Friday, October 26, 2012

बच्चे नहीं जानते....

हमारी महत्वकांक्षाओं  के बोझ तले 'बचपन' वाकई कही खोता जा रहा है...हमें डॉक्टर , इंजीनियर  या आई. ए. एस. चाहिए, एक अच्छा नागरिक नही... परिणामतः बच्चे सभी चीजों से दूर होते जा रहे है, फिर चाहे वो प्रकृति हो , संस्कृति हो , खेल हो या  संवेदनाएं हों ....याद कीजिये हमने अपना बचपन कैसे जिया था...क्या नहीं लगता की बच्चों के साथ हम अन्याय कर रहे है ???  (कविता नहीं भड़ास है मन का) 


बच्चे नहीं जानते,
आम, अमरुद, इमली, जामुन आदि पेड़ों के फर्क, 
कनईल, हरसिंगार, गुडहल के फूलों के रंग,
नहीं लुभाती उन्हें 
गौरैया की चहचहाहट,
मैना की मीठी बोली , 
'होरहा' की सोंधी महक , 
ताज़ा बनते 'गुड' की मिठास, 
कोयले पर सीके 'भुट्टों' का स्वाद ,
 नहीं सुनी कभी 'राजा- रानी' की कहानियां 
'बिरहा' और 'पूर्वी' के आलाप
 महसूसा ही नहीं 
'बगईचा' में झुला झूलने , 
'देंगा-पानी', 'दोल्हा-पाती' खेलने का सुख 
बच्चे  भूल चुके हैं सपने देखना 
'बचपन' नहीं जीते वे 
क्यूंकि जरुरी होता है 'बड़ा' बन जाना , 
तय की है हमने  उनकी 'नियति', 
उन्हें हमारे बनाए 'सांचे' में ही ढलना  है 
और 'इन्सान' नहीं,
एक 'मशीन' बनकर ही निकलना है 
......स्वयम्बरा

Thursday, October 18, 2012

एक उपेक्षित धरोहर !

आरा हाऊस( वीर कुंवर सिंह संग्रहालय), आरा, बिहार 
 कुछ  इमारतें जन क्रांति की मौन गवाह होती हैं. इतिहास का एक पूरा अध्याय इनमे अंकित होता है . ऐसा ही एक भवन है हमारे शहर 'आरा' के 'महाराजा महाविद्यालय' के प्रांगण में स्थित 'आरा हाऊस', जिसका वर्तमान नाम 'वीर कुंवर सिंह संग्रहालय 'है . यह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में देशवासियों के बलिदान का प्रतीक है .


आरा हाऊस के बारे में विस्तृत जानकारी भले ही बहुत बाद में मिली पर इस से  जान-पहचान थोड़ी पुरानी है.. असल में बचपन में अपने बाबा की उँगलियों को पकड़कर  शहर के कई स्थलों को देखा ... जाना. बाबा जहा भी ले जाते,  उसके बारे में अत्यंत विस्तार से बताते. शायद इसलिए बहुत सारी जानकारियाँ मुझे यु ही हो गयी जिसके लिए लोग किताबें  पढ़ते है .  'आरा हाऊस' भी उनमे से एक था. यह भवन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है  क्यूंकि हमारे क्षेत्र में लगभग 'किवदंती' बन चुके 'कुंवर सिंह' का नाम इससे जुड़ा था . वैसे भी कॉलेज, घर के ठीक पीछे स्थित है तो जाना भी आसान था..बाबा वहा ले जाते और 'कुंवर सिंह' की कहानियां सुनाते.  हालाँकि उस वक़्त कहानियों से ज्यादा दिलचस्पी भवन के आधार पर बनी 'अर्धचन्द्राकार खिडकियों ' में होती...लोगो का कहना था कि वो 'सुरंगों' की है...ये सुरंगे आरा से जगदीशपुर जाती है...ये इतनी बड़ी हैं कि कुंवर सिंह घोड़े पर बैठकर सुरंग पार कर जाते थे  ...मैं बड़ी उत्सुकता से उन्हें देखती और सोचती कि कैसे उनके अन्दर जाया जाये...पर कोई लाभ नहीं था क्यूंकि इमारत हमेशा बंद रहती...

इंटर में उसी कोलेज  में नामांकन हुआ ...लड़कियों का कॉमन रूम वही 'आरा हाऊस' था ...लेकिन उस भवन कि महत्ता के बारे में तब भी उतना ही जाना जो 'बाबा' ने बताया था....हाल के बाहर एक शिलापट्ट लगा था, पर उसपर कभी ध्यान नहीं दिया . उस समय भवन भी अत्यंत जर्ज़र हो चूका था...प्लास्टर उखड चुके थे... छत कभी भी गिर सकती थी...आस-पास झाड़-झंखाड़ उग चुके थे ....कॉमन रूम वहा से हटा दिया गया...पता चला कि वह भवन गिराया जायेगा ...कभी-कभी थोडा अजीब लगता ...फिर  अपनी जिन्दगी में मगन हो जाते...

लार्ड कर्ज़न का शिलापट्ट
बी. एस. सी. करने के दौरान एक बार घूमते हुए उस भवन में चली गयी ...वहा शिलापट्ट देखा ..समय काटने के लिए उसे पढने लगी ..पढ़ के हैरान रह गयी ...वह ब्रिटिश भारत के वायसराय लार्ड कर्ज़न का था...इसे 1903 में लगाया गया था...इसपर 1857  की घटना का जिक्र था... लिखा था कि  -
 "............this building was the scene of the memorable defence of Ara by a party consisting......................................This tablet is placed by Lord Curzon, viceroy and governor general of India in 1903." अब मुझे लग चूका था  कि यह भवन वाकई ऐतिहासिक महत्व  का है ...जिसकी दीवारों पर बलिदानियों की गाथा अंकित है... 

वर्ष 1857  में देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ बुलंद हुई थी. शाहाबाद ( वर्तमान भोजपुर, रोहतास, बक्सर, कैमूर ) क्षेत्र से एक अस्सी साल के युवा ने क्रांति का बिगुल फूंका...यह वीर थे जगदीशपुर के जमींदार 'कुंवर सिंह'. इनकी ललकार पर क्षेत्र की जनता भी आन्दोलन में कूद पड़ी . क्रांति की आग दानापुर छावनी तक पहुंची . वहां के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया. वे आरा आये . यहाँ के निवासियों के साथ मिलकर 'आरा हाऊस ' में अंग्रेजों को बंदी बना लिया . यह घेराबंदी कई दिनों तक चली . ब्रिटिश सरकार ने 'कर्नल आयर' को इन्हें छुड़ाने के लिए भेजा. 3 अगस्त, 1857 को आयर और आन्दोलनकारियों के बीच मुकाबला हुआ. विद्रोही बहुत बहादुरी से लड़े,  साधनों के अभाव में हार गए . इस घटना ने देशभर में खलबली मचा दी . आधुनिक अस्त्रों  के बलपर भले ही आन्दोलनकारियों को दबा दिया गया, पर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह घटना अमर  हो गयी .
आरा हाऊस, बाहर से

इस भवन का निर्माण ब्रिटिशों के रेलवे इंजीनियर श्री वईकर्स  व्यायल ने करवाया था, जहा अँगरेज़ अपने मनोरंज़न के लिए जाया करते थे . भवन दो मंजिला है. एक बड़ा हाल  व् दो छोटे कमरे है. चारो और हवादार बरामदा भी है. नीचे शायद तहखाना है (जैसा मुझे लगा ) . पास ही एक कुए का अवशेष है...इतिहास की माने तो ये वह कुआ  है जिसे घेराबंदी के दौरान ब्रिटिशों ने खोदा था. पूरा भवन देखने में अत्यंत मामूली सा लगता है पर जैसे ही इसका जुडाव 1857 की क्रांति से होता है,  वीरों की हुंकार सुनाई पड़ने लगती है . विद्रोह का पूरा दृश्य एकबारगी आँखों के सामने से गुजरने लगता है. यह वो जगह है जिसने इतिहास में 'आरा' के नाम को सुनहरे अक्षरों में अंकित कर दिया. 

कॉलेज से निकलने के बाद भी इस भवन के प्रति लगाव बना रहा, इसलिए जानकारी लेती रही. पता चला भवन को गिराने की बाते बेबुनियाद थी . कुछ साल बाद उस भवन का नवीकरण किया गया..बरामदे में टाइल्स लगा दिया गया...रंग-रोगन किया गया....नया नाम 'वीर कुंवर सिंह संग्रहालय' हो गया है. युवा वहा बैठकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते है...सुनकर अच्छा लगता था...

