मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Thursday, October 10, 2013

यवनिका संस्था द्वारा 'सहार',बिहार मे 'बाल महोत्सव' का आयोज़न

उद्घाटन
सामान्य ज्ञान की प्रतियोगिता 

चित्रकला प्रतियोगिता 

आत्मविश्वास से भरपूर हसती -मुस्कुराती बच्चिया

प्रतिभागी

आशा : प्रतिभावान गायिका


'जन्मदिन' विषय पर 'अल्पना' कक्षा ६ द्वारा बनायाचित्र
बिहार के 'सहार' प्रखंड का  नाम सुनते ही ऐसा भू-क्षेत्र आँखों के सामने आता है जो अपनी रक्तरंजित गतिविधियों के लिए कुख्यात था ... खौफ, दहशत और नफरत  ने पूरे प्रखंड को अपने आगोश में ले लिया था .....गाँव खाली हो चुके थे...लोग अपना घर - खेत छोड़कर पलायन करने पर मजबूर थे ...अखबारों के पन्ने वहा के वारदातों से रंगे होते थे ...  हम सब ये देखते-सुनते थे...समझ नहीं आता कि ऐसा क्या हो क़ि हमारे जिला के इस भाग में अमन और शांति लौट आये... 

धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा पर अब भी कुछ ऐसा किये जाने कि जरुरत थी कि अपराधिक माहौल पूरी तरह बदल जाये...रास्ता एक ही था कि वहा कुछ ऐसा हो जो युवाओ, बच्चो का ध्यान पढाई, कला, साहित्य और खेल में लग जाये..वे उत्साहित हो...आगे बढ़ने की  इच्छा जागे ..

बाल महोत्सव की शुरुआत ही 'सहार' को ध्यान में रखकर हुई थी...उस समय तक यह क्षेत्र .नरसंहारो  के लिए कुख्यात था...बच्चो के हाथो में किताबो की जगह बंदूके रहती थी...हमारी टीम में एक सदस्य शामिल हुआ था रणवीर रंजन...वह भी सहार का रहनेवाला था..उससे कई बातो की जानकारिया हुई... हमें बहुत तकलीफ होती थी ....

अतीत तो बदल नहीं सकते थे पर भविष्य सुधारना हमारे हाथो में था ...हमने बच्चो पर ध्यान केन्द्रित किया ...बाल महोत्सव की शुरुआत हुई ....इसमें वहा के बच्चो को लाने, उन्हें उत्साहित करने, साहित्य, कला के प्रति जागरूक करने का प्रयास शुरू हुआ...बच्चो में जागरूकता आयी..वे महोत्सव की तैयारिया करने लगे..

अनीता, गाँव एकवारी, बसंत, गाँव धनछूहा , अनु, तरारी, माया, कौरन डिहरी जैसे अनेक ऐसे नाम है जिन्होंने सहार का नाम रौशन किया ....सबसे ज्यादा ख़ुशी हुई जब २००७ के बाल महोत्सव की चार प्रतियोगिताओं में अव्वल आनेवाले हिमांशु हीर ने उस वर्ष की 'चैंपियनशिप ट्रोफी' भी जीत ली ....वहा के बच्चो में जागरूकता बढती गयी...आज वे बच्चे कई अच्छे जगहों पर है... नेट की दुनिया मे भी मिल जाते है कहते हुए कि दी, अपने नहीं पहचाना मैंने बाल महोत्सव में भाग लिया था..

आज माहौल बदला सा है...हमें अच्छा लगता है कि इसमें हमारा यानि 'यवनिका' का भी छोटा सा योगदान है ... 06.10.2013  के 'बाल महोत्सव'  के आयोजन में बच्चो का उत्साह चरम पर था...सहार ही नहीं अरवल, जहानाबाद, गया तक से बच्चे आये थे...सैकडो बच्चो थे.....जी. के., जी. एस. की भीड़ देखकर हम हैरान थे...गायन, नृत्य, भाषण में चुने गए बच्चो का उत्साह चरम पर था ...जैसे उन्हें उड़ने के लिये पंख मिल गये हो......मौका मिल गया हो कुछ कर दिखाने का ..इन्हें देखकर सहज ही एक उम्मीद सी जगती है ...हौसला बंधता है कि गर ये साथ है तो कही कुछ भी गलत नहीं हो सकता ....

-----------------स्वयम्बरा

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Saturday, October 5, 2013

ख्वाहिशे

















सुनो,
कभी ऐसा भी तो हो
कि इक सुबह 
चल पड़े हम नंगे पांव घास पर,
बटोरे
ढेर सारी ओस की बूंदे
कभी 
भींग जाये बरिशो में
गुनगुनाए एक गीत
चल पड़े 
किसी ओर, कही भी
बस, हम और तुम
बैठे रहे इक नाव पर
करते रहे बाते
खामोशियो मे
छत के उस कोने से
देखते रहे, ढलता सूरज 
साथ-साथ
कभी मै बोलु और तुम सुनो
सुनते रहो मुझे, 
थामे हुए मेरा हाथ
इक आखिरी ख्वाहिश भी है
वह तो सुनो
कभी ऐसा हो,
कि तुम्हारी गोद में सिर रखकर
पढ्ती रहू 'अमृता' को
तुम,
गुनगुनाते रहो एक ग़ज़ल
और ...और
उस पल मे ही 
थम जाये सबकुछ
बंद हो जाये मेरी पलके
हमेशा-हमेशा के लिये
........स्वयम्बरा

Friday, September 6, 2013

डायरी के पन्ने (05.03.2004) : मेरे शिशु मेरे नवगीत

साभार :  http://thebabypicz.com



मेरे शिशु मेरे नवगीत
जीवन बगिया के नन्हे फूल

गर्वित हर्षित ह्रदय मेरा
बन गया नवीन स्रष्टा तेरा,

मातृत्व -निर्झर में भींगा मन
हर पल सोचे कैसा है तू
मुझ जैसी  रुनझुन-पायलिया
या पौरुष का साकार रूप

नन्ही आंखे नन्ही बाहें
नन्हे अधरों की मुस्काने
है अभी कल्पना मेरी
पूरी होगी ये मन जाने

आये जो तू आँचल में मेरे
जी लुंगी फिर बचपन इक बार
तेरी स्मिति में ढूँढूँगी
अपना चेहरा, उनकी मुस्कान

हौले-हौले, चुपके-चुपके
कैसे आया तू जीवन में
अभी-अभी तो जाने था कहाँ
अभी-अभी कह गया तू 'माँ'

अपनी तुतलाती बोली से
'माँ' कहकर देगा ऐसी ख़ुशी
सारे-सारे सुखों में भी
जो कभी किसी को नहीं मिली


मेरी प्रतिकृति मेरा रक्त मांस ,
पल-पल जोहे तुझको ये साँस
पल-पल की ख़ुशी, पल-पल जीवन
पल ही पल में, पूरी होगी आस

......इसे अपनी अत्यंत प्रिय सखी को  लिखकर उपहारस्वरूप दिया था...वह 'माँ' बननेवाली थी...और उसकी ख़ुशी में 'मै' बावली हुए जा रही थी ....क्या दिन थे वे भी ...:)

Monday, August 12, 2013

बाढ़ ( बरहरा, भोजपुर, बिहार) की कहानी : तस्वीरो की जुबानी


राम भजो, राम भजो, राम भजो भाई.....

'भगवान' अपने घर को भी नहीं बचा पाए.....

खेतों में चल रही है नाव....

'प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना' से बनी सड़क..........दिख रही है क्या? 

बाढ़  के बीच 
यहाँ एक सड़क हुआ करती थी .....


बाढ़ से घिरे गांव
©  सर्वाधिकार सुरक्षित!

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Thursday, June 13, 2013

जिंदगी मे 'रिवर्स गियर' नही होता

चल,
फिर से बच्चा बन जाते है
लड़ते है, झगड़ते है
रूठते है, मनाते है
कट्टी ..कट्टी ....कट्टी
मेल्ली ...मेल्ली ..मेल्ली 

और जो मेल्ली न हो पाया तो?

उह!
हटाओ न, समझदारी का खोल
फेंक दो ना बड़प्पन दूर... बहुत दूर
खेलोगी, आंख मिचौली ?
देंगा-पानी, रुमाल चोर?

हाँ, सब खेल ही तो है !

फिर वही बात ?
ओ सयानी,
चल सुनाती हूँ एक कहानी
फूलकुमारी की
जब हंसती थी तो सारे फूल हँसते थे

जब रोती थी तो.......?

ओ....हो !
चल एक नाव बनाये
खेवेंगे साथ-साथ
बादलों के देश में ले जायेंगे उसे

अच्छा!
पल भर भी टिकेगी तेरी कागज़ की नाव ?

