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Showing posts from February 12, 2012

कहा गए ये बहुरूपिये ??

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बहुरुपिया!! याद आया??? यही मौसम हुआ करता था न! फाग का!...आते-जाते विभिन्न रास्तों पर तरह-तरह का स्वांग रचे बहुरूपिये नज़र आते थे .. फाग की मस्ती इनके कारण दोगुनी हो जाया करती थी ... होली के दिन गाँव-कस्बों में निकलनेवाले गोला(टोली) में एक बहुरूपिये का होना जरूरी होता था.. बुजुर्गों से सुना कि तब इनकी विशेष मांग थी..लोग इनकी कलाकारी पर चर्चाएँ करते और इन्हें इनाम भी देते थे .... इनकी रूपसज्जा ऐसी की आज के मेकअप आर्टिस्ट भी मात खा जाये...कभी हनुमान बनते तो लोग चढ़ावा चढाने लगते...राक्षस बनते तो लोग डरकर दूर भागने लगते...कभी-कभी पेट में तलवार घुसेड़े होने का स्वांग करके लोगो का मनोरंजन करते...मेरी माँ बताती है कि एक बार बहुरुपिया पोस्टमैन बनकर आ गया..मम्मी ने सोचा नाना की चिट्टी है..वो दौड़ी-दौड़ी आयी....कुछ देर अभिनय के बाद वह हसने लगा तबतक बाबा भी आ गए वो भी हसने लगे ....

बहुरूपिये हम बच्चों की भी उत्सुकता का केंद्रबिंदु होते थे...हम कभी खुश होते तो कभी घबराते ...इनके पास जाकर इन्हें छूकर देखते थे ...विद्वानों कि राय है कि बहुरुपिया मुग़ल दरबार का विशेष आकर्षण होते थे...मध्यकाल में बहुर…