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Showing posts from 2008

एक धमाका

एक धमाका,
और बदल गया कितना कुछ
हँसते मुस्कुराते चेहरों की जगह
बिखर गए यहाँ-वहां खून से सने अंग
अब पसरा है हर ओर
सन्नाटा
जिसे तोड़ती है
दूर कही से आती, रोने की आवाजें
इस धमाके ने हमें
इस कदर किया है खौफजदा
कि डर लगता है
किसी गरीब की मैली-कुचैली पोटली से भी
जिन्हें फूटपाथ पर रख देने की
उनकी होती है मजबूरी
एक धमाके ने
जाने कितने रिश्तो में भर दिया है आतंक
कल तक,
उनकी सेवइयां और हमारे लड्डुओं में
मिठास तभी मिलती
जब ये एक-दूसरे के घरों में चले जाते
पर देखो तो
आज
उनकी परछाइयों तक से हमें डर लगने लगा है

मीडिया का महाप्रलय

विश्व विज्ञानियों का एक सामूहिक प्रयास ब्रमांड की खोज ने जहाँ पूरे विश्व को लगातार रोमांच से भरा रखा वहीं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पिछले सप्ताह भर से भोली -भाली भारतीय जनता को डराए रखा। इंदौर की एक लड़की ने तो आत्म हत्या कर ली .उन तथाकथित इलेक्ट्रोनिक मीडिया के अनुसार विज्ञानं के उक्त प्रयोग से श्रृष्टि का सर्वनाश हो जाएगा , पर हुआ कुछ नहीं.लेकिन उनकी खबरों ने तो जान तक ले ली। आख़िर कब तक मीडिया का कहर जारी रहेगा? मीडिया के तरफ़ उठी हुई उंगली एक यक्ष प्रश्न है-------.जेनेवा में विज्ञानं का प्रयोग मानव सभ्यता को विकसित करने का एक प्रयास है। प्रयोग के सप्ताह भर पहले से विश्व प्रयोग का लुत्फ़ उठा रहा था ,लेकिन भारतीयमीडिया की खबरों ने जनमानस को लगातार डराए रखा . गांव वाले तो डरकर पूजा पाठकर रहे थे .कुछ लोग अपना सारा काम छोड़ मंगलवार के दिन सपरिवार ईश्वर से लगातार प्रार्थना करते नज़र आए .सबके जेहन में मात्र एक ही बात थी कि वे लोगअब जिन्दा नहीं रहेंगे .इंडिया टीवी ,आईबीएन ७ जैसे न्यूज़ चॅनल ने तो जनता की साँस सांसत मेंडाले रखी। आम जनता की ओर से इन टीवी वालों को आगाह करना चाहूगी की अब तुम ऐसी ख…

छनिकाएं -भूख की

1
मर गई 'वह'
'भूख 'से बिलबिलाते
सोती रही 'मानवता '
2
'प्रेम' की जगह
लिख दो 'भूख '
लैला-मजनू
अब पैदा नही होते

आदमी 'भूखा 'है
वो नोचता है दूसरों को
उन्हें मार देने तक

बाढ़ की तबाही

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बिहार में बाढ़ का  तांडव  फिर से शुरू है  .बिफरी हुई  सोन नदी  अपनी सारी सीमाओं को तोड़ती हुई विनाश कर रही है.  पर इस बार ये  बाढ़ प्रकृति का प्रकोप नहीं बल्कि नहीं बल्कि मानवीय कारगुजारियो का प्रतिफल है. सोन नदी पर मध्य प्रदेश में बांध  बना है. इस पर निर्मित इन्द्र बैराज से बिहार की और पानी छोड़ा जाता है. इस बार भी ये हुआ और गरजती हुई नदी का पानी बड़ी  वेग से बिहार में प्रवेश कर गया . परिणाम ये है की बिहार के लगभग आधा दर्ज़न जिलों में बाढ़ आ चूका है. ६-७ घंटे पहले जो नदी सूखी पड़ी थी उसमे देखते ही देखते इतना पानी आ गया की कई गाँव डूब गए. ये सब इतनी जल्दी  हुआ कि किसी को सँभालने का मौका तक नहीं मिला. हालाँकि जब ये पानी बिहार में प्रवेश किया तो प्रशासन  द्वारा इसकी सूचना दी गयी पर सोन के कगार पर बसे गाँव के निवासिओं को इसपर यकीन नहीं हुआ. उन्हें अपने अनुभवों पर ज्यादा  भरोसा था. पर अब चारो और हाहाकार मचा हुआ है. इस तबाही  में हमारा भोजपुर जिला भी शामिल है. सच,  कुदरत के सामने मानव कितना बेबस हो जाता है .                ये बाढ़ हर साल हमारे लिए बर्बादी की सौगात लाता है.पर ये  तबाही बस …

