मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Saturday, October 11, 2008

एक धमाका


एक धमाका,
और बदल गया कितना कुछ
हँसते मुस्कुराते चेहरों की जगह
बिखर गए यहाँ-वहां खून से सने अंग
अब पसरा है हर ओर
सन्नाटा
जिसे तोड़ती है
दूर कही से आती, रोने की आवाजें
इस धमाके ने हमें
इस कदर किया है खौफजदा
कि डर लगता है
किसी गरीब की मैली-कुचैली पोटली से भी
जिन्हें फूटपाथ पर रख देने की
उनकी होती है मजबूरी
एक धमाके ने
जाने कितने रिश्तो में भर दिया है आतंक
कल तक,
उनकी सेवइयां और हमारे लड्डुओं में
मिठास तभी मिलती
जब ये एक-दूसरे के घरों में चले जाते
पर देखो तो
आज
उनकी परछाइयों तक से हमें डर लगने लगा है

Thursday, September 11, 2008

मीडिया का महाप्रलय

विश्व विज्ञानियों का एक सामूहिक प्रयास ब्रमांड की खोज ने जहाँ पूरे विश्व को लगातार रोमांच से भरा रखा वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पिछले सप्ताह भर से भोली -भाली भारतीय जनता को डराए रखा। इंदौर की एक लड़की ने तो आत्म हत्या कर ली .उन तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडिया के अनुसार विज्ञानं के उक्त प्रयोग से श्रृष्टि का सर्वनाश हो जाएगा , पर हुआ कुछ नहीं.लेकिन उनकी खबरों ने तो जान तक ले ली। आख़िर कब तक मीडिया का कहर जारी रहेगा? मीडिया के तरफ़ उठी हुई उंगली एक यक्ष प्रश्न है-------.जेनेवा में विज्ञानं का प्रयोग मानव सभ्यता को विकसित करने का एक प्रयास है। प्रयोग के सप्ताह भर पहले से विश्व प्रयोग का लुत्फ़ उठा रहा था ,लेकिन भारतीयमीडिया की खबरों ने जनमानस को लगातार डराए रखा . गांव वाले तो डरकर पूजा पाठकर रहे थे .कुछ लोग अपना सारा काम छोड़ मंगलवार के दिन सपरिवार ईश्वर से लगातार प्रार्थना करते नज़र आए .सबके जेहन में मात्र एक ही बात थी कि वे लोगअब जिन्दा नहीं रहेंगे .इंडिया टीवी ,आईबीएन ७ जैसे न्यूज़ चॅनल ने तो जनता की साँस सांसत मेंडाले रखी। आम जनता की ओर से इन टीवी वालों को आगाह करना चाहूगी की अब तुम ऐसी खबरों को परोसने से बाज़ आ जाओ ,अन्यथा बहुत ही पछताना पड़ेगा-----। swayambara

Friday, August 29, 2008

छनिकाएं -भूख की

1
मर गई 'वह'
'भूख 'से बिलबिलाते
सोती रही 'मानवता '
2
'प्रेम' की जगह
लिख दो 'भूख '
लैला-मजनू
अब पैदा नही होते