कचरे का अम्बार
कुछ दिनों पहले वहा गयी...बहुत खुश थी...एक तो यादे दूसरा इमारत की ऐतिहासिकता बेचैन किये थी...बाहर से देखा तो ठीक-ठाक लगा ...सुकून मिला..जैसे ही अन्दर कदम रखा भीषण दुर्गन्ध ने रास्ता रोक लिया  ..बहुत हिम्मत कर अन्दर गयी...देखा की सीढियों पर कचरे का अम्बार लगा था..ऊपर की मंजिल पर बरामदे में कुछ युवा बैठे थे....वह ज़गह साफ़-सुथरी थी..पर हॉल के दृश्य ने रुआंसा कर दिया..चारो ओर कूड़ा पसरा था..ड्रग्स की सूई भी दिखी...लोगो ने हॉल और कमरों को शौचालय में तब्दील कर दिया था ,  जो मल-मूत्र से भरा था...दीवार टूटी हुई थी..बाहर पहले की ही तरह झाड़ उगे हुए थे... इमारत के दूसरे हिस्सों का भी यही हाल था....नए नाम 'वीर कुंवर सिंह संग्रहालय' के अनुरूप कुछ भी नहीं था ...संग्रहालय के नाम पर यह लोगो के साथ किया गया छल है...क्यूंकि एक भी ऐसी चीज़ यहाँ नहीं थी जो संग्रहालय को चरितार्थ करे... यह सब देखने के बाद मन बहुत भारी हो गया....

कचरे का अम्बार,  टूटी दीवार
आरा हाऊस 'कॉलेज प्रशासन' के अधीन है ...इस धरोहर की देख-रेख की  जिम्मेदारी इसी की है...ऐसा भी नहीं दोनों की दूरी ज्यादा है...या कॉलेज के पास इतना भी वित्त नहीं की इसकी नियमित सफाई हो सके ...फिर क्यूँ है इसकी नारकीय स्थिति? क्या कॉलेज  देशवासिओं के बलिदान का  प्रतीक इस भवन की जिम्मेदारी उठाने में अक्षम है ? पर जरा ठहरिये...दूसरों को दोषी ठहराने से हमारी जिम्मेदारी कम तो नहीं हो जाती...भोजपुर  के लोग 'कुंवर सिंह' के नाम की कसमे खाते है...गर्व करते हैं कि  हम उस माटी कि उपज है जहाँ के लोगो ने देश के लिए बलिदान दिया ..पर लगता यह सब झूठ है...दिखावा है...अन्यथा कही से तो आवाज़ उठाई जाती !...भले ही सफाई करने या करवाने के कर्त्तव्य प्रशासन  के सिर मढ़ कर हम खुश हो ले  पर  इससे गंदगी फ़ैलाने का लाईसेंस तो नहीं मिल जाता  ! ...इतनी जिम्मेदारी तो उठाई ही जा सकती है कि हम बलिदानियों  का सम्मान करे और इस भवन की उपेक्षा न करे , ...... क्यूँ !......

---स्वयम्बरा
www.swayambara.blogspot.com









Friday, October 12, 2012

रंगकर्म : मेरा प्रथम प्रेम

(हिंदी रंगकर्म न तो पूरी तरह जीवन यापन का साधन बन पाया और न ही वह हमारे जीवन का जरुरी हिस्सा बन पाया ....देवेन्द्र राज अंकुर )


'Tankaaraa Ka Gaanaa' play : me and co-actor Sanjay Shashwat
वो दिन भी खूब थे...तब जम कर नाटक किया करते थे ...कई सपने देखा करते..नाटको से ये कर देंगे..वो कर देंगे...क्रांति ला देंगे ...आन्दोलन खड़ा कर देंगे ....जब जीवन का संघर्ष सामने आया..तो सारे जोश की हवा निकल गयी...सच तो यही है  कि 'नाटक' कभी हमें दाल-रोटी नहीं दे सकता था....समाज इन्हें बहुत गंभीरता से भी तो नहीं लेता, खासतौर पर हमारे छोटे से शहर में ...फिर सब छूटता गया .... छूटता गया.....हालाँकि आज भी परोक्षतः रंगमंच से जुडी रहती हूँ पर  'अभिनय' किये कई साल हो गए..मेरे जीवन का प्रथम प्रेम जाने कहा विलुप्त हो गया.

'थियेटर' से मेरा लगाव बचपन से रहा है...यह वाकई मेरा पहला-पहला प्यार था और  इतनी शिद्दत से मैंने चाहा कि सारी कायनात इसे मुझसे मिलाने में लग गयी (हा हा हा )..असल में  रंगमंच का  आकर्षण मेरी जीन में ही था...पापा कालेज में और मम्मी स्कूल में नाटक किया करती थी...यानि कि जब मेरा जन्म हुआ तो 'अभिनय' का 'डबल डोज़'  नसों में दौड़ रहा था ...मैंने लगभग चार साल की उम्र में 'मंच' पर  कदम रख दिया था ...पर 'रंगमंच' अब भी बहुत दूर था...अपने मोहल्ले में एक जगह 'पूर्वाभ्यास' हुआ करता था...मै अक्सर वहां चली जाती और अभिनय करते लोगो को मंत्र मुग्ध होकर देखती ...स्थानीय नागरी प्रचारिणी सभागार में 'आला अफसर' नाटक हो रहा  था..हमारे पास भी आमंत्रण  आया ...पापा हम सभी को दिखाने ले गए ..वो पहला नाटक था जिसे मंचित होते देखा था ...ये एक सपना के सच हो जाने जैसा एहसास था...सच मानिये आज  भी उसके  कई दृश्य याद है..

 रंगमंच मेरे लिए बहुत बड़ा आकर्षण था, पर 'अभिनय' का मौका मिलना आसान कहाँ  था.. सपने देखती और खुश हो लेती ..उच्च विद्यालय  में नामांकन हुआ..एक दिन प्रिंसिपल कार्यालय से बुलावा आया...जाने पर पता चला कि अंतर  स्कूल प्रतियोगिता में नाटकों की भी जोर - आजमाइश है...हमारे स्कूल को भाग लेना है...'खोज एक नारी पात्र की' एकांकी था, जिसमे मुझे रानी लक्ष्मी बाई के लिए चुना गया...मुझे लगा जैसे हवा में उड़ने लगी हूँ...अब रंगमंच बिलकुल मेरे पास था..मै उसे छू सकती था...गले लगा सकती थी...मुझसे संवाद बुलवाए और लिखवाए गए...घर आई ..होमवर्क के बजाये 'संवाद' याद किया ....झाँसी की रानी की तस्वीरे देखी...तलवार की मूठ पर हाथ रखने की अदाए सीखी ...बहुत-बहुत खुश थी ...दूसरे दिन स्कूल गयी..लंच के बाद रिहर्सल होना था....देखा कि मेरी सीनियर वही संवाद बोल रही थी जो मुझे लिखवाए गए थे..रिहर्सल में उन्होंने ही लक्ष्मी बाई का रोल किया ...मै चुपचाप देखती रही (अंतर्मुखी हूँ न इसलिए )...मेरा दिल टूट गया था...सपने बिखर गए थे...जिन्दगी नीरस हो गयी थी (हा हा हा...अब उस समय कुछ ऐसा ही एहसास हो  रहा था )...घर आकर खूब रोई ..गुस्से में दूसरे दिन स्कूल भी नहीं गयी ..दोपहर में नीचे से आवाज़ सुनाई दी...सोम्बरा...ए सोम्बरा ...आवाज़ स्कूल के चपरासी कि थी जो मेरे नाम का उच्चारण 'स्वयम्बरा' के बजाये 'सोम्बरा' करता था . उसने सर की एक चिठ्ठी दी ..उसमे स्कूल आने का आदेश था...डरते -सहमते वहाँ  गयी..मुझे उस एकांकी में 'उद्घोषक' का रोल करने को कहा गया.. छोटा सा रोल था पर मै खुश थी...आखिर थियेटर  ने मुझे अपना ही लिया  ....हमारा नाटक हुआ...प्रथम पुरस्कार मिला...इसके बाद मैंने पीछे नहीं देखा...

'MUKHYAMANTRI' PLAY : ME AND MY CO-ACTOR
 खूब नाटक किया...बार-बार का रिहर्सल..स्क्रिप्ट पर लम्बी बहस...एक एक दृश्य पर मंथन...प्रकाश और वस्त्र परिकल्पना पर घंटो माथापच्ची भी थका नहीं पाता. घर-घर घूमकर चंदा मांगते ...टिकट काटते ...कड़ी धूप...कडकडाती ठण्ड..बारिश भी रोक नहीं पाती. किसी भी तरह का अवरोध हमारी प्रतिबद्धता को कम नहीं कर पाता . नाटक करना एक जूनून था..इबादत था...छटपटाहट  की अभिव्यक्ति  का माध्यम था ..हम गर्व करते कि रंगकर्मी है.. अपने शहर का एकमात्र हाल 'नागरी प्रचारिणी सभागार' मंचन के लिए किसी भी तरह से उपर्युक्त नहीं, पर हमारे लिए वह ऐसा मंदिर था, जहा सपने साकार होते...

