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यवनिका संस्था द्वारा 'सहार',बिहार मे 'बाल महोत्सव' का आयोज़न

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बिहार के 'सहार' प्रखंड का  नाम सुनते ही ऐसा भू-क्षेत्र आँखों के सामने आता है जो अपनी रक्तरंजित गतिविधियों के लिए कुख्यात था ... खौफ, दहशत और नफरत  ने पूरे प्रखंड को अपने आगोश में ले लिया था .....गाँव खाली हो चुके थे...लोग अपना घर - खेत छोड़कर पलायन करने पर मजबूर थे ...अखबारों के पन्ने वहा के वारदातों से रंगे होते थे ...  हम सब ये देखते-सुनते थे...समझ नहीं आता कि ऐसा क्या हो क़ि हमारे जिला के इस भाग में अमन और शांति लौट आये... 

धीरे-धीरे माहौल बदलने लगा पर अब भी कुछ ऐसा किये जाने कि जरुरत थी कि अपराधिक माहौल पूरी तरह बदल जाये...रास्ता एक ही था कि वहा कुछ ऐसा हो जो युवाओ, बच्चो का ध्यान पढाई, कला, साहित्य और खेल में लग जाये..वे उत्साहित हो...आगे बढ़ने की  इच्छा जागे ..

बाल महोत्सव की शुरुआत ही 'सहार' को ध्यान में रखकर हुई थी...उस समय तक यह क्षेत्र .नरसंहारो  के लिए कुख्यात था...बच्चो के हाथो में किताबो की जगह बंदूके रहती थी...हमारी टीम में एक सदस्य शामिल हुआ था रणवीर रंजन...वह भी सहार का रहनेवाला था..उससे कई बातो की जानकारिया हुई... हमें बहुत तकलीफ होती थी ....

अतीत तो बदल …

ख्वाहिशे

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सुनो,
कभी ऐसा भी तो हो
कि इक सुबह 
चल पड़े हम नंगे पांव घास पर,
बटोरे
ढेर सारी ओस की बूंदे
कभी 
भींग जाये बरिशो में
गुनगुनाए एक गीत
चल पड़े 
किसी ओर, कही भी
बस, हम और तुम
बैठे रहे इक नाव पर
करते रहे बाते
खामोशियो मे
छत के उस कोने से
देखते रहे, ढलता सूरज 
साथ-साथ
कभी मै बोलु और तुम सुनो
सुनते रहो मुझे, 
थामे हुए मेरा हाथ
इक आखिरी ख्वाहिश भी है
वह तो सुनो
कभी ऐसा हो,
कि तुम्हारी गोद में सिर रखकर
पढ्ती रहू 'अमृता' को
तुम,
गुनगुनाते रहो एक ग़ज़ल
और ...और
उस पल मे ही 
थम जाये सबकुछ
बंद हो जाये मेरी पलके
हमेशा-हमेशा के लिये
........स्वयम्बरा

डायरी के पन्ने (05.03.2004) : मेरे शिशु मेरे नवगीत

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मेरे शिशु मेरे नवगीत
जीवन बगिया के नन्हे फूल

गर्वित हर्षित ह्रदय मेरा
बन गया नवीन स्रष्टा तेरा,

मातृत्व -निर्झर में भींगा मन
हर पल सोचे कैसा है तू
मुझ जैसी  रुनझुन-पायलिया
या पौरुष का साकार रूप

नन्ही आंखे नन्ही बाहें
नन्हे अधरों की मुस्काने
है अभी कल्पना मेरी
पूरी होगी ये मन जाने

आये जो तू आँचल में मेरे
जी लुंगी फिर बचपन इक बार
तेरी स्मिति में ढूँढूँगी
अपना चेहरा, उनकी मुस्कान

हौले-हौले, चुपके-चुपके
कैसे आया तू जीवन में
अभी-अभी तो जाने था कहाँ
अभी-अभी कह गया तू 'माँ'

अपनी तुतलाती बोली से
'माँ' कहकर देगा ऐसी ख़ुशी
सारे-सारे सुखों में भी
जो कभी किसी को नहीं मिली


मेरी प्रतिकृति मेरा रक्त मांस ,
पल-पल जोहे तुझको ये साँस
पल-पल की ख़ुशी, पल-पल जीवन
पल ही पल में, पूरी होगी आस

......इसे अपनी अत्यंत प्रिय सखी को  लिखकर उपहारस्वरूप दिया था...वह 'माँ' बननेवाली थी...और उसकी ख़ुशी में 'मै' बावली हुए जा रही थी ....क्या दिन थे वे भी ...:)

बाढ़ ( बरहरा, भोजपुर, बिहार) की कहानी : तस्वीरो की जुबानी

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©  सर्वाधिकार सुरक्षित!