आदमी 'भूखा 'है
वो नोचता है दूसरों को
उन्हें मार देने तक

Thursday, August 28, 2008

बाढ़ की तबाही



बिहार में बाढ़ का  तांडव  फिर से शुरू है  .बिफरी हुई  सोन नदी  अपनी सारी सीमाओं को तोड़ती हुई विनाश कर रही है.  पर इस बार ये  बाढ़ प्रकृति का प्रकोप नहीं बल्कि नहीं बल्कि मानवीय कारगुजारियो का प्रतिफल है. सोन नदी पर मध्य प्रदेश में बांध  बना है. इस पर निर्मित इन्द्र बैराज से बिहार की और पानी छोड़ा जाता है. इस बार भी ये हुआ और गरजती हुई नदी का पानी बड़ी  वेग से बिहार में प्रवेश कर गया . परिणाम ये है की बिहार के लगभग आधा दर्ज़न जिलों में बाढ़ आ चूका है. ६-७ घंटे पहले जो नदी सूखी पड़ी थी उसमे देखते ही देखते इतना पानी आ गया की कई गाँव डूब गए. ये सब इतनी जल्दी  हुआ कि किसी को सँभालने का मौका तक नहीं मिला. हालाँकि जब ये पानी बिहार में प्रवेश किया तो प्रशासन  द्वारा इसकी सूचना दी गयी पर सोन के कगार पर बसे गाँव के निवासिओं को इसपर यकीन नहीं हुआ. उन्हें अपने अनुभवों पर ज्यादा  भरोसा था. पर अब चारो और हाहाकार मचा हुआ है. इस तबाही  में हमारा भोजपुर जिला भी शामिल है. सच,  कुदरत के सामने मानव कितना बेबस हो जाता है . 
              ये बाढ़ हर साल हमारे लिए बर्बादी की सौगात लाता है. पर ये  तबाही बस उतनी  ही नही होती जितनी हमें दिखती है .बाढ़ किसी का सबकुछ लूट ले जाता है.ये किसी गर्भवती को पानी में बच्चे पैदा करने पर विवश कर देता है.ये मात्र एक छोटी सी चोकी पर पूरे परिवार को दिन गुजारने पर मजबूर कर देता है.ये सभ्यता को दरिंदगी में बदल देता है.ये आत्मीय - जनों  को मरते देखने के लिए बेबस करता है. जी हाँ, बाढ़ कुछ ऐसा ही होता है कि  आप अपने घर की छत पर शरण लेते है और भयावह लहरे आपके पूरे मकान को नीचे-नीचे निगल जाती है .आप बाढ़ से बचने के लिए अपने छोटे बच्चे को सुलाकर इंतजामात करने जाते है, जब लौटते है तो आपको आपके बच्चे का तैरता हुआ शव मिलता है .हाँ,मनुष्य और जंतुओं का सहजीवन जरूर इसी बाढ़ में देखने को मिलता है.क्योंकि उन जंतुओं को भी अपने जीवन की उतनी ही परवाह होती है. भले ही इसके एवज में मानवों को जान गवानी पड़े . बचपन में हमारे लिए बाढ़ अपने रिश्तेदारों से मिलने  की एक वजह हुआ करता था, क्योकि उनका घर बाढ़ में पूरी तरह डूब जाता था और उन्हें हमारे घर में शरण लेना परता था. पर तब बाढ़ के प्रलयंकारी रूप का पता नही था.अब सोचती हूँ तो लगता है कि उन लोगो को कितनी कठिनाइयां  उठानी होती होंगी. इस बार के बाढ़ ने भी तबाही मचाई है, चारो और पसर गई बर्बादी दिखने लगी है . भूख से बिलबिलाते ,डरे ,बिलखते चेहरे, गंदगी  और मवेशिओं के शवो के सरांध आम दृश्य बन गए है. जबकि  बाढ़ के पानी के उतारने  के बाद महामारी का  प्रकोप अभी बाकी ही है. अब बस  इश्वर से  यही प्रार्थना है  कि वो हम बिहार के  बाढ़ पीडितो को सबकुछ बर्दाश्त कर जाने का हौसला दे.आमीन.

Monday, August 25, 2008

दीपक, बुलंद इरादोवाला एक बच्चा


दीपक, एक ऐसा बच्चा जिसने मुझे जिन्दगी जीने कि प्रेरणा दी .कुदरत ने उसके साथ नाइंसाफी की है. वो गूंगा और बहरा है. पर उसके हौसले  हिमालय जैसे बुलंद हैं . उन दिनों मै सिविल सेवा के लिए इंटरव्यू में चयनित नही होने के कारन हताश थी. इसी समय मुझे इस मासूम के बनाये चित्रों की प्रदर्शनी में बुलाया गया. अनमने ढंग से देखने गई. दीपक और उसके बनाये चित्रों को देखकर अवाक् रह गई. हँसता-मुस्कुराता वह बच्चा कितनी आसानी से अपनी विकलांगता को ठेंगा दिखा रहा था और मै एक छोटी सी हार से हताश हो गई थी. उस बच्चे के इरादों ने मुझे फिर से लड़ने के लिए तैयार कर दिया. जैसे कि एक भयानक सपना देखकर जाग गई. घर आई तो मेरी लेखनी खुद ब खुद चल पड़ी, जिसने दीपक के ऊपर लिखी गई कविता का रूप ले लिया-