अब तू सुन!
छोड़ ये मासूमियत
ओढ़ ले मुखौटा
बन जा सयानी
मत उलझ,
सपनो की दुनिया में
कि नहीं आता बचपन कभी लौटकर
कि नहीं होता कोई जिसकी ऊँगली पकड़ चल पड़े हम
क्यूंकि जिंदगी मे  'रिवर्स गियर' नही होता
क्यूंकि  जिंदगी मे 'कोई' रिवर्स गियर नही होता
(आत्मालाप )

........स्वयम्बरा

Wednesday, June 12, 2013

'बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान'



यवनिका 1993 से सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय रही है. वर्ष 1994 से 'यवनिका सम्मान ' की शुरुआत की गयी ...हालाँकि उसके बाद कई साल गुज़र गए ...अब तक जिन्हें सम्मानित किया गया है वो है ...राधा चरण सिंह (खेल), प्रो श्याम मोहन अस्थाना (रंगमंच ), पंडित देव नंदन मिश्र (शास्त्रीय संगीत ), डॉ के. बी. सहाय (कलाक्षेत्र-चिकित्सा व् समाज सेवा ), श्रीमती उर्मिला कॉल (साहित्य जगत ) .

वर्ष 2010 से इसे फिर से शुरू किया गया, जिसके तहत वैसे वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने समाज को एक सकारात्मक दिशा दी है. सम्मान में एक प्रतीक चिन्ह, शाल, प्रशस्ति -पत्र दिया जाता रहा है. वर्ष 2012 से सम्मान का नाम 'बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान' गया . साथ ही सम्मान में 5001 रुपये की धनराशि भी जोड़ी गयी, जिसे 'बक्सी परिवार' वहन करता है .... ज्ञात हो कि 'बक्सी जी' यवनिका के संस्थापक सदस्य व् मुख्य संरक्षक थे , जिनका देहांत २०१२ के अगस्त माह में हो गया .

पिछले साल यह सम्मान 'बक्सी जी' की जन्मतिथि 23 दिसंबर को 'श्री सियाराम निर्भय जी' को दिया गया..'निर्भय जी' को उनके सामाजिक- साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया...आर्य समाज से जुड़े निर्भय जी ने 1974 के जे. पी. आन्दोलन में भी योगदान दिया था ..उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया ...

"सच कहना अगर बगावत है तो समझो की हम बागी है'' इनकी प्रसिद्द कविता थी....तत्कालीन सरकार ने इन्हें और इनके लेखन को प्रतिबंधित कर जेल में डाल दिया ..

इस वर्ष भी 'यवनिका सम्मान ' दिया जायेगा...इसमें आप सबो का सहयोग चाहिए..यदि आप 'भोजपुर' में ऐसे बुजुर्गो को जानते है जिन्होंने अपने कार्यों से समाज को एक दिशा दी हो तो हमें बताये... क्यूंकि किसी ने कहा है-
                                               "मंदिर-ओ -मस्जिद में जाना कोई बात नहीं,
                                            हो बुजूर्गों की क़द्र-ओ- इबादत मगर नमाज़ से पहले" 





Sunday, June 9, 2013

डायरी के पन्ने

डायरी के पन्ने
दिनांक : 12.10.1998
..................................................
वह लावारिश लाश
पड़ी थी उधर
मुह खोले, टांग पसारे, हाथ फैलाये
सुना है कल रात किसी ने गोली मार दी उसे
यही बीच सड़क पर
तब भीड़ थी यहाँ
सुना है वह खूब चीखा, पुकारता रहा,
सबने अनसुनी, अनदेखी की,
भागते रहे गंतव्य की ओर,
झांकते रहे झिर्रियों से ,
जिसका चलन है शहर में
पुलिस आयी
लाल बत्ती, खाकी वर्दी, चमकते सितारे समेत,
उसके मरने तक खड़ी रही
इन्क्वायरी (?) के लिए
सुना है
वह लड़ता था ऊँची अट्टालिकाओं से
हक की लडाई
और कहते है,
इन्काउन्टर नहीं
मुठभेड़ हो गया, गुंडों का
मारा गया वह,
लोग गुजरने लगे है अब वहां से,
सफ़ेद रेखाओं के ऊपर से भी
पहियों, कदमो की धूल ने ढँक दिया  है
लाल धब्बों को,
अब तो ये भूली सी बात है
लोकतंत्र तो जनसमूह है न,
यहाँ अकेले की क्या बिसात है .

(जाने किस मनःस्थिति में इन शब्दों का सृजन हुआ था )

Tuesday, May 28, 2013

कब्र संवेदना की

बाते..बाते, 
बस बाते है चारो ओर
नपे तुले शब्द
भाव भंगिमा भी नपी तुली
मुस्कुराहटो के भी हो रहे  पैमाने....
बुद्धिजीवी का मुखौटा पहनकर
नाचते रहते है...
सच कहु तो 
लगते है मसखरा सदृश ....
हाथ नचाते, आंख घुमाते 
अपनी ही कहे जाते है 
वक़्त-बेवक्त चीखते-चिल्लाते, धमकाते  
खोदते है कब्र, संवेदना की  
मातम मनाते, ग़मज़दा (?) होते
धकेल देते है 'उसे' 
फिर भर देते है कब्र 
अपने  'अति विशिष्ट' विचारो की मिटटी से 

(ऊब और झुंझलाहट के बीच)

Sunday, February 17, 2013

जै गंगा....!