जिंदगी मे 'रिवर्स गियर' नही होता

चल,
फिर से बच्चा बन जाते है
लड़ते है, झगड़ते है
रूठते है, मनाते है
कट्टी ..कट्टी ....कट्टी
मेल्ली ...मेल्ली ..मेल्ली 

और जो मेल्ली न हो पाया तो?

उह!
हटाओ न, समझदारी का खोल
फेंक दो ना बड़प्पन दूर... बहुत दूर
खेलोगी, आंख मिचौली ?
देंगा-पानी, रुमाल चोर?

हाँ, सब खेल ही तो है !

फिर वही बात ?
ओ सयानी,
चल सुनाती हूँ एक कहानी
फूलकुमारी की
जब हंसती थी तो सारे फूल हँसते थे

जब रोती थी तो.......?

ओ....हो !
चल एक नाव बनाये
खेवेंगे साथ-साथ
बादलों के देश में ले जायेंगे उसे

अच्छा!
पल भर भी टिकेगी तेरी कागज़ की नाव ?

अब तू सुन!
छोड़ ये मासूमियत
ओढ़ ले मुखौटा
बन जा सयानी
मत उलझ,
सपनो की दुनिया में
कि नहीं आता बचपन कभी लौटकर
कि नहीं होता कोई जिसकी ऊँगली पकड़ चल पड़े हम
क्यूंकि जिंदगी मे  'रिवर्स गियर' नही होता
क्यूंकि  जिंदगी मे 'कोई' रिवर्स गियर नही होता
(आत्मालाप )

........स्वयम्बरा

'बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान'

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यवनिका 1993 से सामाजिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में सक्रिय रही है. वर्ष 1994 से 'यवनिका सम्मान ' की शुरुआत की गयी ...हालाँकि उसके बाद कई साल गुज़र गए ...अब तक जिन्हें सम्मानित किया गया है वो है ...राधा चरण सिंह (खेल), प्रो श्याम मोहन अस्थाना (रंगमंच ), पंडित देव नंदन मिश्र (शास्त्रीय संगीत ), डॉ के. बी. सहाय (कलाक्षेत्र-चिकित्सा व् समाज सेवा ), श्रीमती उर्मिला कॉल (साहित्य जगत ) .

वर्ष 2010 से इसे फिर से शुरू किया गया, जिसके तहत वैसे वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानित किया जाता है, जिन्होंने समाज को एक सकारात्मक दिशा दी है. सम्मान में एक प्रतीक चिन्ह, शाल, प्रशस्ति -पत्र दिया जाता रहा है. वर्ष 2012 से सम्मान का नाम 'बक्सी सुधीर प्रसाद स्मृति यवनिका सम्मान' गया . साथ ही सम्मान में 5001 रुपये की धनराशि भी जोड़ी गयी, जिसे 'बक्सी परिवार' वहन करता है .... ज्ञात हो कि 'बक्सी जी' यवनिका के संस्थापक सदस्य व् मुख्य संरक्षक थे , जिनका देहांत २०१२ के अगस्त माह में हो गया .

पिछले साल यह सम्मान 'बक्सी जी' की जन्मतिथि 23 दिसंबर को 'श्री सियाराम निर्भय जी' को दि…

डायरी के पन्ने

डायरी के पन्ने
दिनांक : 12.10.1998
..................................................
वह लावारिश लाश
पड़ी थी उधर
मुह खोले, टांग पसारे, हाथ फैलाये
सुना है कल रात किसी ने गोली मार दी उसे
यही बीच सड़क पर
तब भीड़ थी यहाँ
सुना है वह खूब चीखा, पुकारता रहा,
सबने अनसुनी, अनदेखी की,
भागते रहे गंतव्य की ओर,
झांकते रहे झिर्रियों से ,
जिसका चलन है शहर में
पुलिस आयी
लाल बत्ती, खाकी वर्दी, चमकते सितारे समेत,
उसके मरने तक खड़ी रही
इन्क्वायरी (?) के लिए
सुना है
वह लड़ता था ऊँची अट्टालिकाओं से
हक की लडाई
और कहते है,
इन्काउन्टर नहीं
मुठभेड़ हो गया, गुंडों का
मारा गया वह,
लोग गुजरने लगे है अब वहां से,
सफ़ेद रेखाओं के ऊपर से भी
पहियों, कदमो की धूल ने ढँक दिया  है
लाल धब्बों को,
अब तो ये भूली सी बात है
लोकतंत्र तो जनसमूह है न,
यहाँ अकेले की क्या बिसात है .