तू विधु शीतल कोमल-कोमल,
नन्हा-दीपक निर्झर झर-झर
असाधारण-अखंड -ज्योति तू जो
जलता है हरदम हर-हर पल
या की सतजुग का कोई ऋषि
उस, निराकार का अभिलाषी
या 'दिनकर' का तू 'रश्मिरथी'
संघर्षशील पुरुषार्थ वही
ना-ना तू है वो 'निराला-राम'
तम्-रावण को हरता हर कही
या जन्मा तू अवतार कोई
कहने महत्ता 'ढाई-आखर' की ,
कि मै औ' तू की भिन्नता छोड़ो
हो जाओ प्रकृति से एकाकार
आकृति, रंग ,तूलिका तेरे
देते ये संदेसा बार-बार
दीपक प्रज्जवल हो ज्वलित बन
जला कलि के सारे तम् को
करके झिलमिल-झिलमिल-झिलमिल
दिखलादे राह भटके हुए को
तू है दीपक, दीपक है तू
गुण-नाम धन्य स्रष्टा बनकर
अपनी चित्रों की पूर्णता से
बन जा तू भी संपूर्ण भास्कर

Friday, August 22, 2008

दिल्ली प्रवास का पहला अनुभव


लगता नहीं,
ये जहाँ मेरा है
जलती-बुझती, चमकीली रोशनियों से
चोंधिया गई हैं मेरी आँखे
देखो न
यहाँ खो गई है आदमियत
चारों ओर है आत्मियता का अभिनय करते
रंगे -पुते चेहरे
जहाँ मेरे 'गवईपन' की मासूमियत 
'मिसफिट' पाती है ख़ुद को
बड़े शहर के 'सतरंगे सपनो' का
'यथार्थ' यही है क्या
कि मुझसे मुझी को छीन कर
बना दे एक 'विदूषक'
और मिटा दे
मुझमे बसी मिटटी की मोहक गंध

मेरी प्रेरणा

छोटे से शहर से निकलकर दिल्ली में आना और अपनी जगह बनाना कम से कम मेरे लिए एक बहुत बड़ी बात है । ऐसे में कई बार हार जाने जैसा अहसास होता है । पर हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तिया हमेशा मुझे हौसला देती है।मेरे जैसे और लोगो के लिए समर्पित है ये कविता.........

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती...

भूले बिसरे लोक खेल



बचपन ........मस्ती शरारतो एवं जिज्ञासाओं से भरी बेपरवाह उम्र..... ना कमाने की फिक्र होती है न ही जिन्दगी जीने की चिंता... न ही जिन्दगी की सच्चाईयों  का सामना करने की जरूरत ....अगर कुछ होता है तो सिर्फ  खेल.... खेलो की दुनिया ही बच्चो की वास्तविक दुनिया होती है....

कभी खेल प्रकृति की गोद में खेले जाते थे.... इनकी मस्ती का आलम ये था कि बच्चे बिल्कुल उन्मुक्त होकरखिलखिलाते थे.... इनमे सामान्य लोक खेलो के अलावा मौसमो के खेल भी थे....यहाँ तक कि ' चिढाना' भी एक खेल ही  होता था...जब बच्चो की भीड़ किसी चिढनेवाले बूढ़े  को देखती तो समवेत स्वर में गाने लगती...
" बुढवा  बेईमान मांगे करेला के चोखा"


गाँव में कोई नई दुल्हन आती तोपिचा-पीछे  लग जाती बच्चो की टोली ......
"ऐ कनेवा , 
दुगो धनिया द, 
लाल मरचाई के फोरन द"


किसी नंग-धरंग बच्चे  को देखा और चिढाना शुरू........
"लंगटा  बे लंगटा , 
साग रोटी खो ,
गधा  प् चढ़  के बियाह करे जो "



मौसमो के भी खेल हुआ करते थे। बरसात आई। बूंदे बरसने लगी। सूखने के लिए रखे गए उपले या कहे तो गोइठे भींगने लगे ....घर की बूढी औरते दौड़-दौड़ कर इन्हे उठाने लगी... इसे देखकर बच्चो का मन कैसे चुप रहता..वह गा उठा......
"आन्ही-बून्ही आवेला,
 चिडिया ढोल बजावेला,
हाली हाली बुढिया माई 
गोइठा ऊथावेली"


