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Showing posts from 2017

हैप्पी बर्थडे किंग खान

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शाहरुख खान से मेरा प्रेम लव ऐट फर्स्ट साइट तो बिलकुल नहीं था...डी डी एल जे देख लिया था कई और मूवी भी आई...
फिर आया मौसम 'कुछ कुछ होता है' का...

तब पटना में रहा करते थे..एक चुलबुली सी दोस्त थी सुमन ...उसने ये मूवी देख ली थी....जब हम मिले उसने एक्टिंग कर-कर के कहानी बतानी शुरू कर दी थी...

मेरे एग्जाम पास थे ...और ये मेरे लिए अति गंभीर मसला हुआ करता था...उस दौरान पूरे सन्यासी बन जाया करते...नो मूवी..नो घूमना फिरना ..नो होली..नो दिवाली...बस पढ़ाई-पढ़ाई...

तो वो बखान करती जाती और मेरा चैन छिनती जाती ....पर मूवी देखने के कई खतरे थे..पहला पहली बार अकेले सिनेमा हाल जाने का खतरा...(अब तक तो मम्मी के साथ ही देखा था),दूसरा परीक्षा के दौरान तीन-चार घंटे समय बर्बाद होने का खतरा ,....तीसरा  ऐसा कर देने पर अपने गिल्ट से जूझने का खतरा 😃😃😃..

पर अंततः मेरे दिल की जीत हुई ...सोचा चार घंटे की भरपाई नींद से करूंगी..पर मूवी तो देखनी ही है....प्लान बना...जिंदगी में पहली बार अकेले, सिर्फ हम दो यारा, पिक्चर -हाल में, मूवी देखने गए..सारे रास्ते दिल धक्-धक् करता रहा...एक तरफ थ्रिल दूसरी तरफ आशंका कि स…

अहंकार या हीन भावना

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कोई-कोई इंसान अंदर से खाली होता है या खुद में किसी चीज की कमी महसूस करता है...तो उसे उजागर होने देने से बचने के लिए एक झूठ ओढ़े रहता है ... यह आवरण ही उसके दंभी होने का आभास देता है...हालांकि वह वास्तव में अहंकारी नहीं होता बल्कि कमी के अहसास को दिखने नहीं देने के लिए एक्स्ट्रा एफर्ट करता है... तो अगली बार जब किसी अहंकारी इंसान को देंखे तो उससे सहानुभूति रखें... क्योंकि असल में तो वह हीन भावना से ग्रस्त है...

ट्रूथ या डेयर

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ट्रुथ एंड डेयर
लगभग सबने खेला होगा...
तब बचपन था और बचपना भी...
जीवन में मुद्दे ही कम थे... जो थे उनमे झूठ बोलने की गुंजाइश भी कम थी ...इसलिए ट्रुथ सुनना बेमज़ा सी बात थी...
तो चुन लिया जाता था डेयर....
देनेवाले और लेनेवाले दोनों को फिर तो खूब मज़ा आता ...
जो चाहे करवा लो बन्दे से.....करनेवाला भी थोड़े नखरे के बाद करने को तैयार....

पर अब जबकि कई अनुभवों से गुजर चुके...समय की मार भी झेल लिया...भावनाओं को नियंत्रित कर मुखौटा लगाना सीख चुके...

अब भी कोइ कहे ट्रुथ या डेयर तो शायद डेयर ही चुना जाएगा...क्योंकि आज तो हम अपनेआप से भी सच नहीं बोल पाते....

कई सच के मुंह पर पट्टी बाँध मन के तहखाने में डाल देते हैं...

आज मुद्दे भी कई हैं और झूठ बोलने की गुंजाइश भी ज्यादा है...

उम्र ने समझदार बनाया तो सबसे पहल स्वयं का सच, स्वयं से छिपाना सिखाया है...

-----स्वयंबरा

पटना का संजय गांधी जैविक उद्यान

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नाम है संजय गांधी जैविक उद्यान....
सच में ये एक वृहत बागीचा ही है...या फिर एक छोटा सा जंगल....

पटना की साँसे इसी से चलती हैं....ये न हो तो इस प्राचीन नगर का दम घुट जाएगा...पक्का..