रेनू जी की एक दुर्लभ रचना http://www.phanishwarnathrenu.com/ से साभार 
जै गंगा......
इस दिन आधी रात को ' मनहरना ' दियारा के बिखरे गांवों और दूर दूर के टोलों में अचानक एक सम्मिलित करूण पुकार मची , नींद में माती हुई हवा कांप उठी - ' जै गंगा मैया की जै...!!
अंधेरी रात में गंगा मैया क्रुद्ध लहरें हहराती, घहराती पछाड़ खाती और फुफकारती हुई तेजी से बढ़ रही थीं।
लहरें उग्र होती र्गइं , कोलाहल बढ़ता गया - ' जै गंगा मैया ... मैया रे ... दुहाई गंगा मैया... भगवान..... ।'
...... गाय बैलों का बंधन काटो ... औरतों को चुप करो भाई , कुछ सुनने भी नहीं देती है , बच्चों को देखो , उॅचला बॉध पर औरतों को भेजो , अरे बाप रे , पानी बढ़ रहा है , रे बाप ! .... ! ... दुहाई ...
पानी उपर की ओर बढ़ रहा था , मानो उपर की ओर उठती हुई क्रंदन-ध्वनि को पकड़ना चाहता हो । ...
- ' दुहाई गंगे ....
' कलकल कलकल छहर छहर - एक फूट । '
- बचाओ बाबा बटेश्वरनाथ ...
' ओसारे पर पानी ' ।
- बाप रे , दुहाई गंगा.......
लहरें असंख्य फण फैला कर गांव में घुसीं । घर के कोने कोने में छिपे हुए पापों को खोजती हुई पतितपावनी माता अट्ठहास कर उठी । शस्य श्यामला धरती रो पड़ी । गूंगे प्रणियों की आखिरी आवाज घिघियाती हुई पुकार , गंगाजल के कलकल छलछल में डुब गई । .... दुहाई ..... !!
शाम को ही मनहरना घाट से रेलवे स्टीमर को हटा कर ' कैसलयाबॅंड ' के पास लाया गया था। स्टीमर के सभी कर्मचारी , रेलवे नावों के मल्लाह , बंड ओवरसियर , बंड कर्मचारीगण, कूलियों का एक विशाल जत्था , बंड पर मेला लगा हुआ है। पानी खलासी रह रह कर जरा नाटकीय ढ़ंग से चिल्ला कर रिपोर्ट देता - ' दो फीट ..... ।'
' अरे धु�ा ' साला ...... कान फाड़ डाला ।'- सब हॅंस पड़ते । ' गंगा चिढ़ जाती है इस हॅंसी को सुन कर । पानी बढ़ता , लकड़ी के सुफेद खम्भे के काले काले दाग धीरे धीरे पानी के नीचे डुबने लगे । सब हॅसते रहे । स्टीमर रह-रह कर हिल उठता । बंड पर कोई कमर मटका मटका कर गाता - ' छोटी सी मोरी दिल की तलैया , अरे हॉं डगमग डोले , अरे हॉं डगमग डोले .....'
' चुप हरामी का बच्चा ' - स्टीमर पर से बूढ़ा फैजू चिल्ला उठता । फैजू के दिमाग में तुफान चल रहा था । स्टीमर के छत पर वह अकेला ही टहल रहा था । डेढ़ सौ से ज्यादा सरकारी कूली दो स्टीमर और पच्चीस नावें । सब बेकार पड़े हैं । हुक्म है स्टीमरों और नावों को सुरक्षित रखो । कूलियों को तैयार रखो । जब तक कि हुक्म न मिले , कुछ मत करो । डी0 टी0 एस0 साहब कंठहापुर जंक्शन के आरामदेह बंगले में मजे से रेडियो प्रोग्राम सुन रहे होंगे। जिला मजिस्ट्रेट को शायद खबर भी न मिली हो कि दर्जनों गांव के सैकड़ों प्राणी किसी भी क्षण के मुह में समां जा सकते हैं। आज पांच दिनों से दरिया की हालात खराब है । ओवरसियर से बार-बार कहा कि इस बार पूरब दियारा के गांवों पर आफत है। दरिया के रूझान को भला मैं नहीं समझॅंूगा । ओवरसियर हॅंसता था । उसने पढ लिखकर पास जरूर किया है , लेकिन मेरा जन्म ही नाव पर ही हुआ है।.....
' घहर घहर .... छहर छररर ...' गंगा गरजती ।
फैजू के कानों में पूरब दियारा की , खून को सर्द कर देने वाली , क्रन्दनध्वनि रह रह कर पड़ती थी। उसकी बेबसी ! वह कुछ नहीं कर सकता। वह चाहे तो उन गांवों के बच्चे को बचा सकता है , कानून ? .... उसकी ऑंखों के कितने ही डूबते हुए प्राणियों की तस्वीरे नाच जाती । वह बचपन से ही जलचर है। मिट्टी से उसे बहुत कम नाता रहा है। बहुत बार डूबते हुए यात्रियों की करूण पुकार को सुन कर उसने अनसुनी कर दी है। नावो को डुबते छोड़कर भागा है। स्टीमर में खतरे का भोंपा बजाने के पहले ' लाइफ बेल्ट ' उसने संभाला है। लेकिन , उस दिन आधी रात को उसका दिमाग गर्म हो रहा था । .... हुक्म है , दुनियां डूबती रहे , तुम पानी मापते रहो । रिपोर्ट दो । अजीब कानून है। ......
' ट्रान..... ट्रान, ..... ट्रान । '
बिरौली के स्टेशन के मास्टर साहब की जान आफत में है । एक ओर घाट स्टेशन बाबू हैं , दूसरी ओर चकमका के । एक जनाब घबराये हुए मिनट मिनट पर रिपोर्ट देते हैं और दूसरे साहब बेवजह की बहुत सी बातें पूछने की आदत से लाचार हैं।.... ' ओह , एई घाटवाला और बॉंचने नहीं देगा ।.....
' हल्लो ... चकमका । हॉं , मनहरना घाट का इस्टार्न साइड का गांव सब में पानी चला गया । स्टेशन मास्टर का क्वाटर में पानी चला आया। कंठहारपुर बोलिये । ..... क्या ? गोडाउन ? आरे हमारा गोडाउन में कहां जगह जगह है । तामाक से भर्ती है । सो काहे ? ..... गोडाउन का बात काहे वास्ते पूछा ? ...! अच्छा । हॉं ।'
रात भर के जगे मास्टर बाबू कुर्सी पर ही सो गये हैं। प्लेटफार्म पर कोलाहल हो रहा है । घाट स्टेशन के स्टेशन मास्टर साहब बाल बच्चों और स्टॉफ को लेकर ट्राली से भाग आये हैं । उनकी आसन्न प्रसूता स्त्री डर से नीली पड़ गई है । बच्चे रो रहे हैं । स्टेशन मास्टर साहब शरणार्थियों की सी मुद्रा बनाये हुए टहल रहे हैं ।
हॉंफता हुआ आता है बंड का चौकीदार - ' मास्टर बाबू कहां हैं , मास्टर बाबू ? ओवरसियर भेजिन हैं । फैजू बिला हुकुम के पैंतीसो नाव और दोनो स्टीमर ले के चला गया है। कूली और मल्लाह लोग तैयार नहीं होता था । कसम धरा के ले गया है हिन्दु को गाय कसम , मुसलमान को क्या जाने कौन कसम , ...... सब महात्मा जी की जै बोल के स्टीमर खोल दिया । बोला ' जो राकेगा उसको बस गंगा मइया को ..... , टेलीफून कर दीजिये बाबू डी0 टी0 एस0 साहब को .....'
' लेकिन उधर तो मुसलमानों की एक बस्ती भी नहीं है ? ' - बिरौली स्कूल के हेड पंडित जी के समझ में फैजू की यह हरकत एकदम नहीं आती ।
भननन् ..... गड़रर ..... गरगर ....
टूटे हुए झोपड़ों के छप्परों और पेड़ों पर बैठे हुए अर्धमृतकों की निगाहें उपर की ओर उठती है । हवाई जहाज ..... हां हवाई जहाज ही है । उनके जीने की इच्छा प्रबल हो उठती है। वे चाहते हैं , चिड़ियों की तरह .....हवाई जहाज से उड़ कर हरे भरे मैदानों वाली दुनियां में जाना ।
फड़रर ..... गरगरर .....
हवाई जहाज बहुत नीचे उतरकर आसमान में चक्कर काटने लगा । लोगो की निगाहें अचानक चमक उठी । मुॅह से अचानक ही एक साथ निकल पड़ा -' दुहाई गंगा मैया । ' लेकिन हवाई जहाज दो तीन बार चक्कर काटकर एक ओर चला गया । सबके चेहरे मुरझा गये । उन्हें कौन समझाये कि हवाई जहाज पर जनाब जिला मजिस्ट्रेट साहब की स्थायी बाढ़ कमेटी के मंत्री के साथ बाढ़ पीड़ित इलाकों का दौरा कर रहे थे ।
धू .... धू .... धू .... भू ....
जहाज ! जहाज !! छप्परवालों ने पेड़ वालों से कहा - ' देखो देखो , जहाज ही है क्या ? कदम्ब के पेड़ पर से एक ही साथ दर्जनों गले की आवाज आई - ' हॉं ' जोड़ा जहाज ! बहुत सी नावें भी है .... जहाज आ रहा है , इधर ही ....
आ रहा है ? अरे नहीं , कजरोटिया जा रहा होगा । क्या कहा बहुत धीरे - धीरे चलता है ? अरे भाई , सब एक ही साथ क्यों हल्ला करते हो । कुछ सुनने भी नहीं देते ।
कुछ देर के बाद छप्पर पर के लोगो ने भी देखा कि गंगा की तरंगों पर खेलती हुई , तीर की तरह तेजी से बहुत सी नावें उनकी ओर आ रही है । खलबली मच गई ।
छर्रर छपाक .........
एक झोपड़ा पानी में फिर गिरा । फिर कोलाहल । .... माधो का सारा परिवार डूब रहा है रे बाप । .... हाय रे .... यह देखो फुलमतिया को , बेचारी उब डूब कर रही है। .... हे भगवान ....
किसी तरह माधो ने अपनी जान बचाई । बुढ़िया भी बची । लेकिन माधो की एकलौती प्यारी बच्ची फुलमतिया डूब गई ।
नावें करीब आती गईं । लोगों ने अगली नाव पर देखा कप्तान साहब हैं । फैजू कप्तान .... । सुनो , कप्तान जी कुछ कह रहे हैं ...
'भाइयों' जहाज यहां नहीं आ पाएगा नावों पर एक-एक कर चढ़ते जाओ ...
बाढ़ कचहरी ।
चकमका मिडल स्कूल में अफसरों की भीड़ लगी हुई है । एक सीनियर डिपुटी मैजिस्ट्रेट साहब बाढ़ इन्चार्ज होकर आये हैं , ओवरसियर , डाक्टर , डि0 बो0 के चेयरमैन , कम्पाउन्डर । सब साहबों के अलग-अलग दफतर हैं , स्टेनों हैं , अर्दली और चपरासी हैं । स्कूल के सभी कमरों को सरकारी कर्मचारियों दखल कर लिया है । होस्टल में जिला , सबडिविजनल और थाना कांग्रेस कमिटियों के दफतर हैं । सभी दफतरों के सभापति , मंत्री , आफिसमंत्री और पिउन हैं । होस्टल के सभी कमरे अर्ध सरकारी साहबों के कब्जे में है । कॉमन रूम का संयुक्त बाढ़ रिलीफ कमेटी की मिटिंग के लिए सुरक्षित रखा गया है। स्वयंसेवकों के लिए सामने मैदान में कुछ तम्बू दिये गये हैं । सब मिला जुला कर एक भयावह वातावरण की सृष्टि हो गई है । जनता इस ओर भय और सम्मान की निगाह से देखती है । ... बाढ़ कचहरी ।
सभी दफतर मशीन की तरह चल रहे हैं -' देखिये ' सभी दखास्ते प्रापर चैनल से आनी चाहिए । सबसे पहले उस पर थाना कांग्रेस कमिटी के दफतर का मुहर होना चाहिए , फिर स0 डि0 कांग्रेस और जिला कांग्रेस वालों का नोट । समझते हैं तो ? हां , नहीं तो पीछे मुश्किल हो जायगा । सीधे कोई दरखास्त मत लीजिए । जरा सी कुछ हो जाने से ही मामला प्राईम मिनिस्टर तक । हां , समझते हैं तो । ... और हां , सुनिये । जिला कांग्रेस कमेटी के मंत्री ... और हां , धर्मदेव बाबू , उनके नोट को ठिकाने से पढ़ियेगा ।
चपरासी आकर सलाम करता है -' हजोर ' दो कांगरेसी बाबू आये हैं । ' साहब कुर्सी छोड़कर उठे - ' नमस्ते ' आइये ।
'हमलोग सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता हैं । बाढ़ पीड़ितों की सहायता करने आये हैं । कल कलक्टर साहब से बातें हुई । उन्होंने आपसे मिलने को कहा । हमलोग के साथ तीस विद्यार्थी हैं । '
' ओ , सोशलिस्ट पार्टी के वर्कर हैं आपलोग ' - साहब को गुस्सा आ रहा था अपने चपरासी पर । बदतमीज ने सोशलिस्टों को भी कांग्रेसियों में शुमार कर दिया । नहीं तो मुझे कुर्सी छोड़कर उठने की क्या जरूरत था । - बोले - ' ठीक है कहिये ।'
- ' हमलोग स्टेशन प्लेटफार्म पर पड़े हैं । हमारे रहने के लिए जगह का इन्तजाम कर दीजिये और स्वयंसेवको के भोजन का ।...
देखिये , जगह का तो बड़ा दिक्कत है । वहां तो देख ही रहे हैं ... धर्मदेव बाबू के लिए अभी तक अलग रसोई घर का बंदोबस्त नहीं हो सका है। वे मखमली परदे से दूर रहते हैं न ...........
स्टेशन के प्लेटफार्म पर तो ... अच्छा देखा जायेगा ।
और एक बात पूछनी है बिरौली स्टेशन के पास रिलीफ कम्प नहीं रखकर चकमका रखने से कोई खास सुविधा है क्या ?
जी ?.... हां , यहां के स्टेशन का माल गोदाम अभी एक दम खाली है। रिलीफ कमिटी का गोदाम ठहरा । ....
' नमस्ते ' । अरे हां , सुनिये । कांग्रेस से अलग हो गई है न आपकी पार्टी ?....... हां, सो तो ठीक है । लेकिन फिर भी .... । आपकी पार्टी के जन्मदाता तो मालवीय जी थे न ? नहीं ? अरे हां साहब आपको पता नहीं । आखिर हमलोग भी तो कुछ पढ़ते- लिखते हैं । .... नेशनलिस्ट पार्टी ? हां मालवीय जी नेशनलिस्ट पार्टी के थे । ठीक ठीक । अरे साहब रोज बरोज इतनी पार्टी हो रही है कि याद रखना मुश्किल है । .... ओ , मार्क्स साहब ..... कोई पारसी थे क्या ? .... ओ ठीक ठीक । नमस्ते ।
' हजोर सेठ कुंदनमल आये हैं । '
' आइये सेठ जी । कहिये क्या खबर लाये हैं ? '
' हजुर उदर तो ठीक है । कड़क्टर साब तो पहले कांगरेसी सुबापति (सभापति) पर बात फेंक दीहिन । मैने कहा हुजुर तीन तीन सुबापति की बात है । फिर बाढ़ कुमेटी के शिकरेटरी साब हैं । भोत हंगामा है । और कड़कटर साब तो राजी हो गये । अब परस्तुती (परिस्थिति) है कि सिपड़ाई ऑफिसर (सप्लाई ऑफिसर) को राजी करना है । हुजुर से ...
हुजुर कोई बात नहीं । सब ठीक हो जायगा । हम आज ही कड़कता गिद्दी (गड्डी) में खबर देते हैं । डालिमचंद कड़क�ो हैं । ... उसके लिए आप बेफिक्र रहिये कंट्रोल के समय में डालिमचंद ने इतना रेडियो खरीदा है कि एकदम उस्ताद हो गया है।..... जी ? जानीवाकर ? आज ही भेज देता हूॅ ।...... जी उसके लिए आप बेफिक्र रहिये । म्हारा नौकर शिवदास एकदम उस्ताद है । पांच बरस में एक-दम उस्ताद हो गया है ।
' आइये धर्मदेव बाबू । '
हुजुर , वे सोशलिस्ट पार्टी वाले कहॉं से आये थे ?....... लेकिन सवाल है कि सहायता वे रिलीफ कमिटी की करने आये हैं या बाढ़ पीड़ितों की ? ..... तो गांवों में जायें .... ये लोग खामख्वाह हर जगह अड़ंगा डालने पहुंच जाते हैं ।
' स्टेनों बाबू को सलाम दो ।'
' हां देखिये । लाखिये टू द मैनेजर ... न ,. सेक्रेटरी सोशलिस्ट पार्टी । योर सर्विस ...
' अरे आप यह कह रहे हैं ? ' - धर्मदेव बाबू रोकते हैं । ' लिखा- पढ़ी की क्या जरूरत है ? चपरासी से खबर दे दीजिये ... । '
मोहनपुर कैम्प ।
मोहनपुर हाट जरा उॅंचा जगह पर है । यहां कैम्प है । हजारो की तायदाद में पड़े हैं , कुछ झोपड़े पड़े हैं , कुछ बन रहे हैं । रिलीफ कमेटी वाले यहीं आकर चीजें बांटते हैं । हर काम में अड़ंगा डालने वाले सोशलिस्टों ने भी यहीं कैम्प बनाया है। बॅंटवारे के समय , रोज जो हल्ला हो रहा है सो इन्हीं लोगों के चलते । अकेला जग्गू भोलंटियर । बेचारा करे तो क्या ? लोगों का वह बराबर समझाता था कि सुराजी सरकार के दो दुश्मन । मुस्लिंग और सुशलिंग । मुस्लिम तो हार गया , अब सुशलिंग है । लोग न सुनें , उपर भगवान त है । सब ने देख लिया न ! सुशलिंग वाले जिन लोगों की सिफारिश करते हैं उनकी दर्खास्तें नामंजूर हो जातीं है । ...
रात में नारायणपुर वालों और कुरसा कांटा वालों में लड़ाई होते होते बच गई । नारायणपुर वाले कह रहे थे कि कुरसा कांटा वालों को सुराजी सदावर्त लेने का कोई हक नहीं । ' डिस्टीवोट ' चुनाव में कांगरेस को भोट नहीं दिया था। कुरसा कांटा वालों का कहना है कि बंटवारा मुॅह देखकर होकर होता है , जाति पूछकर होता है। कुरसाकांटा में भूमिहार नहीं है न । नारायणपुर वालों कल पांच टीन किरासन तेल मिला और कुरसा कांटा वालों के समय मोमब�ाी भी घट गई । राजधाम के सभी मुसहर बगैर कपड़े के हैं और चैनपुर वालों को जोड़ा धोती मिली है। बहुत बात बढ़ गई ।
...... और खमख्वाह अड़ंगा डालने वाले सुश्लिंग लोग क्या करेंगे ? खुद उनके भोलटियरों को खाना नहीं मिलता । सुकुमार लड़के क्या खाकर भोलटियरी करेंगे । ज्यादातर बीमार है। वैसे ही यह डाक्टर लोग । प्रांत से आये हैं । चेयरमैन साहब के हुक्म के खिलाफ काम करते हैं । कहते हैं कि वे चेयरमेन के नौकर नहीं । अपने मन से सब दवा बॉंटते हैं । पार्टी वालों से बड़ा हेलमेल है । जग्गू भोलेंटियर का इस रिपोर्ट का जि0 कांग्रेस कमेटी के ऑफिस मंत्री जी बहुत ध्यान से सुनते ।
सोशलिस्ट पार्टी के इन्चार्ज साहब खाट पर लेते लेटे खत लिखवा रहे हैं - ध्रुव जी ! अब मै भी पड़ गया । एक दर्जन से ज्यादा लोग बीमार हैं । पैसा नहीं है ।
भोलानाथ भाई की खबर दीजिये । वैसे स्वयंसेवक ......... खुद आवें । मामला कुछ अजीब हो रहा है । सिलारी के जमींदार साहब बाढ़ कमेटी में लिये गये हैं। उनके आठ, दस ल�धर सिपाही आज मोहनपुर आये हैं । यहां अंधाधुंध चल रहा है। लूट मची हुई है । सेठ कुंदनमल और जमींदार साहब का गुटबंदी हुई है । कपड़े , अनाज और किरासन का ठेका सेठ जी को मिला है और बांस फूस का जमींदार साहब को ।
' जै गंगा मैया की जै !! '
पानी घट गया । जमीन धीरे-धीरे सूख रही है । गंगा की काली मिटी खेतिहरों को बुला रही है -' आओ बोओ और पंचगुना उपजाओ ।' आज आखिरी बंटवारा था । बांस , फूस , रस्सी , अनाज , बीज और पैसे । लोग अपने-अपने गांवों को जा रहे हैं । बीमार , बेघरवार , सर्वहारा , की टोली बचे- खुचे मवेशियों के झुण्ड के साथ जा रही है । जिन्हें सहायता मिली है वे खुश है । जिन्हें नहीं मिली , उनके मन में गुस्सा है । जम्मू भोलंटियर सबसे कहता है फिरता है - ' किस्सा खत्म और पैसा हजम ।�
पार्टी वालों का भी कैम्प टूट रहा है । एक दर्जन से ज्यादा बीमार स्वयंसेवकों को एक ही बैलगाड़ी पर लादकर चकमका भेजा जा रहा है ।
मनहरना घाट के बाबू अपने परिवार के साथ स्टेशन को लौट गये। बिरौली स्टेशन के मास्टर बाबू का बेटा टायफाड से मर गया। बेचारे का दिमाग खराब हो रहा है , शोक से । लेकिन छुट्टी नहीं मिली ।
बूढ़ा फैजू अपने पैंतीस मल्लाहों और बीस कूलियों के साथ बर्खास्त कर दिया गया है। गंगा शान्त है । जहाज धू धू कर कजरोटिया की ओर जा रहा है और फैजू पैदल गॉंव की ओर जा रहा है ।
डाक्टरों से ज्वाब-तलब किया गया है । क्यों नहीं उनलोंगो ने दवाईयों का स्टॉक सरकारी मालगोदाम में रहने दिया । चेयरमैन साहब से अभद्र व्यवहार कयों किया और डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट के अनुरोध करने पर भी रिलीफ कमेटी के साथ काम क्यों किया । नौजवान डॉक्टरों की टोली स्वस्थ हॅंसी हॅंसती है ! ठहाका मारकर ।
केसलयाबंड के ओवरसियर साहब की तरक्की हो गई । चकमका का माल गोदाम आज फिर खाली हुआ । चकमका स्टेशन मास्टर ने डेढ़ महीने की छुुट्टी ली है । उन्हें बहुत काम करना है । लड़की की शादी , जमीन खरीद से लेकर और भी बहुत छोटे बड़े काम ।
बाढ़ कचहरी बर्खास्त हुई जाघन कबाड़ी ने बैरा से बहुत सी चीजें सस्ते दर में खरीदी हैं - पोल्सन मक्खन के साथ राशन के अन्य सामान । किस्म किस्म के कपड़े । ...... टोकड़ी में फेंकी हुई है दर्खास्तें -चार बंडल यानि एक मन ।
खराब जलवायु के सेवन से धर्मदेव बाबू का स्वास्थ काफी गिर गया है। वे किसी पहाड़ पर जा रहे हैं ।

