मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Friday, August 29, 2008

छनिकाएं -भूख की

1
मर गई 'वह'
'भूख 'से बिलबिलाते
सोती रही 'मानवता '
2
'प्रेम' की जगह
लिख दो 'भूख '
लैला-मजनू
अब पैदा नही होते

आदमी 'भूखा 'है
वो नोचता है दूसरों को
उन्हें मार देने तक

Thursday, August 28, 2008

बाढ़ की तबाही



बिहार में बाढ़ का  तांडव  फिर से शुरू है  .बिफरी हुई  सोन नदी  अपनी सारी सीमाओं को तोड़ती हुई विनाश कर रही है.  पर इस बार ये  बाढ़ प्रकृति का प्रकोप नहीं बल्कि नहीं बल्कि मानवीय कारगुजारियो का प्रतिफल है. सोन नदी पर मध्य प्रदेश में बांध  बना है. इस पर निर्मित इन्द्र बैराज से बिहार की और पानी छोड़ा जाता है. इस बार भी ये हुआ और गरजती हुई नदी का पानी बड़ी  वेग से बिहार में प्रवेश कर गया . परिणाम ये है की बिहार के लगभग आधा दर्ज़न जिलों में बाढ़ आ चूका है. ६-७ घंटे पहले जो नदी सूखी पड़ी थी उसमे देखते ही देखते इतना पानी आ गया की कई गाँव डूब गए. ये सब इतनी जल्दी  हुआ कि किसी को सँभालने का मौका तक नहीं मिला. हालाँकि जब ये पानी बिहार में प्रवेश किया तो प्रशासन  द्वारा इसकी सूचना दी गयी पर सोन के कगार पर बसे गाँव के निवासिओं को इसपर यकीन नहीं हुआ. उन्हें अपने अनुभवों पर ज्यादा  भरोसा था. पर अब चारो और हाहाकार मचा हुआ है. इस तबाही  में हमारा भोजपुर जिला भी शामिल है. सच,  कुदरत के सामने मानव कितना बेबस हो जाता है . 
              ये बाढ़ हर साल हमारे लिए बर्बादी की सौगात लाता है. पर ये  तबाही बस उतनी  ही नही होती जितनी हमें दिखती है .बाढ़ किसी का सबकुछ लूट ले जाता है.ये किसी गर्भवती को पानी में बच्चे पैदा करने पर विवश कर देता है.ये मात्र एक छोटी सी चोकी पर पूरे परिवार को दिन गुजारने पर मजबूर कर देता है.ये सभ्यता को दरिंदगी में बदल देता है.ये आत्मीय - जनों  को मरते देखने के लिए बेबस करता है. जी हाँ, बाढ़ कुछ ऐसा ही होता है कि  आप अपने घर की छत पर शरण लेते है और भयावह लहरे आपके पूरे मकान को नीचे-नीचे निगल जाती है .आप बाढ़ से बचने के लिए अपने छोटे बच्चे को सुलाकर इंतजामात करने जाते है, जब लौटते है तो आपको आपके बच्चे का तैरता हुआ शव मिलता है .हाँ,मनुष्य और जंतुओं का सहजीवन जरूर इसी बाढ़ में देखने को मिलता है.क्योंकि उन जंतुओं को भी अपने जीवन की उतनी ही परवाह होती है. भले ही इसके एवज में मानवों को जान गवानी पड़े . बचपन में हमारे लिए बाढ़ अपने रिश्तेदारों से मिलने  की एक वजह हुआ करता था, क्योकि उनका घर बाढ़ में पूरी तरह डूब जाता था और उन्हें हमारे घर में शरण लेना परता था. पर तब बाढ़ के प्रलयंकारी रूप का पता नही था.अब सोचती हूँ तो लगता है कि उन लोगो को कितनी कठिनाइयां  उठानी होती होंगी. इस बार के बाढ़ ने भी तबाही मचाई है, चारो और पसर गई बर्बादी दिखने लगी है . भूख से बिलबिलाते ,डरे ,बिलखते चेहरे, गंदगी  और मवेशिओं के शवो के सरांध आम दृश्य बन गए है. जबकि  बाढ़ के पानी के उतारने  के बाद महामारी का  प्रकोप अभी बाकी ही है. अब बस  इश्वर से  यही प्रार्थना है  कि वो हम बिहार के  बाढ़ पीडितो को सबकुछ बर्दाश्त कर जाने का हौसला दे.आमीन.

Monday, August 25, 2008

दीपक, बुलंद इरादोवाला एक बच्चा


दीपक, एक ऐसा बच्चा जिसने मुझे जिन्दगी जीने कि प्रेरणा दी .कुदरत ने उसके साथ नाइंसाफी की है. वो गूंगा और बहरा है. पर उसके हौसले  हिमालय जैसे बुलंद हैं . उन दिनों मै सिविल सेवा के लिए इंटरव्यू में चयनित नही होने के कारन हताश थी. इसी समय मुझे इस मासूम के बनाये चित्रों की प्रदर्शनी में बुलाया गया. अनमने ढंग से देखने गई. दीपक और उसके बनाये चित्रों को देखकर अवाक् रह गई. हँसता-मुस्कुराता वह बच्चा कितनी आसानी से अपनी विकलांगता को ठेंगा दिखा रहा था और मै एक छोटी सी हार से हताश हो गई थी. उस बच्चे के इरादों ने मुझे फिर से लड़ने के लिए तैयार कर दिया. जैसे कि एक भयानक सपना देखकर जाग गई. घर आई तो मेरी लेखनी खुद ब खुद चल पड़ी, जिसने दीपक के ऊपर लिखी गई कविता का रूप ले लिया-

तू विधु शीतल कोमल-कोमल,
नन्हा-दीपक निर्झर झर-झर
असाधारण-अखंड -ज्योति तू जो
जलता है हरदम हर-हर पल
या की सतजुग का कोई ऋषि
उस, निराकार का अभिलाषी
या 'दिनकर' का तू 'रश्मिरथी'
संघर्षशील पुरुषार्थ वही
ना-ना तू है वो 'निराला-राम'
तम्-रावण को हरता हर कही
या जन्मा तू अवतार कोई
कहने महत्ता 'ढाई-आखर' की ,
कि मै औ' तू की भिन्नता छोड़ो
हो जाओ प्रकृति से एकाकार
आकृति, रंग ,तूलिका तेरे
देते ये संदेसा बार-बार
दीपक प्रज्जवल हो ज्वलित बन
जला कलि के सारे तम् को
करके झिलमिल-झिलमिल-झिलमिल
दिखलादे राह भटके हुए को
तू है दीपक, दीपक है तू
गुण-नाम धन्य स्रष्टा बनकर
अपनी चित्रों की पूर्णता से
बन जा तू भी संपूर्ण भास्कर