नाटक एक प्रयोगधर्मी कला है..नाट्य रचना  और प्रस्तुति दोनों  में प्रयोग होते रहते हैं ...इसीलिए यहाँ संख्या महत्वपूर्ण नहीं, नाटकों को 'करते रहने' की महत्ता है....जरुरी नहीं की पचास-सौ नाटक करे ...एक नाटक ही हर मंचन में पूर्व  से भिन्न हो जाता है ...हर बार एक नए अर्थ की सृष्टि होती है, जो नए प्रयोग के लिए बाध्य करता है...स्व. भिखारी ठाकुर रचित 'बिदेसिया' और स्व. सफ़दर हाश्मी लिखित 'औरत' का मंचन हमने कई बार किया...हर बार नए अर्थ उद्घाटित हुए...नयी चीजों का समावेश हुआ

थियेटर करने के दौरान कई समस्यायों से दो चार होना पड़ा, बहुत सारी नयी बाते सीखने-समझने को मिली...असल में नाटक कलाओं का मेल है...यह संगीत, मूर्तिकला, चित्रकला, साहित्य और वास्तु का मिश्रण होता है....रंगकर्म का मतलब ही है सभी कलाओं में निपुणता....हम  रंगकर्मी लगभग सभी कार्य को करना सीख ही जाते है .साहित्य का चस्का मुझे नाटको से लगा . इसने  हमें नए जीवन मूल्य भी  दिए....अबतक की जिन्दगी 'मैं' पर केन्द्रित थी अब समूह का सुख-दुःख अपना लगने लगा ...नाटक एक सामूहिक कला है ..यहाँ परस्पर सहयोग की भावना अपने-आप विकसित हो जाती है... अनुशासन की आदत हो जाती है ...संवेदना पहचान बन जाती है 

 सफदर  हाश्मी कृत 'औरत' इसके लिये मुझे 'सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री' का पुरस्कार मिला.
ग्रैज़ुएशन तक ऐसे ही चला फिर अचानक सब बंद हो गया.. अब 'जीवन' के गंभीरतम सवालों से जूझना था..हम नाटको से दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नहीं कर सकते थे ..पलायन मज़बूरी थी...क्यूंकि या तो इसे अपनाकर  भटकते रहते या सिनेमा और टी. वी. की  ओर रुख कर लेते  (जो अन्दर के रंगकर्मी को गवारा नहीं था)...दूसरी बात, हमारे शहर में नाटको को इतनी गंभीरता से लिया ही नहीं जाता कि इसे कैरियर के रूप में अपनाने कि सोच भी सके...लोगो की नज़र में ये 'बिना काम के काम' है ...जो बिलकुल गैर जरुरी है..इसका महत्व मनोरंजन तक ही सीमित है  ...कुल मिलाकर  समस्या 'व्यावसायिक  रंगकर्म' के नहीं होने से थी..

...कहानी का अंत ये हुआ कि नाटकों की जगह 'सिविल सर्विसेस' की तैयारी शुरू हो गयी . अभिनय  की जगह 'आई. ए. एस.'  बनने का सपना पलने लगा...हालाँकि दो बार मेंस निकलने के बावजूद साक्षात्कार में असफल  रही...खैर , अभिनय ना करने कि पीड़ा अब भी सालती है...अन्दर का कलाकार छटपटाता है ....मन रोता है...वाकई 'पहला प्यार' जिन्दगी भर  याद रहता है ...

---- स्वयम्बरा


Thursday, October 4, 2012

पछताते रह जायेंगे !




... चलिए एक कहानी सुनाती हूँ ..एकदम सच्ची कहानी..एक बिटिया और उसके पापा की कहानी ..मेरी दादी कहा करती  थी कि हमारे खानदान की  परंपरा है 'पान खाना'. ख़ुशी का मौका हो या गम का, 'पान खाना' ही पड़ता .परीक्षा देने जाना हो, यात्रा करनी हो, शुभ काम होनेवाला हो या  हो चूका हो, लगभग  हर मौके पर 'पान' हाज़िर होता .बाबा और दादी तो बड़े शौक से पान खाते थे. ये उनकी दिनचर्या का अनिवार्य हिस्सा था. दादी बाकायदा  पान मंगवाती.. साफ़ करती ... अपने साफ़-सफ़ेद बिस्तर (जिनपर हमारा चढ़ना मना था) पर सूखाती ..काटती  - छांटती ....कत्था पकाती..पान लगाती .. खाती और खिलाती..बचपन में हमें भी पान खूब पसंद आया करता. असल में इसे खाने के बाद जीभ एकदम लाल हो जाती. हमारे लिए ये जादू सरीखा था .  बहुत मज़ा आता. बात इन खुशिओं तक  सीमित  रहती तो अच्छा था पर  'अति सर्वत्र वर्ज्यते' यू ही नहीं कहा गया.  अत्यधिक जर्दा के घुसपैठ ने 'पान खाने' जैसी परंपरा को भयावह रूप दे दिया और हमने अपने पापा को खो दिया .. 
जैसा कहा मैंने 'पान खाना' हमारे खानदान कि अभिन्न परंपरा थी. पापा भी पान खाया करते . हाँ, उनके पान में जर्दा (तम्बाकू) की मात्रा बहुत ज्यादा होती थी.मम्मी मना करती पर वो नहीं मानते. मम्मी ने हम बच्चो से भी कहा कि पापा को जर्दा मत खाने दो. मम्मी की ये बात हमारे  लिए खेल भी बन गयी .  हम  जर्दा (तम्बाकू) का डिब्बा  छिपा दिया करते थे ..पापा  मांगते...हम इतराते, खूब मनुहार करवाते, अंततः  दे देते ..पापा को आदेश देते जर्दा (तम्बाकू) कम खाना है ..पापा भी  दिखाने  के लिए मान जाते, कहते आज खाने दो, कल से नहीं खायेंगे...हम भी खुश और पापा भी खुश . .देखते ही देखते समय निकलता गया.पापा का पान और जर्दा (तम्बाकू) खाना नहीं छूटा.

 हम बड़े हो गए...व्यस्तताएं बढ़ गयी...पापा को बार- बार टोकना बंद हो गया..पर कभी-कभार जरुर शोर मचाते ..मम्मी की तबीयत ख़राब रहने लगी.उनको लेकर  बहुत परेशां रहते..बार-बार खून चढ़ाना, जगह-जगह दिखाना...पापा पर ध्यान देना थोडा कम हो गया था...इसी बीच पापा के भी मूह में दर्द रहने लगा...आशंका हुई पर बेटी का मन, गलत बातो को क्यों कर मान जाता . अब  पापा ने पान खाना छोड़ दिया, पर तबतक बहुत देर हो चुकी थी. एक दिन उन्हें जबरदस्ती  डॉक्टर के पास ले जाया गया. उसने देखते ही कह  दिया -इन्हें ओरल कैंसर है. पटना में बायोप्सी  करा ले. बायोप्सी में कैंसर ही निकला. हालाँकि मन ये मानने को तैयार ही नहीं था. अब भी लग  रहा था कि रिपोर्ट झूठी है .  यकीं था , पापा ठीक हो जायेंगे.  असल में उन्हें कभी बड़ी बीमारी से जूझते नहीं देखा था... और हमारे लिए तो वो 'सुपरमैन' थे , उन्हें क्या हो सकता था .

खैर , महानगरो की दौड़ शुरू हुई . कई अस्पतालों के चक्कर काटे गए. पता चला कि फीड-कैनाल में भी  कैंसर है, फेफड़ा भी काम नहीं कर रहा. डॉक्टर ने बताया कि 'ओपरेशन' और 'कीमो' नहीं हो सकता.' रेडियेशन'  ही एकमात्र उपाय है . सेकाई शुरू हुई, पापा कमज़ोर होने लगे. खाना छूट गया.' लिक्विड  डायट' पर रहने लगे. रेडियेशन पूरा होने के बाद गले का कैंसर ठीक हो गया पर 'ओरल'  ने भयावह  रूप ले लिया. डॉक्टरों  ने भी हाथ खड़े कर लिए. बीमारी बढ़ने लगी.  पहले होठ गलना शुरू हुआ . गाल में गिल्टियाँ  निकलने  लगीं और वो भी गलने लगा. धीरे-धीरे पूरा बाया गाल और दोनों होठ गल गए. घाव नाक तक पंहुचा..साँस लेने में परेशानी होने लगी. खाना पूरी तरह छुट चूका था. शरीर एकदम कमज़ोर हो गया. दावा-दारू काम न आया. ईश्वर ने हमारी 'बिनती' पर  ध्यान नहीं दिया. मित्रो-रिश्तेदारों की शुभकामनाओं की एक न चली. एक दिन  पापा हमें छोड़ कर चले गए. हम अवाक् से थे. सही है कि सबके माता-पिता जाते है पर हम अभी इसके लिए बिलकुल तैयार नहीं थे. वैसे भी 'अडसठ साल' की  उम्र मौत के लिए बहुत ज्यादा नहीं होती, खासतौर पर तब, जब कभी- भी कोई बीमारी न रही हो. पर मौत आयी ..जल्द आयी..समय से पहले आयी, क्यूंकि जर्दा (तम्बाकू)  के सेवन ने उनकी उम्र को दस साल कम कर दिया था. हम रोते रहे, बिलखते रहे, छटपटाते रहे पर क्या हासिल ...पिता का साया उठ जाना बहुत बड़ी बात होती है..हम अनाथ हो गए ..बेसहारा से..