जै गंगा .....
सेठ कुंदनमल ने कठहारपुर में अपने मिल के अंदर अखण्ड गंगा कीर्त्तन की व्यवस्था की है। इस अवसर पर एक भारी प्रीतिभोज का आयोजन किया गया है । जिले भर के छोटे-बड़े हाकिमों को दावत दी गई है । इसी अवसर पर जिला कांग्रेस कमेटी वालों ने कठहारपुर में बैठक का प्रबंध किया है। सेठजी के बंगले के सामने सैकड़ों कुर्सियां लगी हुई हैं । एक ओर विभिन्न कीर्त्तन समाजवाले चिल्ला चिल्ला कर गा रहे हैं और नाच रहे हैं । एक बंगाली मंडली बड़े सुरीले स्वर में गा रही है -' बंदो माता सुरधुनी , पतित पावनी , पुरातनी , गंगे गंगे .....
मेहमान आ रहे हैं । कांगरेसी मेहमान को देखकर एक मंडली ने ' राम-धुन शुरू किया - ' रघुपति राघव राजा राम ।'
सेठजी हॅंस-हॅंस कर आगन्तुको का स्वागत कर रहे हैं । आज वे हाथ जोड़कर नया अभिवादन करते हैं - ' जै गंगा ' ! " जै गंगा....."