अंदर एक चिड़ियाघर भी है, साँपघर और मछलीघर भी है.....हालांकि जहां जानवर ज्यादा हो, उसे चिड़ियाघर क्यों कहते, मेरी समझ के बाहर है....(कोई मेरे ज्ञान में वृद्धि कर दे प्लीज)

खैर, मेरी बेटू को तो मछलीघर बेहद पसंद आया...पूरे समय गाती रही-" मछली जल की रानी है, जीवन उसका पानी है..."

मैं भी देख रही थी अक्वेरियम में बंद उन मासूम सी आँखोंवालियों को... ताल, तलैया, नदी, समंदर से बिलकुल अलग है ये पानी...क्या यह  भी उनका जीवन है? ... कहाँ स्वतंत्रता की अठखेलियां....बहते चले जाने का सुख...कहा कुछ वर्गफुट में कैद , ठहरे हुए पानी में रुक जाने की मजबूरी..
(सॉरी, यह शुद्ध भावना है)

हालांकि मुझे इसकी हरियाली भा गयी...यहाँ कई प्रकार के पेड़-पौधे हैं...उन्हें पूरी तरह निरखने में घंटो लग जाएं...इसीलिये ऐसी जगहों पर अकेले जाना बेहतर या किसी ऐसे साथी के साथ जो आपकी तरह ही पक्का घुमक्कड़ हो...
(परिवार का साथ बहुत अच्छा लगता ह…

कच्ची धूप

बहुत रोई थी उस दिन घर आकर, जब जूलॉजी (इंटर) के क्लास में बेंच पर किसी ने लिख दिया था लव यु स्वयम्बरा....सहपाठियों (लड़कियों ने ही) ने दिखाया...फिर कलम से स्याही गिराकर उसे पोत दिया ताकि मेरी बदनामी(?) न हो...😂

मुझे भी लगा कि किसी ने सरे बाजार मेरी इज्जत उछाल दी...अजीब से ख्याल आने लगे थे कि पापा-मम्मी को पता चल गया तो ...मैंने तो उनका विश्वास ही खो दिया है...मानो ये कितनी भयानक गलती हो गयी हो...जबकि लिखनेवाले का पता तक नहीं था....

कुछ दिनों तक रोती रही थी...कॉलेज जाने की हिम्मत नहीं थी...असल में बहुत संकोची थी उन दिनों...एकदम शर्मीली..खुद को गलत मान लिए जाने के डर से किसी से कह भी न पाई...ऐसी ही कुछ और घटनाएं हुई...

परिणाम ये हुआ कि लड़कों से घबराने लगी.. लो सेल्फ एस्टीम की शिकार..संकोच अब अति संकोच में बदल गया...हालांकि बाद में मेरी खुद से खुद की लड़ाई शुरू हुई और स्वयं को पूरी तरह बदल दिया...

और अब, पिछले दिनों मेरी एक स्टूडेंट हाथ में एक पूर्जा लिए रोती हुई आयी...किसी ने लिख दिया था उसके नाम के साथ किसी का नाम...

मुझे सब कुछ याद आ गया....असल में इस उम्र की सबसे बड़ी परेशानी खुद को ही…

ताकि रुमानियत बची रहे

दूर से देखो चाँद कितना सुन्दर....
पास जाओ तो पर्वतों, क्रेटरों, चट्टानों से भरा
एकदम निर्जीव, एकदम निस्पंद
कि सारे अहसासों, कल्पनाओं का 'दी एन्ड' हो जाए
इसलिए कुछ दूरी जरुरी
ताकि भ्रम बना रहे
रुमानियत बनी रहे
😃😃
----स्वयंबरा

आँखें

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बहुत गहरी है आँखे
एकदम तीक्ष्ण, बेधती सी
जैसे सारे राज एकबारगी ही जान लेंगी
मन का कोना-कोना छान लेंगी
बचना चाहती हूँ अक्सर
कस कर लपेट लेती हूँ खुद को
आँखें मूँद लेती हूँ
कानों को ढांप लेती हूँ
होंठों को भींच लेती हूँ
अभिनय की चरम सीमा भी पार हो जाती है
पर मेरी सारी बेफिक्री धरी रह जाती है
सारे आवरण ग़ुम हो जाते हैं
बेबस, बेचैन सी देखती रह जाती हूँ
पल भर की बात होती है
उसकी एक नज़र
सारे राज जान लेती है
फिर वो बेहद मासूमियत से मुस्कुराता है
और हौले से पूछ बैठता है-ठीक तो हो?