दीपक, बुलंद इरादोवाला एक बच्चा

दीपक, एक ऐसा बच्चा जिसने मुझे जिन्दगी जीने कि प्रेरणा दी .कुदरत ने उसके साथ नाइंसाफी की है. वो गूंगा और बहरा है. पर उसके हौसले  हिमालय जैसे बुलंद हैं . उन दिनों मै सिविल सेवा के लिए इंटरव्यू में चयनित नही होने के कारन हताश थी. इसी समय मुझे इस मासूम के बनाये चित्रों की प्रदर्शनी में बुलाया गया. अनमने ढंग से देखने गई. दीपक और उसके बनाये चित्रों को देखकर अवाक् रह गई. हँसता-मुस्कुराता वह बच्चा कितनी आसानी से अपनी विकलांगता को ठेंगा दिखा रहा था और मै एक छोटी सी हार से हताश हो गई थी. उस बच्चे के इरादों ने मुझे फिर से लड़ने के लिए तैयार कर दिया. जैसे कि एक भयानक सपना देखकर जाग गई. घर आई तो मेरी लेखनी खुद ब खुद चल पड़ी, जिसने दीपक के ऊपर लिखी गई कविता का रूप ले लिया-

तू विधु शीतल कोमल-कोमल,
नन्हा-दीपक निर्झर झर-झर
असाधारण-अखंड -ज्योति तू जो
जलता है हरदम हर-हर पल
या की सतजुग का कोई ऋषि
उस, निराकार का अभिलाषी
या 'दिनकर' का तू 'रश्मिरथी'
संघर्षशील पुरुषार्थ वही
ना-ना तू है वो 'निराला-राम'
तम्-रावण को हरता हर कही
या जन्मा तू अवतार कोई
कहने महत्ता 'ढाई-आखर' की ,
कि मै औ&#…

दिल्ली प्रवास का पहला अनुभव

लगता नहीं,
ये जहाँ मेरा है
जलती-बुझती, चमकीली रोशनियों से
चोंधिया गई हैं मेरी आँखे
देखो न
यहाँ खो गई है आदमियत
चारों ओर है आत्मियता का अभिनय करते
रंगे -पुते चेहरे
जहाँ मेरे 'गवईपन' की मासूमियत 
'मिसफिट' पाती है ख़ुद को
बड़े शहर के 'सतरंगे सपनो' का
'यथार्थ' यही है क्या
कि मुझसे मुझी को छीन कर
बना दे एक 'विदूषक'
और मिटा दे
मुझमे बसी मिटटी की मोहक गंध

मेरी प्रेरणा

छोटे से शहर से निकलकर दिल्ली में आना और अपनी जगह बनाना कम से कम मेरे लिए एक बहुत बड़ी बात है । ऐसे में कई बार हार जाने जैसा अहसास होता है । पर हरिवंश राय बच्चन की ये पंक्तिया हमेशा मुझे हौसला देती है।मेरे जैसे और लोगो के लिए समर्पित है ये कविता.........

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्श का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती...

भूले बिसरे लोक खेल

बचपन ........मस्ती शरारतो एवं जिज्ञासाओं से भरी बेपरवाह उम्र..... ना कमाने की फिक्र होती है न ही जिन्दगी जीने की चिंता... न ही जिन्दगी की सच्चाईयों  का सामना करने की जरूरत ....अगर कुछ होता है तो सिर्फ  खेल.... खेलो की दुनिया ही बच्चो की वास्तविक दुनिया होती है....

कभी खेल प्रकृति की गोद में खेले जाते थे.... इनकी मस्ती का आलम ये था कि बच्चे बिल्कुल उन्मुक्त होकरखिलखिलाते थे.... इनमे सामान्य लोक खेलो के अलावा मौसमो के खेल भी थे....यहाँ तक कि ' चिढाना' भी एक खेल ही  होता था...जब बच्चो की भीड़ किसी चिढनेवाले बूढ़े  को देखती तो समवेत स्वर में गाने लगती...
" बुढवा  बेईमान मांगे करेला के चोखा"


गाँव में कोई नई दुल्हन आती तोपिचा-पीछे  लग जाती बच्चो की टोली ......
"ऐ कनेवा , 
दुगो धनिया द, 
लाल मरचाई के फोरन द"


किसी नंग-धरंग बच्चे  को देखा और चिढाना शुरू........
"लंगटा  बे लंगटा , 
साग रोटी खो ,
गधा  प् चढ़  के बियाह करे जो "



मौसमो के भी खेल हुआ करते थे। बरसात आई। बूंदे बरसने लगी। सूखने के लिए रखे गए उपले या कहे तो गोइठे भींगने लगे ....घर की बूढी औरते दौड़-दौड़ कर…

