मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Saturday, January 17, 2015

मेरा हक

















तरस मत खाओ
मै नहीं हूँ बेचारा
मत दो खाना ,
कपडे भी मत दो
बस एक कलम दो
और कुछ किताबें दो
सोचने का विवेक दो
सपनो का अधिकार दो
और फिर देखना
छीन लूंगा उनसे
अपने हक की रोटी
अपने हक का कपड़ा
अपने हक का मकान
अपने हक का जीवन
(एम डी एम पर सोचते हुए )
........स्वयम्बरा

Friday, January 16, 2015

उदासियों की नदी

मेरे भीतर बहती है
उदासियों की एक नदी
एकदम भीतर
मन की परतों से बंधी
चुपचाप बहती है
खारे पानी की नदी
न उद्गम ना अंत
बस घूमती रहती है
गहरी  खाईयों में
कभी-कभी या अचानक ही
बादलों के फट जाने से
परत दर परत
गाद के जमते जाने से
आ जाती है   
भावनाओं की  बाढ़
कटने लगते है किनारे
टूटने लगती हैं सांसे
हाहाकार सा उठता है
फ़ैल जाता है रेतीला पानी
तटों को तोड़ते हुए जाने कहाँ तक
क्षण मात्र में
समूचा अस्तित्व डूब जाता है
फिर सबकुछ चूक जाने के बाद
पानी के भाप बनकर उड़ जाने के बाद
एक नया तटबंध बांधा जाता है जबरन
सीमाएं तय की जाती हैं
और नदी बहने लगती है
चुपचाप, फिर से
मन की परतों के भीतर
.................स्वयंबरा 

Monday, January 12, 2015

एम डी एम : आखिर कैसी योजना ?


दृश्य 1 
घंटी बजती है .....बच्चो के बीच घर से थाली लेकर स्कूल भागने की होड़ मच जाती है ...छोटी-बड़ी थालियाँ ...पिचकी -फूटी थालियाँ ...किसी ने दो-तीन थालियाँ भी ली है ...कोई बच्ची अपने नन्हे से भाई को गोद में लिए जा रही कि आज अपने खाने में उसे भी खिला देंगे...सभी दौड़े जाते है ... 

दृश्य २ 
एम् डी एम् का खाना बंट रहा... बच्चो को लगातार घुडकी दी जा रही ...उन्हें धकेला जा रहा ...और मांगने पर डांटा जा रहा...

दृश्य ३
बच्चे जैसे-तैसे, जहाँ -तहां बैठ कर खाना खा रहे...कोई बतानेवाला नहीं ...दुलार से समझानेवाला नहीं ...

दृश्य 4

 एक ३-४ साल का बच्चा रोते हुए घर जा रहा कि उसे खाना नहीं मिला...और ऐसा तो रोज ही होता है ...कुछ बच्चो को खाने के बदले झिडकिया मिलती है ..

दृश्य ५

पोशाक की राशि अब तक नहीं बंटी ...बच्चे हंगामा कर रहे ...बेंच, कुर्सिया तोड़ रहे ....सड़क जाम कर रहे

और ये किसी एक विद्यालय के दृश्य नहीं ...आखिर ये कैसी योजना ....आखिर ये कैसा बचपन... जिसे मांग कर खाने, पहनने की सीख दी जा रही..जिनके स्वाभिमान को अभी से कुचला जा रहा....अगर ये योजनाये बच्चो का अधिकार है तो सम्म्मानजनक तरीके से उनका क्रियान्वयन क्यों नहीं हो रहा ???

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