एक साल के अन्दर एक बिटिया के प्यारे से पापा उसे छोड़कर हमेशा के लिए चले गए. पापा के जाने के बाद हर पल याद आया कि कैसे पापा से जर्दा छोड़ देने का  आग्रह करते और पापा हमें फुसला देते ..काश कि पापा ने उसी वक़्त हमारी बाते मान ली होती ... काश कि अपनी बीमारी को बढ़ने न दिया होता.. काश कि... पर 'काश' कहने और सोचने मात्र से कुछ नहीं संभव था . जो होना था वह हो गया. ..छोडिये, अब  कुछ आंकड़े देखिये --- टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के अनुसार हर साल कैंसर के नए मरीजों की संख्या लगभग सात लाख होती है जिसमे तम्बाकू से होनेवाले कैंसर रोगियों की संख्या तीन लाख है और इससे हुए कैंसर से मरनेवाले मरीजो की संख्या प्रति वर्ष दो हज़ार है ...बी. बी. सी. के अनुसार भारत में हर दस कैंसर मरीजों में से चार ओरल कैंसर के है..

पापा ने जबतक  'जर्दा' छोड़ा,  समय हाथ से निकल चूका था . पर बाकि लोग ऐसा क्यूँ कर रहे है? क्यूँ अपनी मौत खरीदते और खाते है? कल खबर देखा कि यू. पी. सरकार ने भी गुटखा  (तम्बाकू) प्रतिबंधित कर दिया ...बिहार और देलही में ये पहले से lagu है. इसके अनुसार गुटखा  (तम्बाकू) बनाने, खरीदने  और बेचने पर प्रतिबन्ध है..किन्तु सच तो यह है  गुटखा (तम्बाकू) खुले आम धड़ल्ले से बेचा-ख़रीदा जाता है...कम से कम अपने राज्य बिहार में तो यही देख रही हूँ...लोग आराम से  खरीदते  है...कोई रोक-टोक नहीं..पाबन्दी नहीं..सरकारे सिर्फ नियम बनाकर कर्त्तव्य पूरा कर देती है.. इसे लागू करने कि उसकी कोई मंशा नहीं होती. तभी तो कही कोई सख्ती नहीं बरती जाती. पुलिस और प्रशाशन के लोग स्वयं इसका सेवन करते है. भाई  लोग,  तम्बाकू का हर रूप हानिकारक है. इसका सेवन करनेवाले अपनी 'मृत्यु' को आमंत्रित करते है.  क्या आप  अपने अपनों से प्यार नहीं करते? फिर  इसकी लत जान से ज्यादा प्यारी कैसे बन जाती है जो  छूटती ही नहीं!  या फिर इच्छाशक्ति का घोर अभाव है, मन से बेहद कमज़ोर, लिजलिजे से हैं . यदि नहीं तो छोड़ दीजिये इस 'आदत' को .  मित्रों  आप तो समझदार है . चेत जाइये.  अरे,   जिम्मेदार नागरिक बने . तम्बाकू का किसी भी रूप में सेवन छोड़े . अपने रिश्तेदारों और मित्रो को भी रोके. कही बिकता देखे तो शिकायत करे . अन्यथा पछताते रह जायेंगे ....






Sunday, September 9, 2012

खुश रहो न !




कई दिनों की बारिश के बाद बादल एकदम चुप से थे..न गरजना न बरसना ... ठंडी हवाएं जरुर रह-रह कर सहला जाती थी...धूली, निखरी प्रकृति की सुन्दरता अपने चरम पर थी ....मुझे पटना जाना था ...ट्रेन में खिड़की वाली सीट मिली (मेरा सौभाग्य )...हमारा सफ़र शुरू हुआ .... दूर तक पसरे हरे-भरे खेत, पेड़ो की  कतारें, बाग़-बगीचे दिखने लगे....मैं  बिलकुल 'खो' सी गयी थी ...कि एक जगह ट्रेन 'शंट' कर दी गयी...माहौल में ऊब और बेचैनी घुलने लगी.. बचने के लिए इधर-उधर देखना शुरू किया कि 'निगाहे' पटरी के पार झाड़ियों में कुछ खोजती औरत पर गयी.....इकहरा बदन ..सांवली रंगत...वह बेहद परेशान दिख रही थी ...पास ही बैठा उसका छोटा सा बच्चा रोये जा रहा था, पर वह, अपनी ही धुन में थी ...मुझे कुछ अजीब सा लगा इसलिए  उन्हें ध्यान से देखने लगी..अचानक उसके हाथ में एक सूखी टहनी नज़र आयी...अब उसके चेहरे पर राहत थी...धीरे-धीरे उसने कई लकड़ियों को इकट्ठा किया ...उसका गठ्ठर बनाया..बच्चे को उठाया और चली गयी....

ट्रेन थोड़ी आगे बढ़ी तो देखा चार-पांच छोटी बच्चियां सिर पर लकड़ियों का गठ्ठर उठाये हंसती -खिलखिलाती चली जा रही थी...बाल बिखरे..ढंग के कपडे नहीं पर उदासियों को ठेंगा दिखाती वो अपने में मगन थी .... सूखी लकड़ियाँ इन लोगो के चूल्हे  की आग  थी, जिसपर पूरे परिवार का भरपेट खाने का सपना पकता होगा ...इसके लिए दर-दर का भटकना भी उनकी मुस्कानों को, हौसलों को कम नहीं कर सकता ...

उस औरत को वहां पसरी गंदगी, रोता बच्चा और झाड़ियों में छिपे विषैले जीव का डर रोक नहीं पाया ...और ये बच्चियां  अपने 'बचपन' में ही 'बड़ी' हो गयी..अभावो में खिलखिलाना सीख लिया ....

इस बरसात में लकड़ियाँ ना मिले तो..... तो उन्हें 'भूखा' ही रह जाना पड़ेगा ...या पानी से ही पेट भर कर तृप्त हो जाना पड़ेगा और गर कई दिनों तक बारिश होती रहे तो ??? ...पर उन्हें परवाह कहा ...

और एक 'हम' है जो 'गैस' ख़त्म हो जाने पर आसमा सिर पर उठा लिया करते है...कुकर, रेफ्रीजेरेटर, अवन के बिना हमारा काम ही नहीं चलता.. हर बात पर हाय-तौबा मचाते है..सारी सुविधाओं के होने के बावजूद असंतुष्ट रहते है ... असल में इस भागती हुई जिन्दगी में कुछ पल ठहरकर, रूककर सोचने की 'जरुरत' है कि 'हमारी जरूरते' जिस अनुपात में बढ़ रही है 'खुशियाँ'  उसी अनुपात में घटती नहीं जा रही है?? जरा सोचिये!

Friday, July 27, 2012

'डायन' : एक स्त्री की चीख !


वे बचपन के दिन थे ....मोहल्ले में दो बच्चों की मौत होने के बाद काना-फूसी शुरू हो गयी और एक बूढी विधवा को 'डायन' करार दिया गया...हम उन्हें प्यार से 'दादी' कहा करते थे...लोगो की ये बाते हम बच्चों तक भी पहुची और हमारी प्यारी- दुलारी दादी एक 'भयानक डर' में तब्दील हो गयी... उनके घर के पास से हम दौड़ते हुए निकलते कि वो पकड़ न ले...उनके बुलाने पर भी पास नहीं जाते ...उनके परिवार को अप्रत्यक्ष तौर पर बहिष्कृत कर दिया गया ....आज सोचती हूँ तो लगता है कि हमारे बदले व्यवहार ने उन्हें कितनी 'चोटे' दी होंगी ...और ये सब इसलिए कि हमारी मानसिकता सड़ी हुई थी....जबकि हमारा मोहल्ला बौद्धिक (?) तौर पर परिष्कृत (?) लोगो का था ..!

वक़्त बीता ..हालात बदले....पर डायन कहे जाने की यातना से स्त्री को आज भी मुक्ति नहीं मिली है.... अखबार की इन कतरनों को देखिए ...बिहार के एक दैनिक समाचार-पत्र में इसी माह की 7 से 12 तारीख के बीच, ऐसी चार खबरे छपी....यानी की छह दिनों में चार बार ऐसी घटना हुई .....जिनमे से दो में 'हत्या' कर दी गयी ....पर इससे ये कतई न सोचे कि बिहार में ही ऐसी अमानवीय  प्रथाएं हैं... ये बेशर्मी यही  तक ही सीमित नहीं...संयुक्त राष्ट्र संघ ने वर्ष 2003 में जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में 1987 से लेकर 2003 तक, 2 हजार 556 महिलाओं को डायन कह कर मार दिया गया ..... एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार अपने देश में 2008-2010 के बीच डायन कहकर 528 औरतों की हत्या की गयी .....क्या ये आंकडे चौकाने के लिए काफी नहीं कि मात्र एक अन्धविश्वास के कारण इतनी हत्याएं कर दी  गयी??? ....राष्ट्रीय महिला आयोग के मुताबिक भारत में विभिन्न प्रदेशों के पचास से अधिक जिलों में डायन प्रथा सबसे ज्यादा फैली हुई है ...मीडिया के कारण (भले ये उनके लिए महज टी. आर. पी. या सर्कुलेशन बढ़ने का तमाशा मात्र हो) कुछ घटनाये तो सामने आ जाती है पर कई ऐसी कहानिया दबकर रह जाती होंगी ...बेशक ये बाते आपके-हमारे बिलकुल करीब की नहीं .....गाव-कस्बो की है...किसी खास समुदाय या वर्ग की है पर सिर्फ इससे, आपकी-हमारी जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती ...