7 नवंबर 1948 को "जनता " में प्रकाशित
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Thursday, January 31, 2013

विश्वविख्यात गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह : मिलना एक जिनियस से



 डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह जी के साथ संजय शाश्वत की एक मुलाक़ात
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साल भर बाद, एक बार फिर मैं विश्वविख्यात गणितज्ञ  वशिष्ठ बाबू  के दरवाज़े पर था. पहली मुलाकात उनपर स्टोरी करने का दरम्यान हुई थी. गया था मीडियाकर्मी बनकर लौटा तो परिवार का सदस्य बनकर. पहली मुलाकात के बाद कई बार मिलना हुआ . कभी इंटरव्यू के लिए तो कभी यू ही.  असल में एक जबरदस्त लगाव महसूस करता हूँ. अपने क्षेत्र के जीनियस होने से ज्यादा कुछ महसूस करता हूँ उनके लिए. आप कह सकते है कि कलाकार होने के कारण कुछ ज्यादा ही भावुक हूँ . कुल मिलाकर बात ये है कि उनसे मिलने के लिए कुछ-न -कुछ बहाना निकाल ही लेता हूँ ...

डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह
आज जब पहुंचा  वो मुझे देख कर बहुत  खुश हो गए. बड़े ही प्रेम से मेरा हाथ पकड़कर अपने पास बैठाया. कुछ देर की बातचीत के बाद अपने बेडरूम में ले गए ....हाथों में कैमरा देख उन्होंने कहा कि यहाँ का फोटो खींचिए , इस जगह हमने पूरे  संसार को  रखा है और यहीं से कंट्रोल करता हूँ....फिर मुझे दूसरे कमरे में ले गए . वहा  रखे लगभग दर्जन भर बंद लोहे के बक्से को दिखाया और  हँसते हुए कहा कि इसमें पूरी सृष्टि  है. इस विषय पर उनके रिटायर्ड बड़े फौजी भाई ने बताया कि इसमें इनका शोध पत्र है. हमलोगों के लिए इसका महत्व तो नहीं है पर उन्होंने इसे बड़े ही जतन के साथ रखा है. पता नहीं क्या हुआ ....बस आंखे भर आयीं .... मैंने कैमरा में उन बोक्सों को कैद कर लिया. इसके बाद घंटों उनसे बातें हुई . कभी एटम बम की बातें बता रहे थे तो कभी अमेरिका को इंडिया के अधीन होने की बात कर रहे थे . मेरी फरमाइश पर उन्होंने गाना भी सुनाया - "मन डोले मेरा तन डोले" . तभी चाय आयी. हमलोग अभी चाय पी  ही रहे थे कि डॉ. साहब अपनी चाय ख़त्म कर लिए और अपने भैया से बोले - भईया, तनी खैनी खिलाव . मैंने डॉ साब से अंग्रेजी में कहा कि खैनी इज इञ्जुरिअस टू हेल्थ सर . उन्होंने तपाक से कहा - नो, खैनी इस नॉट इञ्जुरिअस टू हेल्थ, इट इज बुद्धिवर्धक . इसके बाद वो ठठाकर हंसने लगे.

कुछ भी कहूँ तो बेईमानी होगी ....न कहूँ तो मन बेचैन रहेगा . ये वही गणितज्ञ थे दुनिया जिनका लोहा मानती थी . एक ही मैथ को नौ तरीके से बनाकर जिन्होंने अपने शिक्षको को हैरान कर दिया था.

डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह व संजय शाश्वत 

डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह, उनके बडे भाई व संजय शाश्वत 


मा के साथ, डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह
अमेरिका से पटना साइंस कॉलेज में पधारे डॉ .केली जब इंटर के स्टूडेंट वशिष्ठ से मिले , और उनसे मैथ्स पर बहस किये तो  अचंभित रह गए. एक सिपाही का बेटा जो गाँव की पाठशाला में पढ़ा,  नेतरहाट स्कूल का टोपर  रहा  जिन्होंने एक ही साल में ग्रजुएशन किया.  कुछ ही माह में मास्टर डिग्री लेकर बर्कले विश्वविद्यालय, अमेरिका जा पहुंचा .