(जाने किस मनःस्थिति में इन शब्दों का सृजन हुआ था )

कब्र संवेदना की

बाते..बाते, 
बस बाते है चारो ओर
नपे तुले शब्द
भाव भंगिमा भी नपी तुली
मुस्कुराहटो के भी हो रहे  पैमाने....
बुद्धिजीवी का मुखौटा पहनकर
नाचते रहते है...
सच कहु तो 
लगते है मसखरा सदृश ....
हाथ नचाते, आंख घुमाते 
अपनी ही कहे जाते है 
वक़्त-बेवक्त चीखते-चिल्लाते, धमकाते  
खोदते है कब्र, संवेदना की  
मातम मनाते, ग़मज़दा (?) होते
धकेल देते है 'उसे' 
फिर भर देते है कब्र 
अपने  'अति विशिष्ट' विचारो की मिटटी से 

(ऊब और झुंझलाहट के बीच)

जै गंगा....!

रेनू जी की एक दुर्लभ रचना http://www.phanishwarnathrenu.com/ से साभार  जै गंगा......
इस दिन आधी रात को ' मनहरना ' दियारा के बिखरे गांवों और दूर दूर के टोलों में अचानक एक सम्मिलित करूण पुकार मची , नींद में माती हुई हवा कांप उठी - ' जै गंगा मैया की जै...!!
अंधेरी रात में गंगा मैया क्रुद्ध लहरें हहराती, घहराती पछाड़ खाती और फुफकारती हुई तेजी से बढ़ रही थीं।
लहरें उग्र होती र्गइं , कोलाहल बढ़ता गया - ' जै गंगा मैया ... मैया रे ... दुहाई गंगा मैया... भगवान..... ।'
...... गाय बैलों का बंधन काटो ... औरतों को चुप करो भाई , कुछ सुनने भी नहीं देती है , बच्चों को देखो , उॅचला बॉध पर औरतों को भेजो , अरे बाप रे , पानी बढ़ रहा है , रे बाप ! .... ! ... दुहाई ...
पानी उपर की ओर बढ़ रहा था , मानो उपर की ओर उठती हुई क्रंदन-ध्वनि को पकड़ना चाहता हो । ...
- ' दुहाई गंगे ....
' कलकल कलकल छहर छहर - एक फूट । '
- बचाओ बाबा बटेश्वरनाथ ...
' ओसारे पर पानी ' ।
- बाप रे , दुहाई गंगा.......
लहरें असंख्य फण फैला कर गांव में घुसीं । घर के कोने कोने में छिपे हुए पापों को खोजती हुई पतितपा…

विश्वविख्यात गणितज्ञ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह : मिलना एक जिनियस से

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डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह जी के साथ संजय शाश्वत की एक मुलाक़ात
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साल भर बाद, एक बार फिर मैं विश्वविख्यात गणितज्ञ  वशिष्ठ बाबू  के दरवाज़े पर था. पहली मुलाकात उनपर स्टोरी करने का दरम्यान हुई थी. गया था मीडियाकर्मी बनकर लौटा तो परिवार का सदस्य बनकर. पहली मुलाकात के बाद कई बार मिलना हुआ . कभी इंटरव्यू के लिए तो कभी यू ही.  असल में एक जबरदस्त लगाव महसूस करता हूँ. अपने क्षेत्र के जीनियस होने से ज्यादा कुछ महसूस करता हूँ उनके लिए. आप कह सकते है कि कलाकार होने के कारण कुछ ज्यादा ही भावुक हूँ . कुल मिलाकर बात ये है कि उनसे मिलने के लिए कुछ-न -कुछ बहाना निकाल ही लेता हूँ ...

आज जब पहुंचा  वो मुझे देख कर बहुत  खुश हो गए. बड़े ही प्रेम से मेरा हाथ पकड़कर अपने पास बैठाया. कुछ देर की बातचीत के बाद अपने बेडरूम में ले गए ....हाथों में कैमरा देख उन्होंने कहा कि यहाँ का फोटो खींचिए , इस जगह हमने पूरे  संसार को  रखा है और यहीं से कंट्रोल करता हूँ....फिर मुझे दूसरे कमरे में ले गए . वहा  रखे लगभग दर्जन भर बंद लोहे के बक्से को दिखाया और  हँसते…

ये कैसी शिक्षा व्यवस्था ??