ध्यान दे, ये महज़ खबरे नहीं, जिन्हें एक नज़र देखकर आप निकल जाते है....इनमे एक स्त्री की 'चीख' है...उसका 'रुदन' है.... उसकी 'अस्मिता' के तार-तार किये जाने की कहानी है ...अन्धविश्वास का भवर जिसका सबकुछ डुबो देता है .....और हमारा समाज इसे 'डायन' कहकर खुश हो लेता है ....

'डायन'....क्या इसे महज अन्धविश्वास, सामाजिक कुरीति मान लिया जाये या औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका...आखिर डायन किसी स्त्री को ही क्यूँ कहा जाता है?? क्यूँ कुएं के पानी के सूख जाने, तबीयत ख़राब होने या मृत्यु का सीधा आरोप उसपर ही मढ़ दिया जाता है?? असल मैं औरते अत्यंत सहज, सुलभ शिकार होती है क्यूंकि या तो वो विधवा, एकल, परित्यक्ता, गरीब,बीमार, उम्रदराज होती है या पिछड़े वर्ग, आदिवासी या दलित समुदाय से आती है.... जिनकी जमीन, जायदाद आसानी से हडपी जा सकती है... ये औरते मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से इतनी कमजोर होती है कि अपने ऊपर होने वाले अत्याचार की शिकायत भी नहीं कर पाती.... पुलिस भी अधिकतर मामलों में मामूली धारा लगाकर खानापूर्ति कर लेती है...हैरानी होती है कि लगभग हर गाँव या कस्बे में किसी न किसी औरत को 'डायन' घोषित कर दिया जाता है... मैंने कही नहीं देखा कि कभी किसी पुरूष को डायन कहा गया हो...या इस आधार पर उसकी ह्त्या कर दी गयी हो..... क्यूंकि ऐसे में अहम् की संतुष्टि कहा हो पाएगी... और यह बात कहने-सुनने तक ही कहा सीमित होती है....जब भीड़ की 'पशुता' अपनी चरम पर पहुचती है तब डायन कही जानेवाली औरत के कपडे फाड़ दिए जाते है...तप्त सलाखों से उन्हें दागा जाता है...मैला पिलाया जाता है...लात-घूसों, लाठी-डंडों की बौछारें की जाती है ...नोचा-खसोटा जाता है और इतने पर मन न माने तो उसकी हत्या कर दी जाती है....उनमे से कोई अगर बच भी जाये तो मन और आत्मा पर पर लगे घाव उसे चैन से कहा जीने देते है...'आत्महत्या' ही उनका एकमात्र सहारा बन जाता है ....

औरतों पर अत्याचार और उनके ख़िलाफ़ घिनौने अपराधों को लेकर अक्सर आवाज़ उठाई जाती है..... लेकिन ऐसी घटनाये हमें हमारा असली चेहरा दिखाती है..हम स्वयं को सभ्य कहते और मानते है पर इनमे हमारा खौफनाक 'आदिम' रूप ही दीखता हैं ....हमने इसकी आदत बना ली है और ये शर्मनाक हैं....पर हम भी, पूरे बेशर्म है !

Thursday, June 21, 2012

इस शहर में हर शख्स परेशां सा क्यूँ है



'अपना बिहार' दोड़े जा रहा है विकास की पटरी पर...बड़े-बड़े दावे ....बड़ी-बड़ी बातें...खूब बड़े आंकडे .....सब कहते है विकास हो रहा है...मै भी गर्व से भर जाती हूँ...अकड़ जाती है गर्दन...पर जब पीछे मुड़कर देखती हूँ तो वही बेहाल, परेशां, बेचारे से लोग नज़र आते है....जिनसे उनका हक छीन लिया गया है....आबोहवा के बदलने का अहसास तो है पर कहानी अब भी यही है कि धनबल, बाहुबल या ऊँची पहुँचवाले ही 'सस्टेन' कर सकते है ....आप ये न समझना कि मै यूँ ही आंय- बांय बके जा रही हूँ ...हमारे घर में एक पत्रकार, एक वकील है (और मै कलाकार हूँ ही)...इनके पास जिस तरह के 'केसेज' आते है वह चकित कर देनेवाला होता है.....बहुत छोटे स्तर से ही अफसरशाही, पुलिस और दबंगों की दबंगई शुरू हो जाती है...जनता हलकान होती है, यहाँ-वहां भागती फिरती है और 'इनकी' मौज होती है,,,जरा बानगी देखिए

१. एक शिक्षक की जमीन पर इलाके के 'दबंग' ने कब्ज़ा कर लिया...प्राथमिकी दर्ज करने गए शिक्षक को थानेदार ने भगा दिया...धमकी भी दी कि ज्यादा तेज़ बनोगे तो झूठे मुक़दमे में 'अन्दर' कर देंगे......अदालत की शरण ली गयी....मामला अभी कोर्ट में चल ही रहा था की 'दबंग' ने उस पर मकान बनवाना शुरू कर दिया..... एस.डी. ओ. ने धरा १४४ लगाया..थानेदार ने मानने से इनकार कर दिया.....

२. हाल में हुई शिक्षक नियुक्ति में नियोजित हुए एक मेधावी युवक का वेतन बिना किसी कारण के रोक दिया गया...उसका नाम भी लिस्ट से गायब हो गया,,,उसकी जगह किसी और की बहाली हो गयी...युवक, अफसरों के पास खूब दौड़ा....गिड़गिड़ाया ...पर किसी ने उसकी बात नहीं सुनी...अंततः वह हाई कोर्ट, पटना गया.. वहा उसके पक्ष में फैसला हुआ....पर शिक्षा विभाग ने उस फैसले को मानने से इनकार (?) कर दिया .....है न हैरान करनेवाली बात!

३. 'आंगनबाड़ी सेविका' पद के लिए आवेदन माँगा गया...नियुक्ति उसकी की गयी जिसका प्राप्तांक कम था ( aakhir kyun, जरा sochiye) अधिक प्राप्तांक वाली विवाहिता को बताया गया कि चूँकि ये पद सरकारी है और उनका देवर सरकारी पद (शिक्षा मित्र) पर है इसलिए उनकी नियुक्ति नहीं हो सकती....आर . टी .आई. के तहत जानकारी मांगने पर पता चला कि उक्त पद सरकारी नहीं है....

क्या कहेंगे इसे? विकास? सुशासन? खुशहाली? ..ये तो हमारी नज़रों में आ गए पर ऐसी न जाने कितनी  घटनाएँ है....ये बाते गाँव की है इसलिए  इनपर शोर भी नहीं होता...ये ख़बरें मीडिया के भी किसी काम की नहीं ...आपको भी ये बाते छोटी लग रही होंगी जो आस-पास बिखरी पड़ी रहती है ....पर इन बातो से ही 'विकास; की बाते बेमानी लगने लगती है.....

Friday, March 23, 2012

बन्दर मामा,मम्मी आ गयी है!!अब डराकर दिखाओ!


आज कल हमारे शहर में बंदरों का आतंक बढ़ गया है ..ये हर वक़्त पूरी फौज के साथ चलते है... हर दूसरे दिन हमारे घरों पर धावा बोलते हैं और सब कुछ तहस-नहस कर देते है (वैसे जब हमने उनके आशियाने को उजाड़ दिया है तो शिकायत का हमें  अधिकार कहाँ? ) ..फलों के पेड़ वाले घर  खास तौर पर निशाना बनते हैं ...हमारे घर में भी एक अमरुद का पेड़ है.. उसपर फल लदे पड़े हैं...पर क्या मजाल की हम एक  भी चख सकें ..'हुजुर लोगों' से इतनी मिन्नतें करते है फिर भी उन्हें दया नहीं आती ....हम देखते रह जाते  है और वो...वो तो पेड़ पर बैठ कर मज़े में फलों को खाते है ...कुछ को चखते है ....शेष को फेंक देते है ...इन महानुभावों के डर से हमने अपने घरों में ग्रिल लगा लिया है... गली मोहल्ले में भी ये अपनी हुकूमत चलाते  रहते है...हश, हुश ...हश, हुश करने ,  डंडा लेके उन्हें डराने का प्रयास भी बेकार हो जाता है ..उल्टा उनके डर से हम ही छिप-छिप कर निकलते है... होलीवुड की एक मूवी  'प्लानेट ऑफ़ एप्स'  के मानव प्रजाति जैसे हमारे 'हालात' हो गए  है...एकदम 'बेचारे' से...
खैर अब मुद्दे पर आती हूँ ....कल की घटना है ...एक ढाई-तीन साल बच्चा , वाटर बोतल घुमाते हुए, उछल-कूद करते हुए, अपने में मगन गली में चला आ रहा था कि अचानक एक 'बन्दर' कूद के सामने आ गया.. बच्चा डर गया ...जोर-जोर से रोने लगा ...'बन्दर' ने उसपर एक मामूली दृष्टि डाली और  वही खड़े सब्जी के ठेले पर चढ़ गया...अब 'बच्चे' को गुस्सा आया ....उसने  हिम्मत की और ठेले पर चढ़े 'बन्दर' को चिल्ला-चिल्ला कर डांटने लगा...'बन्दर' ने ये देखा तो  वो भी गुस्सा हो गया ..उसने भी दांते निकालकर 'बच्चे' को डराया...'बच्चा'  डर कर पीछे भागा....'बन्दर' अब सब्जियां खाने लगा...'बच्चे' ने फिर से हिम्मत बटोरी और दूर से ही 'बन्दर' पर गुस्साने लगा ...'बन्दर' ने अब तक 'बच्चे' को कमज़ोर मान लिया था लिहाज़ा उसने ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा ...तब तक 'बच्चे' की 'मम्मी' आ गयी...  वो बच्चे का हाथ पकड़कर जाने लगी ......पीछे से कुछ लोगो ने 'बच्चे' से कहा -"कुछ कर देता तो  ...तुम ऐसा क्यूँ कर रहे थे?"