वही जीनियस आज मानसिक रोग से ग्रसित है.हालांकि  आज भी उनके हाथ में हमेशा  कागज व् कलम के रहता है. वे उनपर  कुछ न कुछ लिखते , रिसर्च करते मिल जाते हैं . मैं जब भी बसंतपुर (उनके गाँव) , जो आरा से महज १६-१७ किमी होगा, जाता हूँ तो उनके लिए कलम -कौपी जरुर ले जाता हूँ.

उनकी देखभाल  करनेवाले फौज से रिटायर्ड  बड़े भाई का एक ही सपना है कि  इनके नाम पर एक लाईब्रेरी खुले. उन्होंने मुझे ही इसकी जिम्मेदारी लेने की बात कही .  मै नहीं जानता कि इस जिम्मेदारी के लायक  हूँ या नहीं . पर उनकी उम्मीद को मै नकार नहीं सका. असर ये है कि कल रात भर बेचैन रहा.

-------संजय शाश्वत 

Monday, January 21, 2013

ये कैसी शिक्षा व्यवस्था ??

जब छोटी थी तब 'माँ ' अक्सर अपने बचपन की कहानी सुनाया करती ...वो बताती कि प्राईमरी स्कूल में उन्हें 'बोरा' (थैलियाँ जिनमे अनाज रखे जाते है ) लेकर जाना पड़ता था ...असल में उनमें बेंच नहीं थे ...ऐसे में 'बोरा' बैठने के काम आया करता....इन किस्सों को सुनकर मैं हैरान हो जाती ..क्योंकि मेरे लिए ये अनोखी बात थी...स्कूल, वो भी बिना बेंच के !! ...और पढाई बोरा पर बैठकर ??....अपनी माँ पर तरस आता, बुरा भी लगता और स्कूल की व्यवस्था पर हंसी भी आती ..कभी -कभी माँ मुझे डांटते हुए बोलती कि पढ़ोगी नहीं तो बोरा वाले स्कूल में नामांकन करा देंगे ...तब बहुत डर लगता ..हालाँकि उम्मीद नहीं थी कि ऐसा स्कूल अब भी होता होगा....

खैर... 'बाल महोत्सव' का आयोज़न के दौरान गांवों के स्कूलों के बारे में जाने-समझने का मौका मिला...शिक्षको और अभिभावकों से सुनने को मिला कि शिक्षा प्रणाली में घुन लग चूका है....कि शिक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च किया जा रहा है, पर 'वहीँ ' सबसे ज्यादा लूट है..कि शिक्षक नियुक्ति में सबसे ज्यादा धांधली हुई है ... कि विद्या के घर में विद्या छोड़कर बाकि सबका बसेरा है..वगैरह-वगैरह...

ग्रामीण बच्चों की मांग पर इस बार बाल महोत्सव ब्लाक स्तर पर भी आयोजित किया गया ...पहला पड़ाव कुल्हरिया में था ... दूसरा पड़ाव बडहरा के गाँव पडरिया में स्थित मध्य विद्यालय में था ...यात्रा सुखद रही...बांध पर बनी सड़क...बगल में बहती गांगी नदी...वृक्षों की कतार .. दूर तक फैले हरे-भरे खेत ....और छोटे-छोटे बच्चों का साथ (जो हमारे साथ आरा से गए थे ) ने यात्रा का अहसास तक नहीं होने दिया ....बहुत खुश होकर हम विद्यालय में दाखिल हुए ...भवन देखा तो अजीब सा लगा...बहुत पुराना तो नहीं था पर जगह-जगह दरारें आ चुकी थी...हालाँकि प्रांगन में ढेर सारे पेड़ों को देखकर हम खुश हो गए...अब बच्चों के बैठने की बारी थी..इसलिए हमने क्लासरूम का जाएजा लेना चाहा ..एक कमरे में कदम रखा देखा एक तरफ बेंच रखे है और दूसरी तरफ जमीन पर बोरे बिछे हैं...दूसरे कमरे में गयी वहां भी यही हाल...तीसरे, चौथे, पांचवे कमरे में तो एक भी 'बेंच' नहीं था...बोरा भी नहीं था (हाँ भाई, आखिर कितना बोरा भला स्कूल खरीदेगा ??) इसलिए बच्चे उसे घर से लाते थे ...झटका लगा ...अबतक गाँव के स्कूलों के दुर्भाग्य की गाथा सुना करती थी, आज देख रही थी...अपने बचपन में इस स्थिति की कल्पना मात्र से कितना डरती थी पर यहाँ के बच्चे, रोज उसका सामना करते है ...और बाकी साल उसपर बैठ भी जाये पर जब ठण्ड अपने चरम पर होती होगी तब ?? मन भर गया ...महोत्सव का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया ...सोच में पड़ गयी कि 'माँ' के प्राईमरी स्कूल जाने के वर्ष के बाद से कितने साल गुज़र गए हैं , पर हालात अब भी ज्यों की त्यों हैं ....क्या यही है इक्कीसवी सदी ?? सुनती हूँ कि सरकार शिक्षा पर बहुत ज्यादा खर्च करती है...फिर इन स्कूलों की ऐसी बदहाली क्यूँ?
जब छोटी थी तब  'माँ ' अक्सर  अपने बचपन की कहानी सुनाया करती ...वो बताती कि प्राईमरी स्कूल में उन्हें  'बोरा' लेकर जाना पड़ता था ...असल में उनमें बेंच नहीं थे  ...ऐसे में  'बोरा' बैठने के काम आया करता....इन किस्सों को सुनकर मैं हैरान हो  जाती ..क्योंकि मेरे लिए ये अनोखी बात थी...स्कूल, वो भी बिना बेंच के !!   ...और पढाई बोरा पर बैठकर ??....अपनी माँ पर तरस आता, बुरा भी लगता और स्कूल  की व्यवस्था पर हंसी भी आती ..कभी -कभी माँ मुझे डांटते हुए  बोलती कि पढ़ोगी नहीं तो बोरा वाले स्कूल में नामांकन करा देंगे ...तब बहुत डर लगता ..हालाँकि उम्मीद नहीं थी कि ऐसा स्कूल अब भी होता होगा....

खैर... 'बाल महोत्सव' का आयोज़न  के दौरान गांवों के स्कूलों के बारे में जाने-समझने का मौका मिला...शिक्षको और अभिभावकों से सुनने को मिला कि शिक्षा प्रणाली में घुन लग चूका है....कि शिक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च किया जा रहा है, पर 'वहीँ ' सबसे ज्यादा लूट  है..कि शिक्षक नियुक्ति में सबसे ज्यादा धांधली हुई है ... कि विद्या के घर में विद्या छोड़कर बाकि सबका बसेरा है..वगैरह-वगैरह...

ग्रामीण बच्चों की मांग पर इस बार बाल महोत्सव ब्लाक स्तर पर भी आयोजित किया गया ...पहला पड़ाव कुल्हरिया में था ... दूसरा पड़ाव बडहरा के गाँव पडरिया में स्थित मध्य विद्यालय में  था ...यात्रा सुखद रही...बांध पर बनी सड़क...बगल में बहती गांगी नदी...वृक्षों की कतार .. दूर तक फैले हरे-भरे खेत ....और छोटे-छोटे बच्चों  का साथ (जो हमारे साथ आरा से गए थे )  ने यात्रा का अहसास तक नहीं  होने दिया ....बहुत खुश होकर हम विद्यालय में दाखिल हुए ...भवन देखा तो अजीब सा लगा...बहुत पुराना तो नहीं था पर जगह-जगह दरारें आ चुकी थी...हालाँकि प्रांगन में ढेर सारे पेड़ों को देखकर हम खुश हो गए...अब बच्चों के बैठने की बारी थी..इसलिए हमने क्लासरूम का जाएजा लेना चाहा ..एक कमरे  में कदम रखा देखा एक तरफ बेंच रखे है और दूसरी तरफ जमीन पर बोरे बिछे हैं...दूसरे कमरे में गयी वहां  भी यही हाल...तीसरे, चौथे, पांचवे कमरे में तो एक भी 'बेंच' नहीं था...बोरा भी नहीं था (हाँ भाई,  आखिर कितना बोरा भला स्कूल खरीदेगा ??)  इसलिए बच्चे उसे घर से लाते थे ...झटका लगा ...अबतक गाँव के स्कूलों के  दुर्भाग्य की  गाथा सुना करती थी, आज देख रही थी...अपने बचपन में इस स्थिति की कल्पना मात्र से कितना डरती थी पर यहाँ के बच्चे, रोज उसका सामना करते है ...और बाकी साल उसपर बैठ भी जाये पर जब ठण्ड अपने चरम पर होती होगी तब ??  मन भर गया ...महोत्सव का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया ...सोच में पड़ गयी कि 'माँ'  के प्राईमरी स्कूल जाने के वर्ष के बाद से कितने साल गुज़र गए हैं , पर हालात अब भी ज्यों की त्यों हैं  ....क्या यही है इक्कीसवी सदी ?? सुनती हूँ कि सरकार शिक्षा पर बहुत ज्यादा खर्च करती है...फिर इन स्कूलों की ऐसी बदहाली क्यूँ?
                  बडहरा के गाँव पडरिया में स्थित मध्य विद्यालय

एक थी मुस्कान


एक थी मुस्कान (बदला हुआ नाम )....इंटर की छात्रा ....गडहनी ( भोजपुर, बिहार का ग्रामीण क्षेत्र) की निवासी....उसने भी अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष किया था ....यही नहीं उसने उन युवकों के विरुद्ध प्राथमिकी भी दर्ज कराई क्यूंकि उसे देश के कानून पर आस्था थी .....