कब तक जारी रहेगा महिला रंगकर्मी ka sangharsh

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हम लाख आधुनिक हो जाए पर हमारी सोच सदियों पुरानीही रहेगी। अब नाटकों की बातें ही करे तो ये अक्सर होता है की जब लड़के नाटक करने के लिए हमारे पास आते हैं तो हमें इस बात की फिक्र नही होती की उन्होने अपने माता पिटा से पूछा है या नही। पर जब बात किसी लड़की की होती है तो हमारी ही सलाह होती है की पहले अभिभावक से पूछ लो। या हम ही उनसे अनुमति मांगते है।जैसे की हम kooch बहुत बुरा कर रहे है.यहाँ तक की हम अपने शहर में समाज के डर से naatak नही करना chhahte.क्योंकि जो manch हमारे लिए poojaaghar है vo हमारे शहर के लिए बरबाद होने की ख़ास जगह है। मुझे याद है vo किताब.........मुझे chhand chhahiye ।छोटे शहर की oos नायिका का sangharsh अब भी जारी है । हम जो समाज को एक दिशा देने की कोशिश में लगे रहते हैं,लोगो को ये बताने में अबतक नाकाम हैं की रंगकर्म कितना पवित्र है। इसके माध्यम से हम समाज की कुरीतियों पर आघात कर उसे नस्त कर सकते हैं। पर देखिये तो हम रंगकर्मी ही इनके किस कदर शिकार हैं.yahi है हम महिला rangkarmiyon और हमारे छोटे से शहर के रंगकर्म की बदनसीबी.जो हो पर नाटकों से hamaara lagaav अब भी badastoor जारी…

भोजपुरी चित्रकला कोहबर

बिहार की लोकचित्रकलाओं में मधुबनी पेंटिंग और इसके कलाकारों की पहचान अंतर्राष्ट्रीय जगत में है, किंतु इसी सूबे के भोजपुरी क्षेत्र की लोकचित्रकला अपना वजूद कायम रखने के लिए संघर्षरत है. आम लोग इसे कोहबर तथा पीडिया के रूप में जानते हैं, जो त्योहारों या विवाह आदि अवसरों पर घर में बनाया जाता है. इस कला से भोजपुर प्रक्षेत्र का कोई घर अनभिज्ञ नहीं, बावजूद इसके, इसने चौखट लांघकर आगे बढ़ने का साहस अभी तक नही दिखाया है. जबकि सामाजिक जीवन से जुडाव को दर्शानेवाले इन चित्रों में लोक जीवन्तता के लगभग सभी रंग दीखते हैं।

'कोहबर' भोजपुर जनपद की महिलाओं द्वारा बनाया गया एक भित्तिचित्र है, जिसे विवाह के अवसर पर  वर -वधु के कमरे में बनाया जाता है. परंपरा ये है की इसे घर की बेटियां या बहुएँ ही बनाती है . 'कोहबर' रंगने के कुछ नियम हैं ..इसे परम्परानुसार ही बनाया जाता है .....यद्यपि हमारे देश में कई जगहों पर भित्तिचित बनाये जाते है पर कोहबर में प्रयुक्त ज्यामितीय आकृतियाँ व रंग इसे  अन्य भित्ति चित्रों से अलग करते है.  जनपद में ही गंगा के उत्तरी एवं दक्षिणी हिस्से में बनाए गए कोहबर की आकृतिय…

पटना का महिला रिमांड होम

.मैं मीडिया से जूडी हूँ.हमारे पास स्टोरी आई ..पटना के महिला रिमांड होम की.वहाँ कैद औरतो की जिन्दगी सिसकीयूं में कटती है.उनके साथ जानवरों सा बर्ताव किया जाता है.जबकि उनमे से आधिकतर सिर्फ़ प्रेमविवाह कर ने के लिए बंद हैं। सलाखों में कैद ये लोग जिंदगी और अकेलेपन से जूझने को बेबस हैं.par इन्हे इनके अपनों से भी मिलने नही दिया जाता है .वहा के हालात ऐसे रूह काँप उठे।एक छोटे से कचरे से भरे कमरे में रहती हैं ये संवास्नी.चारो तरफ़ पसरी रहती है गंदगी .बात बेबात होती है मारपीट.खाने को मिलता है सदा गला खाना.वहा की अधिकतर लड़किया नंगे रहने को है मजबूर.इतने पर भी मंत्री मुस्कुराते हुए सबकुछ ठीक होने की बात करते हैं.जबकि महिला आयोग को तो कोई जानकारी ही नही. वो जांच करने की बातें करती है.वहाँ ऐसी लड़किया भी कैद है जो शारीरिक और मानसिक तौर पर अपांग हैं.जिन्हें उनके माँ बाप ने सडको पर भटकने के लिए छोड़ दिया था.एक आठ साल की bachi की कहानी ऐसी की दिल दहल जाए.इस मानसिक रूप से कमजोर मासूम के साथ बलात्कार हुआ था.वो कमजोर हो चुकी थी .मौत के बिलकूल करीब थी .पर प्रशासन हमेशा की तरह नियम कानून में उलझा हूया था। क…

vakt

वक्त माना tu अभी अच्छा नही
टूट jआऊँ साख से पत्ता नही
मान ले हिम्मत नही तुझमे अरे
कह रहा क्यों एक भी रास्ता nahi