सावन के काले काले मेघ फुहारे बरसा रहे हैं। चारो और हरियाली छाई है । ऐसा मौसम खेल का ही तो होता है। बच्चो की टोली एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चक्कर लगाने लगती है ....गाना शुरू हो जाता....
"चकवा चकईया , हम तुम भइया
भइया के बियाह में, चार सौ रुपिया"


 जब झमाझम बरखा होने लगी तो  बधार में खेलना मुश्किल हो गया...अब तो बादल को भगाना जरूरी हो गया....
"एक पैसा लाइ ,
बाज़ार में छितराई
 बरखा ओनिहे बिलाई"


अब जाड़े का मौसम आया। ऐसे में 'माँ  के अंचल' में दुबककर सोना हो या 'आग तापना'... जिन्दगी का सबसे सुनहरा  पल बन जाता है....जाड़े  की धूप पाना भी खेल का हिस्सा बन जाता था... जहाँ किसी ने दुसरे ने आपके हिस्से की धूप को छेका की हल्ला शुरू ...........
"घाम छेके घमरा ओकर बाप चमरा"



इन खेलो में आज की तरह दिखावा नही था। बच्चे तनावमुक्त होकर खेलते थे। पर अब तो ये खेल अतीत की कब्र में दफ़न हो गए है, जिनकी सिर्फ़ यादे ही बाकि है. उस दौर के खेल ऐसे थे जो बच्चों में सामाजिक बोध का अहसास भी खेल-खेल में ही करा दिया करते थे.... सामूहिकता की भावना पनपती थी...अपनत्व, भाईचारा जैसे मूल्यों का समावेश भी यूँ ही हो जाया करता था ...हालाँकि आज गाँव-गाँव में विकास हो रहा है..पर दूसरी तरफ बच्चो के ये खेल लुप्त होते जा रहे है.... गाँव में भी क्रिकेट और आई टी क्रान्ति सर चढ़कर बोल रहा है....जो हमें 'व्यक्तिगत' या  'एकाकी' बनना अधिक सिखाता है..   इन खेलो से बच्चो को जो अपनापन स्नेह और संस्कार मिलता वो उनके मानसपटल पर आजीवन अंकित रहता... आज ना जाने कहा खो गए वे खेल...हालाँकि उन खेलो की मिठास अब भी कही बाकि है।

Wednesday, July 30, 2008

कब तक जारी रहेगा महिला रंगकर्मी ka sangharsh


हम लाख आधुनिक हो जाए पर हमारी सोच सदियों पुरानीही रहेगी। अब नाटकों की बातें ही करे तो ये अक्सर होता है की जब लड़के नाटक करने के लिए हमारे पास आते हैं तो हमें इस बात की फिक्र नही होती की उन्होने अपने माता पिटा से पूछा है या नही। पर जब बात किसी लड़की की होती है तो हमारी ही सलाह होती है की पहले अभिभावक से पूछ लो। या हम ही उनसे अनुमति मांगते है।जैसे की हम kooch बहुत बुरा कर रहे है.यहाँ तक की हम अपने शहर में समाज के डर से naatak नही करना chhahte.क्योंकि जो manch हमारे लिए poojaaghar है vo हमारे शहर के लिए बरबाद होने की ख़ास जगह है। मुझे याद है vo किताब.........मुझे chhand chhahiye ।छोटे शहर की oos नायिका का sangharsh अब भी जारी है । हम जो समाज को एक दिशा देने की कोशिश में लगे रहते हैं,लोगो को ये बताने में अबतक नाकाम हैं की रंगकर्म कितना पवित्र है। इसके माध्यम से हम समाज की कुरीतियों पर आघात कर उसे नस्त कर सकते हैं। पर देखिये तो हम रंगकर्मी ही इनके किस कदर शिकार हैं.yahi है हम महिला rangkarmiyon और हमारे छोटे से शहर के रंगकर्म की बदनसीबी.जो हो पर नाटकों से hamaara lagaav अब भी badastoor जारी है.और साथ ही जारी है hamaara सतत sangharsh।