बस, इसी एक कदम ने उसके जीवन को इतना यातनामय बना दिया की अंततः मुस्कान ने मौत को गले लगा लिया ...जैसे की एक 'अपराध' को सहन ना करके उसके खिलाफ आवाज़ उठाना एक 'पाप' हो ....उसे घर में बंद करने का फरमान जारी हुआ...बदचलन होने का प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया...माता-पिता सभी अपनी इज्ज़त की दुहाई देने लगे और उसे मुंह बंद रखने का आदेश सुना दिया ...मुस्कान इनसे जूझ नहीं सकी और ज़हर खा लिया .....हद तो यह की मर जाने के बाद भी उसे चैन से रहने नहीं दिया गया...लोगों ने मुस्कान को पागल घोषित कर दिया और सारा मामला रफा-दफा हो गया .....

ये उसी वक़्त की घटना है जब सब सड़ी हुई मानसिकता और व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलनरत थे...वी वांट जस्टिस, वी वांट जस्टिस चिल्लाये जा रहे थे ...जबकि मुस्कान अकेले 'न्याय' पाने की लडाई लड़ रही थी.... उसके समर्थन में नारे नहीं लगे ...उसकी याद में मोमबत्तियां भी नहीं जलाई गयी .... जब वह मर चुकी तो उसे इंसाफ दिलाने के लिए पूरे देश उठकर खड़ा नहीं हुआ ....न..ये कोई शिकायत नहीं बल्कि एक हकीक़त की ओर इशारा भर है की तमाम हो -हंगामे के बावजूद ऐसी घटनाएँ लगातार घट रही है ....सड़ी मानसिकता का विरोध करने के बजाय स्त्री के वस्त्रो और उसके व्यवहार पर बहस हो रही है.....और अब तो फिर से 'चुप्पी' पसर रही है... भयावह चुप्पी .....

Friday, January 18, 2013

लहराता परचम बाल महोत्सव का

यवनिका टीम
पिछ्ले वर्ष दिसंबर माह के आखिरी सप्ताह  में यवनिका संस्था के तत्वावधान  में वीर कुंवर सिंह स्टेडियम, आरा, बिहार में बाल महोत्सव का आयोज़न हुआ , जिसमे चित्रकला, कहानी/कविता लेखन, भाषण, सामान्य ज्ञान, सामान्य विज्ञान, नृत्य, गायन, एकल अभिनय, नाटक, फैंसी ड्रेस , कविता - पाठ जैसी प्रतियोगिताओं में लगभग 2 हज़ार बच्चों ने भाग लिया . देश में अपनी तरह का यह अनोखा और इकलौता  कार्यक्रम है जिसमे साहित्य और कला के प्रति बच्चों में रुझान पैदा करने की कोशिश की जाती है .

 वर्ष 2012  इस उत्सव का नौवा साल था . मतलब कि इस आयोज़न ने एक ठोस परम्परा का रूप ले लिया है,  बच्चे जिसका इंतज़ार बड़ी बेसब्री से करते हैं . वास्तव में यह एक ऐसा मंच बन चूका है जहाँ नन्हे-मुन्ने अपनी प्रतिभा का परचम लहराते है और  निखार पाकर पूरी दुनिया को अपनी हुनर का कायल बना देते है .

सृजन नाटक का एक दृश्य 
एम डी जे पब्लिक स्कूल , सोनवर्षा के बच्चे
 : नाटक के लिए तैयार 
बेपरवाह मस्ती और सबकुछ जान लेने की सृज़नात्मक जिज्ञासा का छोटा सा अक्स है  बचपन . उम्र का यह दौर निश्चिंतता, उन्मुक्तता , मासूमियत, शरारत और अथाह  संभावनाओं से  भरा होता है . कल्पनाओं की  ऊँची उडान भरते हुए , दादी- नानी की  कहानियाँ सुनते हुए बच्चे अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं . उन्हें न  किसी बात की फिक्र होती है ना ही जीवन-यथार्थ से जूझने की चिंता . लेकिन इस  'बचपन ' को ऐसे  सांचे की  जरुरत होती है जिससे इनका व्यक्तित्व निखरे और इनके जीवन में सुगढ़ता, सुन्दरता और चारित्रिक उन्नयन का समावेश हो. ऐसे ही सांचे का नाम है 'बाल महोत्सव',  जहाँ 'बाल विकास' के लगभग सभी आयाम मौजूद हैं .

राहुल कुमार सिन्हा, कक्षा  8 , की बनाई तस्वीर 
बाल महोत्सव की शुरुआत 2004 में हुई थी.  शुरु में यह जिला स्तरीय  था. अभिभावको और शिक्षकों की मांग पर इसे राज्य स्तर का किया गया. पिछ्ले साल छह जिलो के बच्चो ने महोत्सव मे भाग लिया था. आयोज़न के पहले वर्ष से ही इसमें ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की  भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की  गयी. संस्था के सचिव और महोत्सव के संयोज़क संजय शाश्वत ने बताया कि  शुरू में शहरी विद्यालयों के प्रबंधकों ने  ग्रामीण बच्चों की  क्षमता पर संदेह व्यक्त किया था कि वे शहर के बच्चों से मुकाबला नहीं कर सकते . परन्तु गाँव के बच्चों ने इन नौ वर्षों में पचास  से पचपन प्रतिशत पुरस्कार ,अपनी झोली में डाल कर सारी आशंकाओं को निर्मूल साबित कर दिया.


यानि कि श्रेय, अनिमेष, साक्षी, विक्रांत सम्राट, सागर , अंजलि, नेहा, तनुश्री, मीमांसा , प्रकाश जैसे शहर के होनहार बच्चे हों या मनोहर (कायमनगर), अनु (तरारी) , हिमांशु हीर (सहार ) , राकेश पटेल (सोनवर्षा), प्रवीन (महुओं) आदि गाँव से से आये प्रतिभावान बच्चे हों , सभी के सपनों  की ऊँची उडान में बाल महोत्सव सहभागी बना.

सागर, पुरस्कृत होते हुए 
विक्रांत सम्राट 
इसने उन बच्चों को भी सम्मान दिया जिसे समाज में हेय नज़रों से देखा जाता था. अनीता, गाँव एकवारी, थाना सहार. दलित जाति की इस बच्ची को समाज के तिरस्कार और अपमान की  आदत थी . पर 2006 के बाल महोत्सव की गायन प्रतियोगिता में पुरस्कार पाने के बाद स्थितियां बदल गयी. वह गाँव भर की  दुलारी बेटी बन गयी  . उसके गाने पर नाराज़ होनेवाले उसके मा-बाप अपनी बेटी की बडाई  पर फूले नहीं समाते . बसंत, गाँव धनछूहा . इस बच्चे ने कभी नहीं सोचा था कि वह कभी शहर के अच्छे स्कूल में पढ़ पायेगा . किसान पिता का यह बेटा गरीबी की मज़बूरी समझ रहा था . चमत्कार तब हुआ जब इसने बाल महोत्सव में भाग लिया . इसकी गायिकी पर मुग्ध होकर आरा शहर के प्रतिष्ठित स्कूल ने अपने यहाँ मुफ्त पढाई और संगीत शिक्षा का न्योता दिया. बसंत ने वही से पढाई की और मट्रिक उत्तीर्ण कर  गया.