---स्वयंबरा

आत्महत्या क्यूँ?

जिंदगी सबसे बड़ी चीज़ है....बाकि सब इसके बाद...
तो कोई यूँ ही नहीं आत्महत्या कर लेता...
ये बस आख़री दांव होता है ....सारे दुःखों से निजात पाने का.... उस इंसान को पलायनवादी, स्वार्थी मानकर भर्त्सना की जा सकती है पर यह सूचक है हमारे 'स्वार्थी' हुए जा रहे समाज का भी.....जो या तो अनभिज्ञ रहता है या अनदेखा करता है...कभी कभी तो क्रूर भी हो जाता है.. असल में जब जूझने की क्षमता चूक जाती है...सब कुछ नियंत्रण से बाहर हो जाता है तब इंसान ऐसा कदम उठाता है... सबकी अपनी क्षमता होती है ....सभी अपने-आप अपनी यातनाओं से उबर नहीं पाते....ऐसे लोगों को मदद की दरकार होती है.... मुझे उस इंसान से हमदर्दी है ....कि उसके आस पास कोइ भी ऐसा नहीं रहा जो उसे तनाव से बाहर निकलने में सहयोग कर सके?.... आशा साहनी फिर ये....दोनों ही अकेलेपन के कारण हुए हादसे हैं....जाने हम किस समाज का निर्माण कर रहे जहां लोग अभिशप्त है अकेले रहने को... ---swayambara

जिंदगी

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जिंदगी
मेरी यारा
न हो उदास ऐसे भी
रंग भरेंगे तुझ में भी
पल भर का इन्तजार है बस

देख न
बूंदें बरस चुकी हैं
धरा भी तृप्त हो चुकी है
खुशबु घुल रही हवाओं में
इंद्रधनुषी रंगत छा चुकी है
--स्वयंबरा

उफ़ , ये उबाऊ प्लेन यात्रा

बड़ा बोरिंग होता है प्लेन से यात्रा करना...एकदमे असामाजिक टाइप...

न चाय गरम, गरम चाय की मधुर आवाज़... न मूंगफली बेचनेवालों की पुकार...चढ़ने-उतरने की धक्कम-धक्का भी नहीं...और तो और दुनिया भर की पॉलिटिक्स पर छिड़ी 'जोरदार', 'हंगामेदार' बहस भी सुनाई नहीं देती है...😕

एकदम शांत माहौल....बनावटी.... बहुते 'सभ्य' लोग...बातें होती भी हैं तो ऐसे फुसफुसा के कि 'आएं' 'आएं' करते रहो...बइठे रहो चुपचाप, जइसे कोई 'पनिशमेंट' मिला हो...

मने कहना ये कि जब तक बहुते जरूरी न हो तब तक प्लेन से यात्रा नहींए करना है...बुझाया कि नहीं...😉😉😉😉😉😉😉😉
(आत्मालाप)

उपनिवेशवाद के दौर में भारतीय क्रिकेट

क्रिकेट इतना नहीं पसंद कि बेचैन रहूँ देखने के लिए...पर इसके बारे में जानना रुचिकर लगा कि कोलोनाईजेशन के दौर में यह जेंटलमैन गेम आखिर इंग्लैण्ड से भारत कैसे आया...कैसे इसका विकास हुआ..

इंग्लैंड, जहां क्रिकेट का जन्म हुआ, वहाँ ये वर्गीय विभेद का बड़ा उदाहरण था...उच्च आय वर्ग वाले शौक के लिए इसे खेलते इसलिए वो बैट्समैन होते...निम्न आयवर्ग वाले पैसे के लिए खेलते इसलिए बॉलर थे...और एक बॉलर कभी कैप्टेन नहीं बन सकता था...शायद इसलिए शुरुआती नियम अधिकतर बैट्समैन के पक्ष में ही बने थे...

