मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Friday, November 18, 2011

डोली में बिठाई के कहार


हुनहुना रे हुनहुना, हुनहुना रे हुनहुना का समवेत स्वर ...........लाल जोड़े में शरमाई सकुचाई सी दुल्हन .......और डोली...... कैसा रूमानी सा दृश्य लगता है. है न!!!! डोली और दुल्हन........इनके बीच का नाता इतना गहरा है की एक का नाम लेते ही दूसरे का चित्र आँखों के सामने खिंच जाता है. कहारों के ललकारे व मधुर गीत, कंधे पर डोली और डोली में बैठी दुल्हन, जैसे किसी दूसरी दुनिया में ही ले जाते है ....... सपनो की दुनिया ........जिसे कभी हमने यथार्थ में भी देखा था. 

 मुझे याद है बचपन के वो दिन जब किसी के घर शादी होती तो बारात लगने और बिदाई होने का हम घंटों इंतजार किया करते थे ताकि डोलियों पर लुटाये जानेवाले पैसे हम लूट सकें. डोली हमारी समस्त उत्सुकता का केंद्रबिंदु होता था. उसमे बैठे दूल्हा और दुल्हन को पहले देख लेने की होड़ लगी रहती थी. डोलियों के पीछे दौड़ना हमारा प्रिये शगल था. वो वक़्त था कि दूल्हा अपनी दुल्हन से शादी करने डोली में बैठ कर ही जाता था और उसे डोली में बिठाकर घर लाता था. कई किलोमीटर की ये यात्रा कहारों के गीत, कहानियां और ललकारों से पल भर में कट जाती थी. शादी की कई परंपरा डोलियों से जुडी होती थी.

किन्तु आज इन डोलियों के दर्शन गाँव में भी यदा- कदा ही होते है. आधुनिकता के भंवर में परम्पराए लुप्त हो रही है . डोली उठाने का काम करनेवाले कहारों की मांग की कमी का असर इनलोगों पर प्रत्यछ रूप से पड़ा है. ये लोग या तो इसे बनाये रखने की कोशिश में उचित जीवन स्तर को तरसते है या इस काम को छोड़कर नयी दिशा में मुड़ जाते है. महंगाई की मार ने भी कहारों को इससे विमुख किया है. शादी का लगन कुछ महीने ही रहता है ऐसे में जीविकोपार्जन मुश्किल हो जाता है. आज कही डोलियाँ नहीं दिखती. परंपरा निर्वाह के लिए कार को ही धक्का देकर डोली को कन्धा देने का संतोष पा लिया जाता है.

 हालाँकि गाँव में कही कही इसका पालन किया जाता है ...वहा कहारों को बाकायदा न्योता दिया जाता है...उन्हें नए कपडे, पगड़ी, गमछा और रुपये दिए जाते है. स्थिति चाहे जैसी भी हो पर डोलियाँ हमारे मन: मस्तिक्स में इस कदर बस चुकी है हम किसी न किसी रूप में इसका प्रयोग करते है. शादी के कार्ड पर डोली में बैठी दुल्हन का चित्र छपा होता है. सिनेमा के असंख्य गीतों के दृश्य रचना में इसका प्रयोग होता है. कहारों द्वारा गए गए गीत एक विशेष धून पर आधारित होते है जिसे कितने ही फिल्मों के गीतों में इस्तेमाल किया गया. बहरहाल डोलिओं का लुप्त होना प्रकारांतर से हमारी संस्कृति के एक अंश का अतीत बन जाना है. अब तो लगता है की एक खूबसूरत परंपरा इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी.

[ललकारा : हौसला बढ़ाने के लिए कहारों द्वारा बोले जाते समवेत स्वर]
swayambara buxi

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

Links to this post:

Create a Link

<< Home