Tuesday, July 29, 2008

भोजपुरी चित्रकला कोहबर


बिहार की लोकचित्रकलाओं में मधुबनी पेंटिंग और इसके कलाकारों की पहचान अंतर्राष्ट्रीय जगत में है, किंतु इसी सूबे के भोजपुरी क्षेत्र की लोकचित्रकला अपना वजूद कायम रखने के लिए संघर्षरत है. आम लोग इसे कोहबर तथा पीडिया के रूप में जानते हैं, जो त्योहारों या विवाह आदि अवसरों पर घर में बनाया जाता है. इस कला से भोजपुर प्रक्षेत्र का कोई घर अनभिज्ञ नहीं, बावजूद इसके, इसने चौखट लांघकर आगे बढ़ने का साहस अभी तक नही दिखाया है. जबकि सामाजिक जीवन से जुडाव को दर्शानेवाले इन चित्रों में लोक जीवन्तता के लगभग सभी रंग दीखते हैं।

'कोहबर' भोजपुर जनपद की महिलाओं द्वारा बनाया गया एक भित्तिचित्र है, जिसे विवाह के अवसर पर  वर -वधु के कमरे में बनाया जाता है. परंपरा ये है की इसे घर की बेटियां या बहुएँ ही बनाती है . 'कोहबर' रंगने के कुछ नियम हैं ..इसे परम्परानुसार ही बनाया जाता है .....यद्यपि हमारे देश में कई जगहों पर भित्तिचित बनाये जाते है पर कोहबर में प्रयुक्त ज्यामितीय आकृतियाँ व रंग इसे  अन्य भित्ति चित्रों से अलग करते है.  जनपद में ही गंगा के उत्तरी एवं दक्षिणी हिस्से में बनाए गए कोहबर की आकृतियों तथा रंग प्रयोग में अन्तर आ जाता है.


रंगों में कही गेर का प्रयोग होता है, तो कही गेर, चंदन, हल्दी, चावल का आटा, फूलों का रस आदि द्वारा रंगीन 'कोहबर' बनाया जाता है. 'कोहबर' के चित्र सामान्यतः सुखद दाम्पत्य जीवन एवं सांसारिक क्रियाकलापों को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाते हैं, जिसमे वर-वधु  के सुंदर भविष्य की कामना छिपी होती है.  इसे बनाते समय हर औरत गा उठती है-

"कौशल्या माता कोहबर लिखेली  हो,
बड़ा ही जतन से
गंगा- जमुनावा  के बिछावन करेली हो,
बड़ा ही जतन से"


'कोहबर' में सबसे पहले दीवार पर चंदन का लेप लगाकर गणेश भगवान्  की स्थापना की जाती हैं, फ़िर सात देविओं के प्रतीक के रूप में  सात पिंड बनाकर, उसे लाल कपडे से ढक कर उसपर सिंदूर का टीका लगाया  जाता है.  इसके नीचे मोटे सूत को गेर में रंगकर, लगभग ढाई फीट लम्बा और लगभग दो फीट चौड़ा आयताकार आकार, बनाया जाता है. इस आयत की बाहरी रेखाओं को कंगूरे, लताएँ, शंख, फूल व विभिन्न रेखाकृतियों से सजाया जाता है. आयत के अन्दर ज्यमितिये आकार के विभिन्न प्रकार के प्रतीक चिह्न बनाये जाते है, जो विशेष अर्थ देते हैं.  'पालकी' वर-वधु का, 'बांस' वंश बढ़ने का, 'स्वास्तिक' शुभ का, 'कजरौटा' बुरी नजर से बचने का, 'मछली' मैथुन का, 'आईना' श्रृंगार का, 'पुरईन का पत्ता' परिवार संतान  का, 'सिन्दूर' सुहाग  का, 'कमल' परम्परा का, 'शिवा माई' देव आशीष का, 'घोडा' सुखद दाम्पत्य का प्रतीक होता है.

'कोहबर'  को पहचान दिलाने का स्थानीय  कलाकारों द्वारा प्रयास किया जा रहा है. इसमें मिटटी की सोंधी महक है तो प्रयोग की असीम संभावनाएं भी है. इनमे ऐसी क्षमता है कि ये अंतर्राष्ट्रीय फलक पर  छा  जाएँ . किंतु संरक्षण के अभाव में ये कला अपने आप को बचाए भी रख पाएंगी , ऐसा नहीं दीखता.