इसपर वो 'बच्चा'  एकदम से पलटा...दौड़कर 'बन्दर' के पास गया .... उसे चिढाते हुए तोतली बोली में जोर से बोला-"बन्दर मामा,  ओ बन्दर मामा!! मम्मी आ गयी  है!!अब डराकर दिखाओ!! "उसकी बात सुनकर वहा खड़े हम सब ठहाका लगाये बिना नहीं रह  सके.

Thursday, March 22, 2012

मैंने नेत्रदान किया है..और आपने ?


कई साल पहले की बात है ...शायद बी. एस सी. कर रही थी ..मेरी आँखों में कुछ परेशानी हुई तो डोक्टर के पास गयी..वहां नेत्रदान का पोस्टर लगा देखा... पहली बार इससे  परिचित हुई...उत्सुकता हुई तो पूछा, पर पूरी व सही जानकारी नहीं मिल पाई ....डॉक्टर ने बताया कि अभी हमारे शहर में ये सहूलियत उपलब्ध नहीं, पटना से संपर्क करना होगा ...फिर मै अपने कार्यों में व्यस्त होती गयी...सिविल सर्विसेस की तैयारी में लग गयी. हालाँकि इंटरव्यू  तक पहुँचने के बाद भी  अंतिम चयन नहीं हुआ ..पर इसमें कई साल निकल गए, कुछ सोचने की फुर्सत नहीं मिली...उसी दौरान एक बार टीवी पर ऐश्वर्या राय को नेत्रदान के विज्ञापन में देखा था....मुझे अजीब लगा कोई कैसे अपनी आंखे दे सकता है ?  आंखे न हो तो ये खूबसूरत दुनिया दिखेगी कैसे?  फिर सोचा जो नेत्रदान करते है वो निहायत ही भावुक किस्म के बेवकूफ होते होंगे.... कुछ साल इसी उधेड़-बुन में निकल गए...फिर एक आलेख पढ़ा और नेत्रदान का वास्तविक मतलब समझ में आया...' नेत्रदान' का मतलब ये है कि आप अपनी मृत्यु के पश्चात् 'नेत्रों ' के दान के लिए संकल्पित है...वैसे भी इस पूरे शरीर का मतलब जिन्दा रहने तक ही तो है....मृत्यु के बाद शरीर से कैसा प्रेम? मृत शरीर मानवता के काम आ जाये तो इससे बड़ी बात क्या हो सकती है, है न?. 

सोचिये, जिनके नेत्र नहीं, दैनिक जीवन  उनके लिए कितना दुष्कर है ... छोटे-छोटे कार्यों के लिए दूसरों पर निर्भरता ..अपने स्नेहिल संबंधों को भी न देख पाने का दुःख ...कितनी  बड़ी त्रासदी है...यह कितना कचोटता होगा, है न! ....नेत्रहीन व्यक्ति के लिए ये खूबसूरत, प्रकाशमय दुनिया अँधेरी होती है (यहाँ बाते सिर्फ शारीरिक अपंगता की है,  कई ऐसे लोग है जो नेत्रों के नहीं होने पर भी  दुनिया को राह दिखने में सक्षम  हुए, जबकि कई नेत्रों के होते हुए भी अंधे है) .

बहरहाल, अभी कुछ महीने पहले फेसबुक पर ऐसे एक विज्ञापन को देखा.एक बार फिर 'नेत्रदान' की बाते जेहन में घूमने  लगी ..उस तस्वीर को मैंने अपने वाल पर भी लगाया...उसी एक क्षण में मैंने संकल्प लिया कि मुझे नेत्रदान करना है ..पता करने पर मालूम चला कि इसके लिए सरकारी अस्पताल में फॉर्म भरना होता है...हमारे छोटे से शहर में सदर अस्पताल है... वहां  जाकर फॉर्म माँगा तो कर्मचारी चौंक गया ..उसने ऊपर से नीचे तक घूरकर देखा, जैसे की  मै चिड़ियाघर से  भागा हुआ जानवर हूँ ..फिर शुरू हुई फॉर्म खोजने की कवायद ...कोना-कोना छान मारा गया पर फॉर्म नहीं मिला ( सोचिये, इतने हो-हल्ला  के बावजूद इस अभियान का क्या हाल है) ...कहा गया कि एक सप्ताह बाद आये ...गनीमत है एक सप्ताह बाद एक पुराना फॉर्म मिल गया ...हालाँकि उस फॉर्म की शक्ल ऐसी थी एक बार मोड़ दे तो फट जाये...
अब सुने आगे की दिलचस्प कहानी..मेरा भाई अनूप फॉर्म ले कर आया ..तब मै और मेरे अन्य भाई-बहन  मम्मी  के पास बैठे थे...हंसी-मजाक का दौर चल रहा था...अनूप आया उसने मुझे देने के बजाये मम्मी को फॉर्म दे दिया..मम्मी ने अभी पढना ही शुरू किया था कि मेरे शेष भाईयों ने भयानक अंदाज़ में (हालाँकि सब हंसने के मूड में ही थे ) मम्मी को बताना शुरू किया की वो किस चीज़ का फॉर्म है...मम्मी रोने लगी और फॉर्म के टुकड़े-टुकड़े कर दी ...बोलने लगी.. तुमको कौन सा दुःख है जो ऐसा चाह रही हो..लाख समझाने पर भी नहीं समझ पाई की नेत्रदान असल में क्या है ..उलटे मुझे खूब डांट पिलाईं कि ऐसा करना महापाप है...मतलब यह कि उन्हें भी वही गलतफहमियां है जो आमतौर पर लोगों को है...ये बात बताने का मकसद भी यही है  कि  नेत्रदान संबधित भ्रांतियों को समझा जाये...हालाँकि मैंने बाद में फिर फॉर्म लिया और उसे भर दिया....

अब थोड़ी जानकारी...आँखों का गोल काला हिस्सा 'कोर्निया' कहलाता है.. यह बाहरी वस्तुओं का बिम्ब  बनाकर हमें दिखाता  है.. कोर्निया पर चोट लग जाये, इस पर झिल्ली पड़ जाये या धब्बे हो जायें तो दिखाई देना बन्द हो जाता है..हमारे देश में करीब ढ़ाई लाख लोग कोर्निया  की समस्यायों से ग्रस्त  हैं..जबकि करीब 1करोड़ 25 लाख लोग दोनों आंखों से और करीब 80 लाख एक आंख से देखने में अक्षम हैं. यह संख्या पूरे विश्व के नेत्रहीनों की एक चौथाई है. किसी मृत व्यक्ति का कोर्निया मिल जाने से ये परेशानी दूर हो सकती है ...डाक्टर किसी मृत व्यक्ति का कोर्निया तब तक नहीं निकाल सकते जब तक कि उसने अपने जीवित होते हुए ही नेत्रदान की घोषणा लिखित रूप में ना की हो..ऐसा होने पर मरणोपरांत नेत्रबैंक लिखित सूचना देने पर मृत्यु के 6 घटे के अन्दर कोर्निया  निकाल ले जाते हैं..किंतु जागरूकता के अभाव में यहाँ  नेत्रदान करने वालों की संख्या बहुत कम है. औसतन 26 हजार ही दान में मिल  पाते हैं... दान में मिली तीस प्रतिशत आंखों का ही इस्तेमाल हो पाता है क्यूंकि ब्लड- कैंसर, एड्स जैसी गंभीर बीमारियों वाले लोगों की आंखें नहीं लगाई जाती ...  धार्मिक अंधविश्वास के चलते भी ज्यादातर मामलों में लिखित स्वीकृति के बावजूद अंगदान नहीं हो पाता....दूसरी तरफ मृतक के परिजन शव विच्छेदन के लिए तैयार नहीं होते.... अंगदान-केंद्रों को जानकारी ही नहीं देते  ..हमारे देश के कानून में मृतक की आंखें दान करने के लिए पारिवारिक सहमति जरूरी है, यह एक बड़ी बाधा है...जबकि चोरी-छिपे, खरीद-फरोख्त कर अंग प्रत्यारोपण का व्यापार मजबूत होता जा रहा है...

