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Showing posts from June 11, 2017

पापा मेरे पापा

वो दिन गर्मियों के थे।
लू चलने लगी थी। मीठे-मीठे आम मिलने लगे थे । स्कूल की छुटियाँ हो गईं थीं। अब मेरे पास पूरा एक महीना था, धूम मचाने के लिए। खेलने के लिए। शैतानी करने के लिए।

ऐसे तो हर शाम मोहल्ले भर के बच्चों की जमघट छत पर लग जाती और खूब धमाचौकड़ी मचती। पर छुट्टियों की बात ही निराली होती है। स्कूल जाने का झंझट ही नहीं ।रूटीन लाइफ से मुक्ति।रोज-रोज की चिक-चिक से पूरी आज़ादी। अब तो बस खेल, खेल और खेल।

पर घर के बड़े हमारी इस आज़ादी से जलते थे। वो इन ख़ूबसूरत छुट्टियों में भी हमें बांधकर रखना चाहते थे।
"बाहर नहीं निकलना है।"
" लू लग जाएगी।"
"होमवर्क पूरा करो।"
"घर में ही खेलो।"
(अब घर में कोई खेलता है क्या)

वो हमें हमारी आज़ादी देना ही नहीं चाहते थे(उस वक़्त लेकर रहेंगे आजादी वाली बात प्रचलन में नहीं थी, नहीं तो हम भी आवाज़ बुलंद करते)। विशेष तौर पर पापा। उनके कोर्ट की भी छुटियाँ हो गईं थीं। वो भी घर पर ही रहते। बुलंद स्वर में आदेश जारी हुआ कि घर से बाहर (छत पर भी) शाम को ही निकलना है। दोपहर का खाना खाने के बाद एक घंटा आराम करना है।और उसके बाद पढ़ाई …

जब हमारे घर देवी माता पधारीं😃

कुछ दिनों पहले हमारे घर देवी माता आयीं थी....

उनके साथ, सहायिका माता भी थीं...जिसका परिचय वो गर्व से करा रही थीं कि बेटा हम दाई लेकर घूमते है..इसलिए भरोसा करो...साईं बाबा ने मुझे तुम्हारे लिए भेजा है..

और उसके बाद असल बात शुरू हुई- मैं माता हूँ....दान दो बेटा..... सारे सुख मिलेंगे...घर आबाद होगा... नहीं दोगी तो भस्म हो जाओगी...सब ख़त्म हो जाएगा..

हमसब ने कहा कि माताजी ऊपर अभी-अभी हमारे पालतू कुत्ते को घूमने के लिए छोड़ा गया है....खूंखार है... जाइए जल्दी, वो नीचे ही आ रहा...

और देवी माँ, अपनी सहायिका के साथ तुरंत अंतर्ध्यान हो गयी...


(एकदमे सच्ची घटना...हां माता जी को डराने के लिए कुत्ते की मनगढ़ंत बात कही और वो जादू सा असर कर गया😂😂)

मन

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बहुत रौब झाड़ता है मुझपर
दिमाग की सुनने ही नहीं देता
मन को चिनवा देती हूँ दीवारों में
उसकी बक-बक घुट जाए वहीँ पे
----स्वयंबरा

जाँता

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घर के एक हिस्से को नए सिरे से बनवाने का काम चल रहा..कबाड़ हटाए जा रहे थे कि ये मिल गये..जाँता के दो पाट....अच्छा लगा ...हालांकि पुराने जमाने में लगभग हर गृहस्थ के पास ये होते थे...

पर भोजपुर क्षेत्र में जाँता महज 'गृहस्थ जीवन का आवश्यक साधन' मात्र नहीं रहा बल्कि परदेस गए परदेसी के पीछे उसके घर-गाँव में छूटी उसकी  विरहिणी के दुःख-दर्द का सच्चा साथी भी बना रहा...उसकी पीड़ा को सुनने-समझनेवाला...उसके आंसुओं को चुपके से अपने में समाहृत कर लेने वाला...

कहते है घर के किसी अंधेरे कोने में 'जाँता' चलाते हुए विरहिणी जब विरह की वेदना को धीमे-धीमे स्वर दे रही थी, तो जतसार गीतों का जन्म हुआ...

त लीही सभे भिखारी ठाकुर के बिदेसिया से एगो जतसार-
ए सामी जी,
जवना जून भइली सुमंगली त
जननी जे भाग जागल हो राम
ए सामी जी,
घरवा-भीतरवा बइठाइ कर गईल
कवन दो मुलुकवा भागल हो राम
ए सामी जी
सुसुकि-सुसुकि लोरवा पोंछत बानी
केहू नईखे सुनत रागल हो राम
---स्वयंबरा

मुँह टेढ़े चाँद

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ये तो क्षण मात्र की ही कैद थी...
तुम कहाँ बंधनो में आनेवाले..
तो अब जाओ....
मुझे भी तुम नहीं चाहिए ....
मुंह टेढ़े चाँद😑

(एक झूठ❤☺)
--स्वयंबरा