Tuesday, July 22, 2008

पटना का महिला रिमांड होम

.मैं मीडिया से जूडी हूँ.हमारे पास स्टोरी आई ..पटना के महिला रिमांड होम की.वहाँ कैद औरतो की जिन्दगी सिसकीयूं में कटती है.उनके साथ जानवरों सा बर्ताव किया जाता है.जबकि उनमे से आधिकतर सिर्फ़ प्रेमविवाह कर ने के लिए बंद हैं। सलाखों में कैद ये लोग जिंदगी और अकेलेपन से जूझने को बेबस हैं.par इन्हे इनके अपनों से भी मिलने नही दिया जाता है .वहा के हालात ऐसे रूह काँप उठे।एक छोटे से कचरे से भरे कमरे में रहती हैं ये संवास्नी.चारो तरफ़ पसरी रहती है गंदगी .बात बेबात होती है मारपीट.खाने को मिलता है सदा गला खाना.वहा की अधिकतर लड़किया नंगे रहने को है मजबूर.इतने पर भी मंत्री मुस्कुराते हुए सबकुछ ठीक होने की बात करते हैं.जबकि महिला आयोग को तो कोई जानकारी ही नही. वो जांच करने की बातें करती है.वहाँ ऐसी लड़किया भी कैद है जो शारीरिक और मानसिक तौर पर अपांग हैं.जिन्हें उनके माँ बाप ने सडको पर भटकने के लिए छोड़ दिया था.एक आठ साल की bachi की कहानी ऐसी की दिल दहल जाए.इस मानसिक रूप से कमजोर मासूम के साथ बलात्कार हुआ था.वो कमजोर हो चुकी थी .मौत के बिलकूल करीब थी .पर प्रशासन हमेशा की तरह नियम कानून में उलझा हूया था। कहने का मतलब है औरतो को देवी कहने वाले इस देस में कबतक उन्हें ही नोचा जाएगा.दूसरी तरफ़ प्रशासन कबतक इस तरफ़ से नजरे चुराता रहेगा.कहने को तो ये रिमांड होम है जिसके नाम में मानवता है.पर हालात पूरी तरह अमानवीय है.सिंखाचो में कैद ये बेहाल जिंदगियां यही सोचती होगी की अगर यही जिन्दगी है तो जीने से बेहतर है मौत आ जाए.

vakt

वक्त माना tu अभी अच्छा नही
टूट jआऊँ साख से पत्ता नही
मान ले हिम्मत नही तुझमे अरे
कह रहा क्यों एक भी रास्ता nahi

Sunday, June 29, 2008

हम औरते


हम औरते,
खिलखिलाते बचपन से ही,
तुमसब की तथाकथित इज्जत का सलीब
अपने नरम कांधों पर ढोते-ढोते,
झुर्रिया बन जाती हैं
हम
जिनके घर से बाहर निकला एक कदम
पूरे स-मा-ज के,
पतन का कारण बन जाया करता है
हम औरतें
जिनकी सांसे,
चलती  हैं अनुमति से 
बचपन में पिता
जवानी में पति
बुढ़ापे में बेटा
देते हैं अनुमति जीने की
हमारे जीने का आधार है हमारा शील
जिसका भंग होना,
निर्मम मौत का सबब होता है
हम औरतें,
जिन्हें वो,
देवी कहकर चुप रहने को करते हैं क्रूर इशारे
ताकि उन्हें मिले आज़ादी,
ताजिंदगी
और करते रहें हम बर्दाश्त,
उनकी सारी ताड़नाएं
हम औरते,
बुनती हैं सलाईयों पर,
अपने सपने
सिलती हैं बारम्बार,
अरमानो के चीथड़े 
भींगी आँखों से पोंछती हैं तुम्हारे आँसू
पर तुम नोचते हो 
हमारा ही जिस्म
हमारी रूह
हमारा 'पूरा का पूरा' वजूद

Saturday, June 28, 2008

डोमकच

डोमकच स्त्री-पुरुष के रागात्मक संबंधों एवं सुखद दांपत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यहां न पुरुषत्व के अहं का भय होता है, न ही लज्जाशील होने की झूठी जरूरत। यहां बस औरतें होती है और होती हैं उनकी उन्मुक्तता। यहां वे खुलकर सांसें लेती हैं, हंसती हैं। गाती हैं चुहल करती हैं। वह भी बगैर पुरुषों की अनुमति के।

