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'आल्हा'-लुप्त होती परंपरा

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हमारे शहर आरा की ह्रदय स्थली रमना मैदान में लगभग हर शाम बुलंद आवाज़ में एक लोकगीत गूंजने लगता है.....इस गीत का जादू ऐसा की देखते ही देखते चारो ओर भीड़ इकठी हो जाती है....तालियाँ बजने लगती है ....वो हुंकार भरता है -
"रन में दपक -दप बोले तलवार ,
पनपन-पनपन तीर बोलत है ,
कहकह कहे अगिनिया बाण,
कटकट मुंड गिरे धरती पर "

जोश भर देनेवाली इस गायिकी को 'आल्हा' कहते है. इसे गानेवाले गायक का नाम है 'भोला'. इस लोक गायक का 'आल्हा' जब अपने चरम पर होता है तो सुननेवाले की भुजाएं फड़कने  लगती है ...खून की गति बढ़ जाती है....देश पर बलिदान हो जाने की इच्छा बलवती हो जाती है...... कहते है की इन गीतों के नायक आल्हा और ऊदल ने अपना सर्वस्व मातृभूमि को अर्पित कर दिया . उनका प्रण था की दुश्मन के हाथ देश की एक अंगुल धरती नहीं जाने देंगे-
"एक अंगुली धरती न देहब
चाहे प्राण रहे चली जाये "

आल्हा और उदल महोबा के रहनेवाले थे. इनकी शौर्यगाथा 'आल्हा' कालिंजर के परमार राजाओं के दरबारी कवि जयनिक द्वारा लगभग सन 1250 में लिखी गयी थी.  मुख्य रूप से यह बुन्देली और अवधी का महत…