हम औरते

हम औरते,
खिलखिलाते बचपन से ही,
तुमसब की तथाकथित इज्जत का सलीब
अपने नरम कांधों पर ढोते-ढोते,
झुर्रिया बन जाती हैं
हम
जिनके घर से बाहर निकला एक कदम
पूरे स-मा-ज के,
पतन का कारण बन जाया करता है
हम औरतें
जिनकी सांसे,
चलती  हैं अनुमति से 
बचपन में पिता
जवानी में पति
बुढ़ापे में बेटा
देते हैं अनुमति जीने की
हमारे जीने का आधार है हमारा शील
जिसका भंग होना, निर्मम मौत का सबब होता है
हम औरतें,
जिन्हें वो, देवी कहकर चुप रहने को करते हैं क्रूर इशारे
ताकि उन्हें मिले आज़ादी,
ताजिंदगी
और करते रहें हम बर्दाश्त, उनकी सारी ताड़नाएं
हम औरते,
बुनती हैं सलाईयों पर, अपने सपने
सिलती हैं बारम्बार, अरमानो के चीथड़े 
भींगी आँखों से पोंछती हैं तुम्हारे आँसू
पर तुम नोचते हो  हमारा ही जिस्म
हमारी रूह
हमारा 'पूरा का पूरा' वजूद

डोमकच

डोमकच स्त्री-पुरुष के रागात्मक संबंधों एवं सुखद दांपत्य की कलात्मक अभिव्यक्ति है। यहां न पुरुषत्व के अहं का भय होता है, न ही लज्जाशील होने की झूठी जरूरत। यहां बस औरतें होती है और होती हैं उनकी उन्मुक्तता। यहां वे खुलकर सांसें लेती हैं, हंसती हैं। गाती हैं चुहल करती हैं। वह भी बगैर पुरुषों की अनुमति के।

दरअसल ‘डोमकच’ बिहार की एक ऐसी परंपरा है जो औरतों का मनोरंजन करने के साथ उनके अंदर की कुंठा को बाहर निकाल कर उनमें नया उत्साह, आत्मविश्वास पैदा करती है। इसके माध्यम से हर पुरानी पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को दांपत्य जीवन जीने का तरीका बताती है। जबकि, इसका व्यावहारिक पक्ष यह है कि बारात में घर के सभी पुरुषों के चले जाने के बाद घर की सुरक्षा के लिए औरतों द्वारा मनोरंजन युक्त रतजगा का कार्यक्रम है- डोमकच।
यह परंपरा कितनी पुरानी है कहा नहीं जा सकता। किंतु, इसमें जिस तरह की क्रीड़ाएं की जाती हैं उससे स्वत: सिद्ध होता है कि जबसे हिंदू धर्म में ‘विवाह’ नामक संस्कार अस्तित्व में आया होगा, इस प्रथा का भी उसी समय से आरंभ हुआ होगा। विवाह-संस्कार रात में होने से वर पक्ष के घर भी रात्रि शयन अशुभ माना जाता है…

यूँ कहिये

यूँ कहिये कि झड़ा हुआ पत्ता हूँ मैं साँसे, नही देती किसी को धूप की, तपिश में  सूख जाती हूँ  रेशा-रेशा होकर , बिखर जाती हूँ टूटता तारा हूँ मैं अभिशप्त होकर भी  वरदान देती एक बारगी चमक कर,  राख बनकर गिर जाती हूँ, आसमा से उम्मीदों के दम तोड़ने की  आहट हूँ  डरते हैं  सब, मेरी छाया से भूत बनकर पीछा कर रही हूँ इसका, उसका,  स-ब-का हाँ, हाँ, पगली हूँ मैं कोई अक्स नही, पहचान नही श्मशान की भटकती रूह बनी चीखती-चिल्लाती  भागती रहती हूँ बंद 'सलाखों' के पीछे

तुम कहा हो

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क्या हुआ है पता नहीं ,
ज़िन्दगी कहाँ बही चली जा रही है पता नहीं ,
बस अब यही पता है
नहीं रही वो पहले सी दुनिया ,
नहीं है पहले से दोस्त ,
नहीं हो तुम और नहीं है हम ।