अंधता-निवारण एक बड़ी चुनौती है. भारत दुनिया का पहला देश है, जहां 'नेत्रहीन नियंत्रण राष्ट्रीय कार्यक्रम' चलाया जा रहा है... अपने देश की मात्र एक फीसद आबादी  प्रतिवर्ष नेत्रदान का संकल्प ले  तो अनेक दृष्टिहीन  "दृष्टि' पा सकते हैं.....इसके लिए लोगों को जागरूक करने की जरूरत है, उनके डर को दूर करने की जरुरत है, अन्धविश्वास को ख़त्म करने की जरुरत है... बताया जाना चाहिए कि प्रत्यारोपण, सिर्फ कार्निया का होता है ... पुतली का नहीं... जिस तरह धन-संपत्ति  के लिए वसीयत तैयार की जाती है, वैसी ही वसीयत नेत्रदान के लिए भी तैयार की जानी चाहिए....

'नेत्रदान' के द्वारा हम किसी इन्सान को इस खूबसूरत  दुनिया को निरखने का अवसर दे सकते है....उसे दृष्टिहीनता के अंध -कूप से बाहर निकल सकते है ...वैसे भी किसी के काम आ जाने में जो सुख है वो यूँ ही जीवन गुजार देने में कहा...तो मित्रो 'नेत्रदान' करे ...यकीन माने आप हमेशा खुश रहेंगे !! आमीन!!

Sunday, March 18, 2012

पिता का होना कितना बड़ा संबल है

पिता का होना कितना बड़ा संबल है...साहस है.... पापा के ऐसे बीमार पड़ने पर इस तथ्य को पूरी तरह समझ पा रही हूँ...उन्हें कैंसर है....नहीं जानती कि क्या होगा, 'उम्र' और अन्य दूसरी बीमारियाँ उनके इलाज में बाधक बन रही है ...पिछले ८-९ महीने से ठोस आहार नहीं ले पा रहे ...बहुत कमज़ोर हो गए है ...और मै बेबस हूँ .

पापा के व्यक्तित्व से हम सब बहुत प्रभावित रहे है .... सरल  और कठोर ...सबके मददगार .. किसी के सामने नहीं झुकनेवाले .. लोगों से घिरे रहनेवाले..और गुस्सा ऐसा जैसे वाकई बिजलियाँ कड़कने लगी हों . आवाज़ में ऐसी बुलंदी की पुकार दे तो मोहल्ला दौड़ा चला आये ... हम सबके आदर्श...

बचपन में हम भाई-बहन हमेशा पापा के इर्द-गिर्द ही रहा करते ..पापा के आने का घंटों इंतजार करते ...उनसे लड़ना- झगड़ना, लाड जताना, साथ में खाना, खेलना हमारी आदत थी...हम सब पापा के दुलारे रहे है ( हालाँकि बचपन में मै खुद को ज्यादा खुशनसीब मानती थी...अपने मने...हा हा हा ) पापा के पास बैठने के लिए हममे झगडा होता ..सारी बाते पापा से होती.. मम्मी की डांट से बचने के लिए पापा या बाबा-दादी का सहारा लेती. जब पापा बाज़ार से हमारे लिए पेंसिल, रबर, टॉफी या इसी तरह कि कुछ अन्य चीजें लाते तो हमारे इतराने कि कोई सीमा नहीं होती...मजाल था कि तब उसे कोई छू भी लेता!! पापा के कोर्ट में लिट्टी और समोसा बहुत स्वादिष्ट बनता , मम्मी के विशेष  डिमांड के बाद पापा उसे ले आते और तब हमारी 'पार्टी' ही मन जाती .

पापा मेरे लिए "सुपर स्टार" रहे है...ये "सुपर स्टारडम"  मैंने यूँ ही नहीं दिया था ...एक तो वे मेरी सभी इच्छाओं की पूर्ति करनेवाले थे,  दूसरी तरफ मुझे लगता था कि मेरे पापा को पूरी दुनिया पहचानती है ( ये अलग बात है कि  उस वक़्त मेरी पूरी दुनिया, मेरा छोटा-सा कस्बाई शहर था, जहाँ सब, एक-दूसरे को जानते थे). जब मेरी दोस्तों के पापा कहते -'तुम सुधीर बाबु / भईया / भाई कि बेटी हो, वो बहुत अच्छे  है, इस शहर में कोई भी कार्यक्रम उनके बिना नहीं हो सकता ", तो गर्व की अनुभूति होती, खुश भी होती कि अब इस दोस्त के घर आने-जाने कि अनुमति आसानी से मिल जाएगी (बालमन का स्वार्थ... हा हा हा ). घर आकर खूब खुश होकर पापा से बताती. पापा मेरी बाते सुनते,  मुस्कुराते इस गर्वानुभूति ने तब आसमान छू लिया जब मेरे स्कूल के 'प्रिंसिपल' भी पापा के दोस्त निकले...फिर तो दोस्तों के बीच इसे खूब 'इतरा' कर बताया था...हाँ , पापा की आँखों से मुझे बहुत डर लगता था  (अब भी लगता है ). उनकी डांट से ज्यादा डर उनकी गुस्से में बड़ी हो जाती आँखों से लगता था. जब कभी मुझसे कोई गलती होती तो पापा की आंखे गुस्से से बड़ी-बड़ी हो जाती ...और मेरी आँखों से आंसू बहने लगते..

एक बार अंतर स्कूल प्रतियोगिता में भाषण, ग़ज़ल गायन, भजन गायन और थ्री लेग्स इवेंट में भाग लिया था ..मुझे सब में पुरस्कार मिला ...खूब शाबाशियाँ मिली ..पापा को बधाई दी गयी...वहा लोग उन्हें  'स्वयम्बरा के पापा' के रूप में पहचान रहे थे...पापा का चेहरा चमक रहा था ...उन्हें इतना खुश पहले नहीं देखा ...उन्होंने कुछ कहा नहीं पर आंखे सबकुछ कह गयी. पापा-मम्मी  ने हमें किसी काम के लिए नहीं रोका..हमेशा भरोसा और विश्वास होने की बाते की..हममे आत्मविश्वास पैदा किया...

पापा बीमार है...कमज़ोर भी....मै कुछ नहीं कर पा रही.... हर पल प्रार्थना करती हूँ कि पापा को तकलीफ न हो..वो जल्दी ठीक हो जाये ...हालाँकि नहीं जानती कि कि क्या होगा पर पापा को ऐसे देखकर भीतर ही भीतर  कुछ दरक रहा है ...
क्रमश :

Thursday, March 15, 2012

ज्ञान्ति : जिन्दगी अब भी 'खूबसूरत' है

 नाम है ज्ञान्ति....उम्र करीब बीस साल...घर-घर में चौका-बर्तन करके अपना और अपने तीन बच्चों का पेट पालती है...आँखों में एक ही सपना संजोये है कि बच्चे पढ़-लिख जाएँ...उन्हें अच्छे संस्कार मिले...आप सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्या है... ऐसी कहानियों से तो रोज ही दो-चार होना पड़ता है ....पर जनाब, इस एक कहानी में जो जिजीविषा है वो हम भाषण देनेवालों में नहीं....हम बोलते बहुत है पर जिन्दगी जब इम्तहान लेने लगती है तो हमारे पसीने छुट जाते है...और यहाँ??? यहाँ तो कड़ी मिहनत, समाज के तीखे तेवरों के बावजूद चेहरे से मुस्कराहट जाती ही नहीं...वो छम-छम करती आती है....गुनगुनाती हुई घर के काम करती है और चली जाती है ...

पर यह सबकुछ जितना आसान, खूबसूरत, सुकून से भरा दिखता है उतना है नहीं...जानते है क्यूँ??? जनाब, वो
एक  विधवा है ... जवान भी ... ईश्वर ने खूबसूरती भी दोनों हाथो से लुटाई है....और ये सभी बाते उसके खिलाफ जाती  है... kyunki चाहे लाख दावा कर ले पर रूढ़ियाँ और मानसिक विकृतियाँ अब भी हमें जकड़े हुए है ... समाज  विधवा को हेय दृष्टि से देखता है...मांगलिक कार्यों में उसका होना अशुभ  है तो दूसरी तरफ वह आसानी से उपलब्ध  'सर्वभोग्या'  है..जैसे कि पुरुष (पति) के  न होने पर स्त्री सड़क पर पड़ी वस्तु बन जाती हो  ....सोचिये तो हम कहा चले आये है..21 सदी में है...स्त्री-पुरुष समानता की बाते जोर-शोर से हो रही है, पर समाज के किसी कोने में स्त्री-अस्मिता आज भी सिसकती रहती है...
 
