मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Saturday, February 18, 2012

कहा गए ये बहुरूपिये ??

बहुरुपिया!! याद आया??? यही मौसम हुआ करता था न! फाग का!...आते-जाते विभिन्न रास्तों पर तरह-तरह का स्वांग रचे बहुरूपिये नज़र आते थे .. फाग की मस्ती इनके कारण दोगुनी हो जाया करती थी ... होली के दिन गाँव-कस्बों में निकलनेवाले गोला(टोली) में एक बहुरूपिये का होना जरूरी होता था.. बुजुर्गों से सुना कि तब इनकी विशेष मांग थी..लोग इनकी कलाकारी पर चर्चाएँ करते और इन्हें इनाम भी देते थे .... इनकी रूपसज्जा ऐसी की आज के मेकअप आर्टिस्ट भी मात खा जाये...कभी हनुमान बनते तो लोग चढ़ावा चढाने लगते...राक्षस बनते तो लोग डरकर दूर भागने लगते...कभी-कभी पेट में तलवार घुसेड़े होने का स्वांग करके लोगो का मनोरंजन करते...मेरी माँ बताती है कि एक बार बहुरुपिया पोस्टमैन बनकर आ गया..मम्मी ने सोचा नाना की चिट्टी है..वो दौड़ी-दौड़ी आयी....कुछ देर अभिनय के बाद वह हसने लगा तबतक बाबा भी आ गए वो भी हसने लगे ....

बहुरूपिये हम बच्चों की भी उत्सुकता का केंद्रबिंदु होते थे...हम कभी खुश होते तो कभी घबराते ...इनके पास जाकर इन्हें छूकर देखते थे ...विद्वानों कि राय है कि बहुरुपिया मुग़ल दरबार का विशेष आकर्षण होते थे...मध्यकाल में बहुरुपिया एक व्यवसाय बन गया ... बिहार हिंदी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित, श्री महेश कुमार सिन्हा द्वारा लिखित किताब "बिहार की नाटकीय लोक विधाएं" में इस विधा को 'लोक नाटक' माना गया है, जो आदिवासी क्षेत्रों में भी किया जाता है . कुछ साल पहले तक ये काफी प्रचलित था..होली,दशहरा आदि अवसर पर ये विभिन्न स्वांग भरकर लोगों का मनोरंजन करते थे ...घर-घर, दरवाज़े-दरवाज़े जाते ...घर का आँगन, चौपाल, नुक्कड़, दरवाज़ उनका मंच होता...इनका अभिनय और प्रदर्शन एक स्थान पर रुक कर देर तक नहीं होता बल्कि इनकी यात्रा जारी रहती , साथ-साथ अभिनय और प्रदर्शन भी चलता रहता ... 

बहुरूपिये कभी लैला-मजनू तो कभी सन्यासी, पागल, शैतान, भगवान शंकर, डाकू, नारद और मुनीम जैसे तमाम किरदारो को निभाते .... ये इन्हें इस कदर पेश करते हैं कि एक बारगी लोग उन्हे वास्तविक समझ बैठते थे.... कई ऐसे बहुरूपिये भी रहे जो अपनी कलाकारी में इतने तल्लीन हो गए कि अपना मूल रूप, पहचान ही भूल गए...कृत्रिम रूप ही वास्तविक बन गया... 

पर आज दो जून की रोटी भी इन्हें दूभर है. दूसरों के होठो पर मुस्कुराहटें लानेवाले बहुरूपियों की जिंदगी तल्ख़ है.... उचित मेहनताना व सम्मान के अभाव से उपजी हताशा ने इन्हें इस पेशे से विमुख कर दिया है...वर्तमान दौर में मनोरंजन के  इतने स्रोत मौजूद है कि मात्र इस कला से पेट पालन नामुमकिन सा हो गया है .... आज ये कलाकार उपहास  के पात्र बन चुके है .... बहुरूपिये बच्चों में बहुत लोकप्रिय होते थे, किन्तु आज के बच्चे बहुरुपिया के बारे में जानते तक नहीं ..लोगो का नजरिया भी इसके प्रति बदल चूका है ..संरक्षण नहीं मिलने से ये भी अन्य परम्पराओं की तरह लुप्तप्राय हो रहा है.....पुश्तैनी धंधा वाले परिवारों में बच्चे इसे अपनाने में शर्म महसूस करते है...आज बहुरूपिये कभी-कभी ही किसी गाँव में दीखते है ....कई साल हो गए इन्हें देखे...अब तो एक सपना सा लगता है .....क्या आपको याद है ये बहुरूपिये ?? इनका स्वांग?? इनसे मिलने वाली ख़ुशी ?? कहा गए ये बहुरूपिये ?? 

http://www.bhaskar.com/article/BIH-where-are-the-freaking-2885640.html

4 Comments:

At February 19, 2012 at 3:56 AM , Blogger उपासना सियाग said...

हाँ मुझे याद है वो अभी भी.............!! पहले देख कर खुश होती थी की देखो कैसे रोज -रोज़ नित नए स्वांग धरते है ,पर अब उनकी आँखों के पीछे झांकती मजबूरी भी दिखती है तो अफ़सोस होता है की आज टी वी ,सिनेमा और नेट के ज़माने में इनका तमाशा कौन देखता है

 
At February 19, 2012 at 3:56 AM , Blogger उपासना सियाग said...

हाँ मुझे याद है वो अभी भी.............!! पहले देख कर खुश होती थी की देखो कैसे रोज -रोज़ नित नए स्वांग धरते है ,पर अब उनकी आँखों के पीछे झांकती मजबूरी भी दिखती है तो अफ़सोस होता है की आज टी वी ,सिनेमा और नेट के ज़माने में इनका तमाशा कौन देखता है

 
At February 22, 2012 at 9:55 PM , Blogger पूर्णिमा वर्मन said...

बहुत अच्छा विषय उठाया है और अच्छा लिखा है।

 
At March 15, 2012 at 3:06 AM , Blogger hum tum said...

shukriya upasana siag jee, purnima verman jee...:) :) :)

 

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