जब छोटी थी तब 'माँ ' अक्सर अपने बचपन की कहानी सुनाया करती ...वो बताती कि प्राईमरी स्कूल में उन्हें 'बोरा' (थैलियाँ जिनमे अनाज रखे जाते है ) लेकर जाना पड़ता था ...असल में उनमें बेंच नहीं थे ...ऐसे में 'बोरा' बैठने के काम आया करता....इन किस्सों को सुनकर मैं हैरान हो जाती ..क्योंकि मेरे लिए ये अनोखी बात थी...स्कूल, वो भी बिना बेंच के !! ...और पढाई बोरा पर बैठकर ??....अपनी माँ पर तरस आता, बुरा भी लगता और स्कूल की व्यवस्था पर हंसी भी आती ..कभी -कभी माँ मुझे डांटते हुए बोलती कि पढ़ोगी नहीं तो बोरा वाले स्कूल में नामांकन करा देंगे ...तब बहुत डर लगता ..हालाँकि उम्मीद नहीं थी कि ऐसा स्कूल अब भी होता होगा....

खैर... 'बाल महोत्सव' का आयोज़न के दौरान गांवों के स्कूलों के बारे में जाने-समझने का मौका मिला...शिक्षको और अभिभावकों से सुनने को मिला कि शिक्षा प्रणाली में घुन लग चूका है....कि शिक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च किया जा रहा है, पर 'वहीँ ' सबसे ज्यादा लूट है..कि शिक्षक नियुक्ति में सबसे ज्यादा धांधली हुई है ... कि विद्या के घर में विद्या छोड़कर बाकि सबका बसेरा…

एक थी मुस्कान

एक थी मुस्कान (बदला हुआ नाम )....इंटर की छात्रा ....गडहनी ( भोजपुर, बिहार का ग्रामीण क्षेत्र) की निवासी....उसने भी अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष किया था ....यही नहीं उसने उन युवकों के विरुद्ध प्राथमिकी भी दर्ज कराई क्यूंकि उसे देश के कानून पर आस्था थी .....

बस, इसी एक कदम ने उसके जीवन को इतना यातनामय बना दिया की अंततः मुस्कान ने मौत को गले लगा लिया ...जैसे की एक 'अपराध' को सहन ना करके उसके खिलाफ आवाज़ उठाना एक 'पाप' हो ....उसे घर में बंद करने का फरमान जारी हुआ...बदचलन होने का प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया...माता-पिता सभी अपनी इज्ज़त की दुहाई देने लगे और उसे मुंह बंद रखने का आदेश सुना दिया ...मुस्कान इनसे जूझ नहीं सकी और ज़हर खा लिया .....हद तो यह की मर जाने के बाद भी उसे चैन से रहने नहीं दिया गया...लोगों ने मुस्कान को पागल घोषित कर दिया और सारा मामला रफा-दफा हो गया .....

ये उसी वक़्त की घटना है जब सब सड़ी हुई मानसिकता और व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलनरत थे...वी वांट जस्टिस, वी वांट जस्टिस चिल्लाये जा रहे थे ...जबकि मुस्कान अकेले 'न्याय' पाने की लडाई लड़ रही थी.…

लहराता परचम बाल महोत्सव का

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पिछ्ले वर्ष दिसंबर माह के आखिरी सप्ताह  में यवनिका संस्था के तत्वावधान  में वीर कुंवर सिंह स्टेडियम, आरा, बिहार में बाल महोत्सव का आयोज़न हुआ , जिसमे चित्रकला, कहानी/कविता लेखन, भाषण, सामान्य ज्ञान, सामान्य विज्ञान, नृत्य, गायन, एकल अभिनय, नाटक, फैंसी ड्रेस , कविता - पाठ जैसी प्रतियोगिताओं में लगभग 2 हज़ार बच्चों ने भाग लिया . देश में अपनी तरह का यह अनोखा और इकलौता  कार्यक्रम है जिसमे साहित्य और कला के प्रति बच्चों में रुझान पैदा करने की कोशिश की जाती है .

 वर्ष 2012  इस उत्सव का नौवा साल था . मतलब कि इस आयोज़न ने एक ठोस परम्परा का रूप ले लिया है,  बच्चे जिसका इंतज़ार बड़ी बेसब्री से करते हैं . वास्तव में यह एक ऐसा मंच बन चूका है जहाँ नन्हे-मुन्ने अपनी प्रतिभा का परचम लहराते है और  निखार पाकर पूरी दुनिया को अपनी हुनर का कायल बना देते है .

बेपरवाह मस्ती और सबकुछ जान लेने की सृज़नात्मक जिज्ञासा का छोटा सा अक्स है  बचपन . उम्र का यह दौर निश्चिंतता, उन्मुक्तता , मासूमियत, शरारत और अथाह  संभावनाओं से  भरा होता है . कल्पनाओं की  ऊँची उडान भरते हुए , दादी- नानी की  कहानियाँ सुनते हुए बच्चे…