खैर, छोडिये  ...अब  कहानी 'ज्ञान्ति' की ...बाल विवाह हुआ था , यही कोई 6 साल पहले..तब उसकी उम्र 14 साल की थी...(अब सरकार चाहे लाख दुहाई दे 18 साल से कम उम्र में लड़कियों की शादी अभी भी हो रही है, वैसे ही, जैसे कानूनन अपराध घोषित होने के बावजूद 'दहेज़' एक स्वीकृत परंपरा है) ..6 सालों में तीन बच्चे हुए..पति, कभी कमाता, कभी नहीं...पीने में सारे पैसे उडाता...नशे की हालत में पत्नी को मारना उसकी आदत थी.. फिर भी वो ज्ञान्ति का 'देवता' था (जैसा की हम भारतीय स्त्रिओं के होते है-पति परमेश्वर ??) ...और एक दिन 'पति' का 'अपनी मां' से झगडा हुवा..उसने जहर खा लिया और मर गया...

.
ज्ञान्ति की अबतक की जिन्दगी भी संघर्षरत थी पर पति के मरने के बाद समाज की  नज़रें  बदल गयी ...एक नए सच से परिचय हुआ...पति का दसवां भी नहीं हुआ कि 'देवर' ने अपना 'रंग' दिखाना शुरू कर दिया ...नियत बदल गयी...रात में उसके कमरे का दरवाज़ा खोलने का प्रयास करने लगा...ज्ञान्ति ने एक बार बहुत पूछने पर बताया -"दीदी, देवर के बुरा नज़र हमरा पर बा...ऊ कहता कि तहरा हमरे संगे रहे के बा ...सास भी विरोध नईखी करत...बाकिर हम ता लताड़ देले बनी...खूब बोलले बानी".


ज्ञान्ति के नहीं मानने पर देवर ने पंचायती (कुछ रिश्तेदारों को बुलाकर किसी बात पर संवाद करना) कर उसपर शादी का दबाव डाला... मैंने कहा कि शादी क्यूँ नहीं कर लेती?..तो ज्ञान्ति बिलख पड़ी ..उसने  एक अजीब बात बताई, कहा -"दीदी हम बियाह कर लेती बाकि ऊ कहता कि हमर बेटीयन से ओकरा कोई मतलब ना रही, आ हमरो  मतलब न रखे दिही ..बाकिर बेटा के अपना संगे राखी ..ता बताई कि हम आपन बेटी सब के कैसे पालब-पोसब...ओकरा सब के अनाथ जैसन कैसे छोड़ दिहब. हमरा नइखे करके बिअह..केतना लोग रहेला..हमहू रह लेब ...हमरा आपन बाल-बच्चा के लायक बनावे के बा...बस."


 
उसके बाद कि कहानी ये है कि शादी से इंकार करने के 'अपराध' में ससुराल ने उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया है ...वह अलग रहती है ...सूरज उगने से पहले जाग जाना और सबके सोने के बाद बिस्तर पर जाना उसकी नियति बन चुकी है...अपने घर के काम-काज निपटा कर वह निकल जाती है अपनी 'कर्मभूमि' की ओर...पांच घरों में  चौका-बर्तन करती है , जिसमे हमारा घर भी शामिल है...हाल में उसने मुझसे अपना नाम लिखने भर 'पढने' की इच्छा ज़ाहिर की है ...

 ...
समाज विकृत इशारे करता है...प्रलोभन देता है ...आरोप भी लगाता है ...ज्ञान्ति कभी अनदेखा करती है  कभी गालिओं की बौछार  कर देती है...बार- बार उसे खुद को  साबित करना पड़ता है ... ' परिश्रम' ही उसका एकमात्र संबल है ..और बच्चे जीने का आधार ... कठोर श्रम और उचित भोज़न के अभाव में वह  अनीमिया, लो ब्लड प्रेशर जैसे रोगों को पाल चुकी है....वज़न दिनोदिन कम होता जा रहा है...पर मन की दृढ़ता बढती ही जाती है ...चेहरे कि कान्ति कम नहीं होती...उसके लिए जिन्दगी अब भी 'खूबसूरत' है...

Wednesday, February 22, 2012

अवसान




ढला सूरज,
दिवस अवसान,
अल्प विराम !! 

हाईकू (कविता लिखने की जापानी पद्धति) शैली में

सोन चिरैया





सोन चिरैया,
बन-बन भटके,
कहाँ विराम !!

Saturday, February 18, 2012

कहा गए ये बहुरूपिये ??

बहुरुपिया!! याद आया??? यही मौसम हुआ करता था न! फाग का!...आते-जाते विभिन्न रास्तों पर तरह-तरह का स्वांग रचे बहुरूपिये नज़र आते थे .. फाग की मस्ती इनके कारण दोगुनी हो जाया करती थी ... होली के दिन गाँव-कस्बों में निकलनेवाले गोला(टोली) में एक बहुरूपिये का होना जरूरी होता था.. बुजुर्गों से सुना कि तब इनकी विशेष मांग थी..लोग इनकी कलाकारी पर चर्चाएँ करते और इन्हें इनाम भी देते थे .... इनकी रूपसज्जा ऐसी की आज के मेकअप आर्टिस्ट भी मात खा जाये...कभी हनुमान बनते तो लोग चढ़ावा चढाने लगते...राक्षस बनते तो लोग डरकर दूर भागने लगते...कभी-कभी पेट में तलवार घुसेड़े होने का स्वांग करके लोगो का मनोरंजन करते...मेरी माँ बताती है कि एक बार बहुरुपिया पोस्टमैन बनकर आ गया..मम्मी ने सोचा नाना की चिट्टी है..वो दौड़ी-दौड़ी आयी....कुछ देर अभिनय के बाद वह हसने लगा तबतक बाबा भी आ गए वो भी हसने लगे ....

बहुरूपिये हम बच्चों की भी उत्सुकता का केंद्रबिंदु होते थे...हम कभी खुश होते तो कभी घबराते ...इनके पास जाकर इन्हें छूकर देखते थे ...विद्वानों कि राय है कि बहुरुपिया मुग़ल दरबार का विशेष आकर्षण होते थे...मध्यकाल में बहुरुपिया एक व्यवसाय बन गया ... बिहार हिंदी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित, श्री महेश कुमार सिन्हा द्वारा लिखित किताब "बिहार की नाटकीय लोक विधाएं" में इस विधा को 'लोक नाटक' माना गया है, जो आदिवासी क्षेत्रों में भी किया जाता है . कुछ साल पहले तक ये काफी प्रचलित था..होली,दशहरा आदि अवसर पर ये विभिन्न स्वांग भरकर लोगों का मनोरंजन करते थे ...घर-घर, दरवाज़े-दरवाज़े जाते ...घर का आँगन, चौपाल, नुक्कड़, दरवाज़ उनका मंच होता...इनका अभिनय और प्रदर्शन एक स्थान पर रुक कर देर तक नहीं होता बल्कि इनकी यात्रा जारी रहती , साथ-साथ अभिनय और प्रदर्शन भी चलता रहता ... 

बहुरूपिये कभी लैला-मजनू तो कभी सन्यासी, पागल, शैतान, भगवान शंकर, डाकू, नारद और मुनीम जैसे तमाम किरदारो को निभाते .... ये इन्हें इस कदर पेश करते हैं कि एक बारगी लोग उन्हे वास्तविक समझ बैठते थे.... कई ऐसे बहुरूपिये भी रहे जो अपनी कलाकारी में इतने तल्लीन हो गए कि अपना मूल रूप, पहचान ही भूल गए...कृत्रिम रूप ही वास्तविक बन गया... 

पर आज दो जून की रोटी भी इन्हें दूभर है. दूसरों के होठो पर मुस्कुराहटें लानेवाले बहुरूपियों की जिंदगी तल्ख़ है.... उचित मेहनताना व सम्मान के अभाव से उपजी हताशा ने इन्हें इस पेशे से विमुख कर दिया है...वर्तमान दौर में मनोरंजन के  इतने स्रोत मौजूद है कि मात्र इस कला से पेट पालन नामुमकिन सा हो गया है .... आज ये कलाकार उपहास  के पात्र बन चुके है .... बहुरूपिये बच्चों में बहुत लोकप्रिय होते थे, किन्तु आज के बच्चे बहुरुपिया के बारे में जानते तक नहीं ..लोगो का नजरिया भी इसके प्रति बदल चूका है ..संरक्षण नहीं मिलने से ये भी अन्य परम्पराओं की तरह लुप्तप्राय हो रहा है.....पुश्तैनी धंधा वाले परिवारों में बच्चे इसे अपनाने में शर्म महसूस करते है...आज बहुरूपिये कभी-कभी ही किसी गाँव में दीखते है ....कई साल हो गए इन्हें देखे...अब तो एक सपना सा लगता है .....क्या आपको याद है ये बहुरूपिये ?? इनका स्वांग?? इनसे मिलने वाली ख़ुशी ?? कहा गए ये बहुरूपिये ?? 

http://www.bhaskar.com/article/BIH-where-are-the-freaking-2885640.html