि अविवाहित तो आज़ाद, जिम्मेदारियों से मुक्त, अपने मन की ही करनेवाले होते हैं...उन्हें किसी की परवाह कहाँ...और परिवार तो पति- पत्नी और बच्चों से ही बनता है तो इस लिहाज से अविवाहितों का तो परिवार ही नहीं तो जिम्मेदारी भी कहाँ..(एकदम उदंड लोग
.....स्वयंबरा

माँ

देखो न
आज तुम्हारी सिलाई मशीन निकाल लिया
सोच रही बेटू के लिए कुछ खिलौने बना दूं
गुड़िया, हाथी, घोड़े से बचपन सजा दूं
××××
सुनो तो
चिड़ियों का दाना-पानी रोज रख आती हूँ
आजकल मैं भी पेड़ पौधों से बतियाती हूँ
तुम्हारी किटी अब भी शैतानी करती है
उसको जोर से फटकार भी लगाती हूँ
××××
अब तो
आती जा रही हो तुम दिनों दिन मेरे अंदर
और एक दिन 'मैं ' पूरी 'तुम' बन जाऊँगी
फिर चली आऊँगी तुम्हारे पास हमेशा के लिए
तुम सोना, मैं लोरी सुनाऊँगी
----स्वयंबरा