ब्रिटिशों ने भारतीयों को असभ्य, जंगली ही माना था...उन्होंने कभी सोचा भी नहीं कि भारतीय इसे खेल पाएंगे...पर ऐसा हुआ नहीं..भारतीयो में पारसी समुदाय ने क्रिकेट खेलने की शुरुआत की...बाद के एक टूर्नामेंट में इनलोगों ने अंग्रेजों के जिमखाना क्लब को हरा दिया...ये एक बड़ी बात थी..

अंग्रेजों ने इस खेल को भी फूट डालने के लिए इस्तेमाल किया और हिन्दू, इस्लाम, पारसी आदि धर्मों  के आधार पर क्रिकेट क्लब बनाने पर जोर दिया....

आज की रणजी ट्रॉफी की तरह एक टूर्नामेंट आज़ादी से पहले भी हुआ करता था पर उसमे धार्मिक आधार पर बने क्लब भा…
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बढ़ चले हैं
रुकेंगे नहीं कभी
साथ दो, न दो
--स्वयंबरा

शिकार

दिल्ली के लगभग हर मोहल्ले घर में कबूतरों का बसेरा है ....आज बालकनी में खड़ी थी.. कबूतरों के झुण्ड पास वाले कई छतों पर बैठे थे.. कुछ इधर-इधर मंडरा रहे थे ...कुछ दाने चुग रहे थे...कुछ आपस में खेल रहे थे....सब खुशनुमा था....

अचानक एक बाज आसमान से नीचे की ओर झपटा .....कबूतरों का झुण्ड फड़फड़ा उठा... जान बचाने के लिए सब इधर-उधर उड़ गए ....वो बाज जिधर को उड़ान भरता कबूतरों के फड़फड़ाते पंखो की आवाज गूंजने लगती ....

शिकार - शिकारी का खेल कुछ देर चलता रहा....और कुछ सेकेण्ड बाद ही एक कबूतर उसके पंजे में नज़र आया....फिर वो बाज़ दूर बहुत दूर उड़ता गया....कबूतरों के झुण्ड वापस अपनी-अपनी जगह बैठ गए ....यहां वहाँ फुदकने लगे...गुटरगूं की आवाज़े आनी शुरू हो गयी

पापा मेरे पापा

वो दिन गर्मियों के थे।
लू चलने लगी थी। मीठे-मीठे आम मिलने लगे थे । स्कूल की छुटियाँ हो गईं थीं। अब मेरे पास पूरा एक महीना था, धूम मचाने के लिए। खेलने के लिए। शैतानी करने के लिए।

ऐसे तो हर शाम मोहल्ले भर के बच्चों की जमघट छत पर लग जाती और खूब धमाचौकड़ी मचती। पर छुट्टियों की बात ही निराली होती है। स्कूल जाने का झंझट ही नहीं ।रूटीन लाइफ से मुक्ति।रोज-रोज की चिक-चिक से पूरी आज़ादी। अब तो बस खेल, खेल और खेल।

पर घर के बड़े हमारी इस आज़ादी से जलते थे। वो इन ख़ूबसूरत छुट्टियों में भी हमें बांधकर रखना चाहते थे।
"बाहर नहीं निकलना है।"
" लू लग जाएगी।"
"होमवर्क पूरा करो।"
"घर में ही खेलो।"
(अब घर में कोई खेलता है क्या)

वो हमें हमारी आज़ादी देना ही नहीं चाहते थे(उस वक़्त लेकर रहेंगे आजादी वाली बात प्रचलन में नहीं थी, नहीं तो हम भी आवाज़ बुलंद करते)। विशेष तौर पर पापा। उनके कोर्ट की भी छुटियाँ हो गईं थीं। वो भी घर पर ही रहते। बुलंद स्वर में आदेश जारी हुआ कि घर से बाहर (छत पर भी) शाम को ही निकलना है। दोपहर का खाना खाने के बाद एक घंटा आराम करना है।और उसके बाद पढ़ाई …

जब हमारे घर देवी माता पधारीं😃

कुछ दिनों पहले हमारे घर देवी माता आयीं थी....

उनके साथ, सहायिका माता भी थीं...जिसका परिचय वो गर्व से करा रही थीं कि बेटा हम दाई लेकर घूमते है..इसलिए भरोसा करो...साईं बाबा ने मुझे तुम्हारे लिए भेजा है..

