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Showing posts from January 20, 2013

ये कैसी शिक्षा व्यवस्था ??

जब छोटी थी तब 'माँ ' अक्सर अपने बचपन की कहानी सुनाया करती ...वो बताती कि प्राईमरी स्कूल में उन्हें 'बोरा' (थैलियाँ जिनमे अनाज रखे जाते है ) लेकर जाना पड़ता था ...असल में उनमें बेंच नहीं थे ...ऐसे में 'बोरा' बैठने के काम आया करता....इन किस्सों को सुनकर मैं हैरान हो जाती ..क्योंकि मेरे लिए ये अनोखी बात थी...स्कूल, वो भी बिना बेंच के !! ...और पढाई बोरा पर बैठकर ??....अपनी माँ पर तरस आता, बुरा भी लगता और स्कूल की व्यवस्था पर हंसी भी आती ..कभी -कभी माँ मुझे डांटते हुए बोलती कि पढ़ोगी नहीं तो बोरा वाले स्कूल में नामांकन करा देंगे ...तब बहुत डर लगता ..हालाँकि उम्मीद नहीं थी कि ऐसा स्कूल अब भी होता होगा....

खैर... 'बाल महोत्सव' का आयोज़न के दौरान गांवों के स्कूलों के बारे में जाने-समझने का मौका मिला...शिक्षको और अभिभावकों से सुनने को मिला कि शिक्षा प्रणाली में घुन लग चूका है....कि शिक्षा पर सबसे ज्यादा खर्च किया जा रहा है, पर 'वहीँ ' सबसे ज्यादा लूट है..कि शिक्षक नियुक्ति में सबसे ज्यादा धांधली हुई है ... कि विद्या के घर में विद्या छोड़कर बाकि सबका बसेरा…

एक थी मुस्कान

एक थी मुस्कान (बदला हुआ नाम )....इंटर की छात्रा ....गडहनी ( भोजपुर, बिहार का ग्रामीण क्षेत्र) की निवासी....उसने भी अपनी अस्मिता को बचाने के लिए संघर्ष किया था ....यही नहीं उसने उन युवकों के विरुद्ध प्राथमिकी भी दर्ज कराई क्यूंकि उसे देश के कानून पर आस्था थी .....

बस, इसी एक कदम ने उसके जीवन को इतना यातनामय बना दिया की अंततः मुस्कान ने मौत को गले लगा लिया ...जैसे की एक 'अपराध' को सहन ना करके उसके खिलाफ आवाज़ उठाना एक 'पाप' हो ....उसे घर में बंद करने का फरमान जारी हुआ...बदचलन होने का प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया...माता-पिता सभी अपनी इज्ज़त की दुहाई देने लगे और उसे मुंह बंद रखने का आदेश सुना दिया ...मुस्कान इनसे जूझ नहीं सकी और ज़हर खा लिया .....हद तो यह की मर जाने के बाद भी उसे चैन से रहने नहीं दिया गया...लोगों ने मुस्कान को पागल घोषित कर दिया और सारा मामला रफा-दफा हो गया .....

ये उसी वक़्त की घटना है जब सब सड़ी हुई मानसिकता और व्यवस्था के खिलाफ आन्दोलनरत थे...वी वांट जस्टिस, वी वांट जस्टिस चिल्लाये जा रहे थे ...जबकि मुस्कान अकेले 'न्याय' पाने की लडाई लड़ रही थी.…