मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Saturday, October 11, 2008

एक धमाका


एक धमाका,
और बदल गया कितना कुछ
हँसते मुस्कुराते चेहरों की जगह
बिखर गए यहाँ-वहां खून से सने अंग
अब पसरा है हर ओर
सन्नाटा
जिसे तोड़ती है
दूर कही से आती, रोने की आवाजें
इस धमाके ने हमें
इस कदर किया है खौफजदा
कि डर लगता है
किसी गरीब की मैली-कुचैली पोटली से भी
जिन्हें फूटपाथ पर रख देने की
उनकी होती है मजबूरी
एक धमाके ने
जाने कितने रिश्तो में भर दिया है आतंक
कल तक,
उनकी सेवइयां और हमारे लड्डुओं में
मिठास तभी मिलती
जब ये एक-दूसरे के घरों में चले जाते
पर देखो तो
आज
उनकी परछाइयों तक से हमें डर लगने लगा है

2 Comments:

At October 13, 2008 at 3:02 AM , Blogger Bandmru said...

कल तक उनकी सेवइयां और हमारे लड्डूमें

मिठास तभी मिलती

जब ये एक दूसरे के घरों में चले जाते

पर देखो तो

आज उनकी परछाइयों तक से हमें डर लगने लगा है

sahi likha hai aap ne bahut khub. kafi dino baad aai hain.....khair darshan to hua aapka.......

 
At October 20, 2008 at 4:18 AM , Blogger मीत said...

acha likha hai...
isi tarah ka ek dhamaka mujhse bhi kuch cheen le gaya...

 

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