और उसके बाद असल बात शुरू हुई- मैं माता हूँ....दान दो बेटा..... सारे सुख मिलेंगे...घर आबाद होगा... नहीं दोगी तो भस्म हो जाओगी...सब ख़त्म हो जाएगा..

हमसब ने कहा कि माताजी ऊपर अभी-अभी हमारे पालतू कुत्ते को घूमने के लिए छोड़ा गया है....खूंखार है... जाइए जल्दी, वो नीचे ही आ रहा...

और देवी माँ, अपनी सहायिका के साथ तुरंत अंतर्ध्यान हो गयी...


(एकदमे सच्ची घटना...हां माता जी को डराने के लिए कुत्ते की मनगढ़ंत बात कही और वो जादू सा असर कर गया😂😂)

मन

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बहुत रौब झाड़ता है मुझपर
दिमाग की सुनने ही नहीं देता
मन को चिनवा देती हूँ दीवारों में
उसकी बक-बक घुट जाए वहीँ पे
----स्वयंबरा

जाँता

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घर के एक हिस्से को नए सिरे से बनवाने का काम चल रहा..कबाड़ हटाए जा रहे थे कि ये मिल गये..जाँता के दो पाट....अच्छा लगा ...हालांकि पुराने जमाने में लगभग हर गृहस्थ के पास ये होते थे...

पर भोजपुर क्षेत्र में जाँता महज 'गृहस्थ जीवन का आवश्यक साधन' मात्र नहीं रहा बल्कि परदेस गए परदेसी के पीछे उसके घर-गाँव में छूटी उसकी  विरहिणी के दुःख-दर्द का सच्चा साथी भी बना रहा...उसकी पीड़ा को सुनने-समझनेवाला...उसके आंसुओं को चुपके से अपने में समाहृत कर लेने वाला...

कहते है घर के किसी अंधेरे कोने में 'जाँता' चलाते हुए विरहिणी जब विरह की वेदना को धीमे-धीमे स्वर दे रही थी, तो जतसार गीतों का जन्म हुआ...

त लीही सभे भिखारी ठाकुर के बिदेसिया से एगो जतसार-
ए सामी जी,
जवना जून भइली सुमंगली त
जननी जे भाग जागल हो राम
ए सामी जी,
घरवा-भीतरवा बइठाइ कर गईल
कवन दो मुलुकवा भागल हो राम
ए सामी जी
सुसुकि-सुसुकि लोरवा पोंछत बानी
केहू नईखे सुनत रागल हो राम
---स्वयंबरा

मुँह टेढ़े चाँद

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ये तो क्षण मात्र की ही कैद थी...
तुम कहाँ बंधनो में आनेवाले..
तो अब जाओ....
मुझे भी तुम नहीं चाहिए ....
मुंह टेढ़े चाँद😑

(एक झूठ❤☺)
--स्वयंबरा

अबोला

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कहाँ सोचा था
कि हमारे बीच का 'अबोला,'
इतने शब्द, इतनी ध्वनिया छोड़ जायेगा
कि बदहवास-सी दौडती फिरुंगी
उन्हें आँचल में समेट लेने को
---स्वयंबरा

बोलो न माँ

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उन्होंने कहा कि मृत्यु का शोक एक साल तक मनाया जाता है...कोई मांगलिक कार्य नहीं...
पर हमारा दुःख तो जीवन भर का ठहरा.. फिर ?

तय किया कि इसे उत्सव की तरह मनाएंगे....दुःख का उत्सव ...शोक का उत्सव...

तो गीत सुना, गुनगुनाया भी, यायावरी की, बगिया सजाया भी, पेड़-पौधों, चिड़ियों से बातें की...और जब-जब तुम्हारी याद आयी न, बच्चों को गले लगाया भी...

खूब-खूब प्यार भर लिया है मन में..

