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Showing posts from March 18, 2012

बन्दर मामा,मम्मी आ गयी है!!अब डराकर दिखाओ!

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आज कल हमारे शहर में बंदरों का आतंक बढ़ गया है ..ये हर वक़्त पूरी फौज के साथ चलते है... हर दूसरे दिन हमारे घरों पर धावा बोलते हैं और सब कुछ तहस-नहस कर देते है (वैसे जब हमने उनके आशियाने को उजाड़ दिया है तो शिकायत का हमें  अधिकार कहाँ? ) ..फलों के पेड़ वाले घर  खास तौर पर निशाना बनते हैं ...हमारे घर में भी एक अमरुद का पेड़ है.. उसपर फल लदे पड़े हैं...पर क्या मजाल की हम एक  भी चख सकें ..'हुजुर लोगों' से इतनी मिन्नतें करते है फिर भी उन्हें दया नहीं आती ....हम देखते रह जाते  है और वो...वो तो पेड़ पर बैठ कर मज़े में फलों को खाते है ...कुछ को चखते है ....शेष को फेंक देते है ...इन महानुभावों के डर से हमने अपने घरों में ग्रिल लगा लिया है... गली मोहल्ले में भी ये अपनी हुकूमत चलाते  रहते है...हश, हुश ...हश, हुश करने ,  डंडा लेके उन्हें डराने का प्रयास भी बेकार हो जाता है ..उल्टा उनके डर से हम ही छिप-छिप कर निकलते है... होलीवुड की एक मूवी  'प्लानेट ऑफ़ एप्स'  के मानव प्रजाति जैसे हमारे 'हालात' हो गए  है...एकदम 'बेचारे' से... खैर अब मुद्दे पर आती हूँ .…

मैंने नेत्रदान किया है..और आपने ?

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कई साल पहले की बात है ...शायद बी. एस सी. कर रही थी ..मेरी आँखों में कुछ परेशानी हुई तो डोक्टर के पास गयी..वहां नेत्रदान का पोस्टर लगा देखा... पहली बार इससे  परिचित हुई...उत्सुकता हुई तो पूछा, पर पूरी व सही जानकारी नहीं मिल पाई ....डॉक्टर ने बताया कि अभी हमारे शहर में ये सहूलियत उपलब्ध नहीं, पटना से संपर्क करना होगा ...फिर मै अपने कार्यों में व्यस्त होती गयी...सिविल सर्विसेस की तैयारी में लग गयी. हालाँकि इंटरव्यू  तक पहुँचने के बाद भी  अंतिम चयन नहीं हुआ ..पर इसमें कई साल निकल गए, कुछ सोचने की फुर्सत नहीं मिली...उसी दौरान एक बार टीवी पर ऐश्वर्या राय को नेत्रदान के विज्ञापन में देखा था....मुझे अजीब लगा कोई कैसे अपनी आंखे दे सकता है ?  आंखे न हो तो ये खूबसूरत दुनिया दिखेगी कैसे?  फिर सोचा जो नेत्रदान करते है वो निहायत ही भावुक किस्म के बेवकूफ होते होंगे.... कुछ साल इसी उधेड़-बुन में निकल गए...फिर एक आलेख पढ़ा और नेत्रदान का वास्तविक मतलब समझ में आया...' नेत्रदान' का मतलब ये है कि आप अपनी मृत्यु के पश्चात् 'नेत्रों ' के दान के लिए संकल्पित है...वैसे भी इस पू…

पिता का होना कितना बड़ा संबल है

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पिता का होना कितना बड़ा संबल है...साहस है.... पापा के ऐसे बीमार पड़ने पर इस तथ्य को पूरी तरह समझ पा रही हूँ...उन्हें कैंसर है....नहीं जानती कि क्या होगा, 'उम्र' और अन्य दूसरी बीमारियाँ उनके इलाज में बाधक बन रही है ...पिछले ८-९ महीने से ठोस आहार नहीं ले पा रहे ...बहुत कमज़ोर हो गए है ...और मै बेबस हूँ .

पापा के व्यक्तित्व से हम सब बहुत प्रभावित रहे है .... सरल  और कठोर ...सबके मददगार .. किसी के सामने नहीं झुकनेवाले .. लोगों से घिरे रहनेवाले..और गुस्सा ऐसा जैसे वाकई बिजलियाँ कड़कने लगी हों . आवाज़ में ऐसी बुलंदी की पुकार दे तो मोहल्ला दौड़ा चला आये ... हम सबके आदर्श...

बचपन में हम भाई-बहन हमेशा पापा के इर्द-गिर्द ही रहा करते ..पापा के आने का घंटों इंतजार करते ...उनसे लड़ना- झगड़ना, लाड जताना, साथ में खाना, खेलना हमारी आदत थी...हम सब पापा के दुलारे रहे है ( हालाँकि बचपन में मै खुद को ज्यादा खुशनसीब मानती थी...अपने मने...हा हा हा ) पापा के पास बैठने के लिए हममे झगडा होता ..सारी बाते पापा से होती.. मम्मी की डांट से बचने के लिए पापा या बाबा-दादी का सहारा लेती. जब पापा बा…