सत्यम , बारह साल की उम्र में इसने आई. आई. टी. निकाल लिया 
कुछ बच्चे ऐसे भी हुए, जिनमे चमत्कृत कर देनेवाली प्रतिभा थी. किन्तु अभावों और सामाजिक परिस्थितियों  ने इनपर अंकुश लगा रखा था. रॉकर्स फ्रेंड्स क्लब का विक्रांत सम्राट डांस इंडिया डांस में चुन लिया गया तो सागर का चुनाव सोनी टी. वी. के इन्डियन आईडल जूनियर में हुआ है . बखोरापुर गाँव के  'सत्यम' का नाम तो आज  अन्तराष्ट्रीय फलक पर चमक रहा है,  जिसे देश और दुनिया का सबसे युवा आई. आईटियन होने का सम्मान प्राप्त  है. मात्र बारह साल की उम्र में सत्यम ने आई. आई. टी. निकाल लिया . सत्यम की कहानी अन्तराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बनी है. विदेशी पत्रकारों ने भी इसकी कहानी को कवर किया है .  इसकी प्रतिभा को भी पहली बार मंच दिया बाल महोत्सव ने. वर्ष २००४ में सत्यम ने इस कार्यक्रम के भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया था . तब यह मात्र पांच साल का था. स्कूल नहीं जाता था पर नौवी-दसवीं कक्षा के गणित और विज्ञान के सवाल चुटकियाँ बजाते हल कर देता था. महोत्सव के मंच से ही पहली बार सार्वजनिक  तौर पर इसकी प्रतिभा सबके सामने आयी. नामो की यह फेहरिस्त काफी लम्बी है क्यूंकि महोत्सव ने हजारों बच्चों की प्रतिभाओं को पुष्पित -पल्लवित करने में अपना योगदान दिया है .  आरा शहर के वरिष्ठ कवि और महोत्सव के निर्णायक मंडल के सदस्य पवन श्रीवास्तव ने महोत्सव के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि बाल-महोत्सव से प्रारंभ से जुड़ा हूँ. इस बार  इसके साथ थोडा ज्यादा समय बिताया तो लगा कि यह महोत्सव तो प्रतिभा कि नन्ही-नन्ही कलिओ को पुष्पित और फलित होने का अवसर देने का आयोजन है .एक ऐसा आयोजन ,जिसकी संभावनाओं से हम अभी भी पूरी तरह परिचित नहीं हो पाए हैं . .

अखबार में छपा एक आलेख 
एक ख़ास बात इस उत्सव की यह है कि इसमें वैसे क्षेत्रों से भागीदारी बढ़ाने की कोशिश की गयी जो कई सालों से उग्रवाद से पीड़ित थे . सहार के नाढ़ी, एकवारी , खादांव, नारायणपुर तथा पीरो के तरारी, सिकरहटा जैसे नरसंहारों से त्रस्त क्षेत्रों में बाल महोत्सव ने नए जागरण का सूत्रपात किया . यहाँ के बच्चे अब हथियार चलाने की शिक्षा नही लेते बल्कि कला व साहित्य की  साधना में लग जाते है, ताकि महोत्सव में अपना झंडा फहरा सकें . इसका सबसे बड़ा उदाहरण है २००७ के बाल महोत्सव की चार  प्रतियोगिताओं में अव्वल आनेवाला हिमांशु हीर , जिसने उस वर्ष की 'चैंपियनशिप ट्रोफी' भी जीत ली थी.  महोत्सव ने राज्य में एक नए सांस्कृतिक युग की शुरुआत की है , जिसमे बच्चों को श्रेष्ठ  नागरिक बनाने का प्रयास किया जाता है.
रानी और बलराज 

श्रेया समृद्धि : चैम्पियन 2010
वर्ष 2012 में महोत्सव ने भोजपुर में ब्लोक स्तर पर बरहरा, कोइलवर और सहार में  तीन सब सेंटर भी बनाये, उद्देश्य था गाँव के बच्चों को शहर आकर महोत्सव में भाग लेने की परेशानी से छुटकारा  देना. बरहरा ब्लोक के शिक्षक यशवंत जी ने कहा कि ब्लोक स्तर पर आयोज़न होने से वैसे बच्चे भी इसमें भाग ले सके जो दूरी के कारण मन मसोस कर रह जाते थे. यवनिका को ऐसे प्रयास के लिये साधुवाद .

इस क्रम मे  महोत्सव से कई अन्य कार्यक्रमो को भी जोड़ा गया. ग्रामीण बच्चों को कार्टून बनाना सिखाने के लिये कोईल्वर  और  बरहरा  मे  प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट 'पवन' पट्ना से आये.  हमारा सौभाग्य था कि रश्मि भाभी और ज्योति जी  भी उनके साथ थे.  पवन जी ने गांव के बच्चो को  लालु यादव और नितिश कुमार का  कार्टून बनाना सिखाया.

बाल महोत्सव में भीड़ 
बाल महोत्सव वृहद् आयोज़न है. अतएव  इसे कई चरणों में आयोजित किया जाता है. प्रथम चरण में कलम और तूलिका से जुडी प्रतियोगिताएं होती है, द्वितीये  चरण में गायन , नृत्य का सेमी-फाईनल और वाचन से सम्बंधित प्रतियोगिताएं होती हैं, तृतीय या अंतिम चरण में नृत्य, गायन का फाईनल और नाटक, अभिनय, फैंसी-ड्रेस, कविता-पाठ की प्रतियोगिताएं होती हैं .

अंतिम चरण चार दिनों का होता है . इस दौरान स्टेडियम भी छोटा पड़ जाता है.  नन्हे बच्चों के नृत्य, गीत  और अभिनय लोगों को दांतो तले उंगलियाँ दबाने पर मजबूर कर देता  है. बच्चों की  प्रतिभाएं इस कदर सम्मोहक होती हैं कि हजारों की  भीड़ भी आत्मानुशासन में बंध जाती है . अतिरेक उत्साह भी इसे तोड़ नहीं पाता. इन चार दिनों दिनों में स्टेडियम में मेला सदृश दृश्य उपस्थित हो जाता है. एक तरफ खाने-पीने की दुकाने तो दूसरी तरफ खिलौने और गुब्बारे बेचनेवाले. भीड़ के बीच में चलते -फिरते कार्टून बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी खूब लुभाते हैं . महोत्सव में बच्चों को भेद-भाव से मुक्त, एक निश्छल , उन्मुक्त माहौल मिलता है. एक ही मंच पर रिक्शावाले और अधिकारी के बच्चे नाचते-गाते हैं . बाल महोत्सव में उन्हें दोस्ती का नया सबक मिलता है.

 अंततः यह कहना उचित होगा की बाल महोत्सव बच्चों को स्वस्थ, स्वच्छ, प्रतियोगी माहौल तो देता ही है उन्हें एक सुनहरे सपने को जीने का मौका भी देता है .

कार्टूनिस्ट पवन जी ,बच्चो के साथ  :  कोईल्वर मे महोत्सव का उद्घाटन   करते 
कार्टूनिस्ट पवन व संजय शाश्वत 

















यवनिका परिवार
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प्रमुख संरक्षक - बक्सी नीलम सिन्हा
अध्यक्ष - श्री देवेन्द्र गौतम (वरिष्ठ पत्रकार )
सचिव - संजय शाश्वत (पत्रकार , रंगकर्मी )
कोषाध्यक्ष - स्वयम्बरा

सदस्य - प्रियम्बरा (लोकसभा टी वी ) , नितिन कुमार (अधिवक्ता) , अभिनन्दन कुमार, डॉ. अबरार, रजत बक्सी (प्रबंधक, एच दी ऍफ़ सी एर्गो ), अनुप कुमार (अधिवक्ता),  राणा रोहित, रणवीर रंजन मिश्र, दीपानिता राज, निरंजन ( सब एडिटर,ई. पेपर  भास्कर ), विनय यादव (शिक्षक, डी ए वी ), कुंदन सिंह   (शिक्षक, डी ए वी ),  अर्चना ( लेक्चरर) , सुनील, अजय केसरी , सुरभि जैन, सुप्रिया, अनुराग,  चन्दन ,  कपिल (शिक्षक), अभिषेक

चिल्लर पार्टी - ऋषिका, सृष्टि सिन्हा, स्मृति सिन्हा, अनुराग , रुझान, मीठी, आकाश, टुल्ली

हमकदम - प्रो. कमलानंद सिंह, डॉ. कमल कुमारी (सेवानिवृत प्राचार्या, महिला कॉलेज, आरा), प्रो . बलराम सिंह (एच ओ डी) , श्री पवन (वरिष्ठ कवि व योग प्रशिक्षक ), डॉ. जीवेश,   पवन (कार्टूनिस्ट), प्रो. रणविजय कुमार  (एच ओ डी) ,   सुरेश सर (सरकारी शिक्षक, महुआव),  सुरेश सर (शिक्षक,  सोनवर्षा)



http://www.bhaskar.com/article/BIH-PAT-news-about-bihar-bal-mahotsava-4156435-PHO.html









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