और तुम्हारे जाने के बाद के छः महीने निकाल ही लिए ...हँसते हँसते...तुम खुश हो न ..अब बोलो भी
--स्वयंबरा

पीड़ा

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यहाँ-वहाँ बिखरे हर्फों को जोड़ दूं...
तो एक मुकम्मल वाक्य बन ही जाएगा
फिर तो तुम पकडे जाओगे ...
पर नहीं करती कोशिश
कि जो कह न सको उसे समझ ही क्यों लूं....
जो बता न सको उसे मान ही क्यूँ लूं
जाओ,
नहीं सुनती तुम्हारे अबोले को
नहीं पढ़ती तुम्हारी खामोशी
कि समझ कर भी ना समझने की टीस
नकारे जाने की पीड़ा से
कम ही दुःखती है यारा
----स्वयंबरा

रेखाएं

माँ कहती थीं
कि कम रेखाओं वाले हाथ सौभाग्य लाते हैं.....
कुछ दिन हुए, नहीं रहीं वो ..
और आजकल
मेरी हथेलियों पर ढेर सारी लकीरें उग आयीं हैं..
-स्वयंबरा

आवारगी

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परिंदों का उड़ना
महज अपने आकाश को पाना नहीं होता
वो फड़फड़ाते है पंख
लगाते हैं गोल-गोल चक्कर
कि कभी-कभी
बिलावजह की आवारगी भी
जरुरी है यारा
----स्वयंबरा

शोर

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नींद नहीं आती अक्सर
अनंत आवाजों ने
मन की परतों के भीतर
डेरा जमा लिया है
ये अपनी ही सुनाए जातीं हैं
और सारी रात आँखों में कट जाती है
खीझ उठती हूँ ..झल्लाती हूँ..
फटकार भी लगाती हूँ
सब व्यर्थ
पर कल खूब गहरी नींद आयी
जेनरेटर के गड़ गड़
लाउडस्पीकर के बेसुरे कंठस्वर
पटाखों के धमाकों
लोगों के कहकहों के बीच
बेसुध सो गयी
पूरे सात घंटे सोयी रही
आज जाना मैंने
कि 'भीतर के शोर' से बचने के लिए
बाहर,'शोर' का होना जरुरी है यारा
---स्वयंबरा

अकेलेपन का मान

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अकेले रहना किसे पसंद
पर जब मज़बूरी ही हो
कि कोई साथ न हो
तो 'एकांत' खुद की तलाश है - कह देना
और अपने एकाकीपन को
उनकी 'सहानुभूति' में बदल जाने से रोक लेना जरुरी होता है
कि अकेलेपन का भी तो 'मान' होता है यारा
-----स्वयंबरा

ओ सूरज

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सूरज...
प्रखर ...तेजस्वी...
इसके बिना जीवन नहीं..
पर कितना अकेला...
अक्सर जी चाहता है कि माथा सहला दूँ.... पूछ ही लूँ - कैसे हो भाई? ठीक ठाक न? खाना वाना हुआ? सोए भी थे या रात भर भटकते रहे?
😊😊

बातें लोगों की

विवाहितों के कन्धों पर ही जिम्मेदारी का बोझ होता है ...कर्तव्य-निर्वहन भी वही करते हैं...बंधे होते हैं...पहले दूसरों की सोचते फिर अपने बारे में ....(उफ़ ये महान लोग)

जबकि अविवाहित तो आज़ाद, जिम्मेदारियों से मुक्त, अपने मन की ही करनेवाले होते हैं...उन्हें किसी की परवाह कहाँ...और परिवार तो पति- पत्नी और बच्चों से ही बनता है तो इस लिहाज से अविवाहितों का तो परिवार ही नहीं तो जिम्मेदारी भी कहाँ..(एकदम उदंड लोग
.....स्वयंबरा

माँ

देखो न
आज तुम्हारी सिलाई मशीन निकाल लिया
सोच रही बेटू के लिए कुछ खिलौने बना दूं
गुड़िया, हाथी, घोड़े से बचपन सजा दूं
××××
सुनो तो
चिड़ियों का दाना-पानी रोज रख आती हूँ
आजकल मैं भी पेड़ पौधों से बतियाती हूँ
तुम्हारी किटी अब भी शैतानी करती है
उसको जोर से फटकार भी लगाती हूँ
××××
अब तो
आती जा रही हो तुम दिनों दिन मेरे अंदर
और एक दिन 'मैं ' पूरी 'तुम' बन जाऊँगी
फिर चली आऊँगी तुम्हारे पास हमेशा के लिए
तुम सोना, मैं लोरी सुनाऊँगी
----स्वयंबरा