दरअसल ‘डोमकच’ बिहार की एक ऐसी परंपरा है जो औरतों का मनोरंजन करने के साथ उनके अंदर की कुंठा को बाहर निकाल कर उनमें नया उत्साह, आत्मविश्वास पैदा करती है। इसके माध्यम से हर पुरानी पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को दांपत्य जीवन जीने का तरीका बताती है। जबकि, इसका व्यावहारिक पक्ष यह है कि बारात में घर के सभी पुरुषों के चले जाने के बाद घर की सुरक्षा के लिए औरतों द्वारा मनोरंजन युक्त रतजगा का कार्यक्रम है- डोमकच।

यह परंपरा कितनी पुरानी है कहा नहीं जा सकता। किंतु, इसमें जिस तरह की क्रीड़ाएं की जाती हैं उससे स्वत: सिद्ध होता है कि जबसे हिंदू धर्म में ‘विवाह’ नामक संस्कार अस्तित्व में आया होगा, इस प्रथा का भी उसी समय से आरंभ हुआ होगा। विवाह-संस्कार रात में होने से वर पक्ष के घर भी रात्रि शयन अशुभ माना जाता है। रात्रि जागरण के लिए मनोरंजन जरूरी था। ‘डोमकच’ का जन्म यहीं से हुआ जो आज तक उसी पारंपरिक रूप में चला आ रहा है।

‘डोमकच’ भावी पति-पत्नी के सुखद दांपत्य की शुभकामना है। इसलिए इसमें उन सभी दृश्यों को संयोजित किया जाता है जिसे सुखद दांपत्य का पर्याय माना जाता है। इन दृश्यों के कारण ‘डोमकच’ कभी-कभी अश्लीलता की परिभाषा के दायरे में आ जाता है, किन्तु वर्तमान समय में यह सुरक्षित यौन संबंधों एवं यौनजनित बीमारियों से बचाव के लिए आवश्यक भी है। वैसे भी ‘डोमकच’ दांपत्य जीवन की सही शिक्षा के लिए जरूरी परंपरा रही है। बच्चियों से लेकर युवतियों तक को इस विषय का प्रारंभिक ज्ञान डोमकच से ही मिलता है।

बिहार जैसे राज्य में ‘डोमकच’ एक ऐसा पारंपरिक माध्यम है जो दांपत्य जीवन की शिक्षा बड़े ही दिलचस्प अंदाज में लड़कियों को देता है। किशोरी, युवती सभी बड़े चाव से इसे देखती, समझती और खुशियां बटोरती हैं। डोमकच में औरतें ही पुरुष का वेश धारण कर अभिनय करती हैं। इसकी कहानी पुरुष-स्त्री के विवाह से शुरू होकर संतान प्राप्ति के बाद सोहर एवं मंगल कामना गाने से खत्म होती है। इसे एक प्रकार की नृत्य-नाटिका कहा जा सकता है यहां गीत-नृत्य एवं प्रतीकों के सहारे दृश्यबंध बनाए जाते हैं।

‘डोमकच’ की खास बात यह है कि इसमें स्त्रियों को इतनी स्वतंत्रता रहती है कि बारात नहीं जाने वाले पुरुषों के साथ ये इतनी चुहल करती हैं कि वे भाग खड़े होते हैं। गांव में कई पुरुष बारात नहीं गया हो तो उसकी शामत आ जाती है। कभी-कभी इसकी अति भी हो जाती है, जिसके गलत परिणाम निकल आते हैं।

बहरहाल, डोमकच के बहाने ऊच-नीच के सारे भाव तिरोहित हो जाते हैं और गांव भर की औरतें डोमकच के नाम पर गांव भर से अनाज या नकद इकट्ठा करती हैं जिसका प्रसाद बनाया जाता है। यह प्रसाद वधु-आगमन के बाद सारे गांव में बांटा जाता है.

 ‘डोमकच’ आज लुप्तप्राय हो रही है। तथाकथित आधुनिकता ने इस परंपरा पर भी आघात किया है। शहरों में अब डोमकच नहीं होते हैं। क्योंकि, बारात में स्त्रियां भी जाने लगी हैं। यहां पैसे लेकर डोमकच करने वाले दल से डोमकच कराकर लोग अपनी परंपरा को निभाने की खानापूर्ति कर लेते हैं। जबकि नयी पीढ़ी इस परंपरा का नाम तक नहीं जानती। गांवों एवं कस्बों में यह परंपरा अभी भी बची हुई है, किन्तु वहां की तथाकथित उच्च तबके की औरतें स्वयं डोमकच करने में अपनी हेठी समझती हैं।  यहां भी डोमकच करने वाले दल को बुला लिया जाता है। ऐसे ही एक दल की मुखिया पार्वती कहती है कि एक दशक पहले तक डोमकच की बहुत मांग थी।
अब जैसे-जैसे टीवी, सिनेमा फेल रहा है लोग इससे अलग हट रहे हैं। आज अपनी परंपरा ‘डोमकच’ के बजाए ‘लेडीज संगीत’ कार्यक्रम किए जाते हैं। जहां फिल्मी गानों की धुन पर औरतें मटकती हैं। इससे सिर्फ मनोरंजन दिखावा बनकर रह जाता है।

 गांव के गरीब तबके में ‘डोमकच’ परंपरा आज भी प्रचलित है। इनके घरों में लोकरस की चाशनी से पगे डोमकच के गीतों को घर की औरतें जब झूम-झूम कर गाती हैं तो राहगीरों तक के पांव ठिठक जाते हैं। गीतों के साथ औरतों की ठिठोलियां ‘डोमकच’ की मस्तियों को दोगुना बना देती हैं।

परंतु गांव या शहर दोनों जगहों की नयी पीढ़ी इसे अपनाना नहीं चाहती। साक्षरता दर जितनी बढ़ रही है, अपनी परंपराओं के प्रति हमारे समाज का लगाव उतना ही घट रहा है। पढ़े-लिखे होने का मिथ्याभिमान नयी पीढ़ी को परंपराओं से विमुख कर रहा है। वे इसे अपनाने वालों को हेय दृष्टि से देखते हैं।

पाश्चात्य देशों के सांस्कृतिक आक्रमण ने टीवी चैनलों, एवं अन्य मीडिया माध्यमों से गांवों-कस्बों की परंपराओं को अक्षुण्ण् नहीं रहने दिया है। दूसरी तरफ सरकार भी इसकी अनदेखी करते हुए ग्लोबलाजेशन के सुनहरे स्वप्न में खो चुकी है। वर्तमान में जिस प्रकार बाजार-प्रेरित सभ्यता का विस्तार हो रहा है, आश्चर्य नहीं कि आनेवाले दिनों में ‘डोमकच’ जैसी परंपराएं बिल्कल भुला दी जाएं।
आज जब सेक्स एजुकेशन की इतनी चर्चा हो रही है तो जरूरी हो जाता है कि नयी पीढ़ी परंपराओं की अहमियत समझे। इससे हमारी कई समस्याओं का समाधान निकल सकता है। तब शायद सांस्कृतिक राष्ट्र भारत की विशेषता बची रह सकती है। अन्यथा, सेक्स शिक्षा के नाम पर तैयार होने वाला नई पढ़ाई का माडल मूल्यहीन समाज ही तैयार करेगा।
..............स्वयम्बरा
http://www.bhartiyapaksha.com/?p=4567

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Monday, June 23, 2008

यूँ कहिये


यूँ कहिये
कि झड़ा हुआ पत्ता हूँ मैं
साँसे,
नही देती किसी को
धूप की, तपिश में 
सूख जाती हूँ 
रेशा-रेशा होकर ,
बिखर जाती हूँ
टूटता तारा हूँ मैं
अभिशप्त होकर भी 
वरदान देती
एक बारगी चमक कर, 
राख बनकर
गिर जाती हूँ,
आसमा से
उम्मीदों के दम तोड़ने की 
आहट हूँ 
डरते हैं 
सब, मेरी छाया से
भूत बनकर पीछा कर रही हूँ
इसका, उसका,  स-ब-का
हाँ, हाँ, पगली हूँ मैं
कोई अक्स नही, पहचान नही
श्मशान की भटकती रूह बनी
चीखती-चिल्लाती 
भागती रहती हूँ
बंद 'सलाखों' के पीछे

Saturday, February 16, 2008

तुम कहा हो


क्या हुआ है पता नहीं ,

ज़िन्दगी कहाँ बही चली जा रही है पता नहीं ,

बस अब यही पता है

नहीं रही वो पहले सी दुनिया ,

नहीं है पहले से दोस्त ,

नहीं हो तुम और नहीं है हम ।