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Thursday, October 18, 2012

एक उपेक्षित धरोहर !

आरा हाऊस( वीर कुंवर सिंह संग्रहालय), आरा, बिहार 
 कुछ  इमारतें जन क्रांति की मौन गवाह होती हैं. इतिहास का एक पूरा अध्याय इनमे अंकित होता है . ऐसा ही एक भवन है हमारे शहर 'आरा' के 'महाराजा महाविद्यालय' के प्रांगण में स्थित 'आरा हाऊस', जिसका वर्तमान नाम 'वीर कुंवर सिंह संग्रहालय 'है . यह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में देशवासियों के बलिदान का प्रतीक है .


आरा हाऊस के बारे में विस्तृत जानकारी भले ही बहुत बाद में मिली पर इस से  जान-पहचान थोड़ी पुरानी है.. असल में बचपन में अपने बाबा की उँगलियों को पकड़कर  शहर के कई स्थलों को देखा ... जाना. बाबा जहा भी ले जाते,  उसके बारे में अत्यंत विस्तार से बताते. शायद इसलिए बहुत सारी जानकारियाँ मुझे यु ही हो गयी जिसके लिए लोग किताबें  पढ़ते है .  'आरा हाऊस' भी उनमे से एक था. यह भवन इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है  क्यूंकि हमारे क्षेत्र में लगभग 'किवदंती' बन चुके 'कुंवर सिंह' का नाम इससे जुड़ा था . वैसे भी कॉलेज, घर के ठीक पीछे स्थित है तो जाना भी आसान था..बाबा वहा ले जाते और 'कुंवर सिंह' की कहानियां सुनाते.  हालाँकि उस वक़्त कहानियों से ज्यादा दिलचस्पी भवन के आधार पर बनी 'अर्धचन्द्राकार खिडकियों ' में होती...लोगो का कहना था कि वो 'सुरंगों' की है...ये सुरंगे आरा से जगदीशपुर जाती है...ये इतनी बड़ी हैं कि कुंवर सिंह घोड़े पर बैठकर सुरंग पार कर जाते थे  ...मैं बड़ी उत्सुकता से उन्हें देखती और सोचती कि कैसे उनके अन्दर जाया जाये...पर कोई लाभ नहीं था क्यूंकि इमारत हमेशा बंद रहती...

इंटर में उसी कोलेज  में नामांकन हुआ ...लड़कियों का कॉमन रूम वही 'आरा हाऊस' था ...लेकिन उस भवन कि महत्ता के बारे में तब भी उतना ही जाना जो 'बाबा' ने बताया था....हाल के बाहर एक शिलापट्ट लगा था, पर उसपर कभी ध्यान नहीं दिया . उस समय भवन भी अत्यंत जर्ज़र हो चूका था...प्लास्टर उखड चुके थे... छत कभी भी गिर सकती थी...आस-पास झाड़-झंखाड़ उग चुके थे ....कॉमन रूम वहा से हटा दिया गया...पता चला कि वह भवन गिराया जायेगा ...कभी-कभी थोडा अजीब लगता ...फिर  अपनी जिन्दगी में मगन हो जाते...

लार्ड कर्ज़न का शिलापट्ट
बी. एस. सी. करने के दौरान एक बार घूमते हुए उस भवन में चली गयी ...वहा शिलापट्ट देखा ..समय काटने के लिए उसे पढने लगी ..पढ़ के हैरान रह गयी ...वह ब्रिटिश भारत के वायसराय लार्ड कर्ज़न का था...इसे 1903 में लगाया गया था...इसपर 1857  की घटना का जिक्र था... लिखा था कि  -
 "............this building was the scene of the memorable defence of Ara by a party consisting......................................This tablet is placed by Lord Curzon, viceroy and governor general of India in 1903." अब मुझे लग चूका था  कि यह भवन वाकई ऐतिहासिक महत्व  का है ...जिसकी दीवारों पर बलिदानियों की गाथा अंकित है... 

वर्ष 1857  में देश भर में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ बुलंद हुई थी. शाहाबाद ( वर्तमान भोजपुर, रोहतास, बक्सर, कैमूर ) क्षेत्र से एक अस्सी साल के युवा ने क्रांति का बिगुल फूंका...यह वीर थे जगदीशपुर के जमींदार 'कुंवर सिंह'. इनकी ललकार पर क्षेत्र की जनता भी आन्दोलन में कूद पड़ी . क्रांति की आग दानापुर छावनी तक पहुंची . वहां के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया. वे आरा आये . यहाँ के निवासियों के साथ मिलकर 'आरा हाऊस ' में अंग्रेजों को बंदी बना लिया . यह घेराबंदी कई दिनों तक चली . ब्रिटिश सरकार ने 'कर्नल आयर' को इन्हें छुड़ाने के लिए भेजा. 3 अगस्त, 1857 को आयर और आन्दोलनकारियों के बीच मुकाबला हुआ. विद्रोही बहुत बहादुरी से लड़े,  साधनों के अभाव में हार गए . इस घटना ने देशभर में खलबली मचा दी . आधुनिक अस्त्रों  के बलपर भले ही आन्दोलनकारियों को दबा दिया गया, पर स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में यह घटना अमर  हो गयी .
आरा हाऊस, बाहर से

इस भवन का निर्माण ब्रिटिशों के रेलवे इंजीनियर श्री वईकर्स  व्यायल ने करवाया था, जहा अँगरेज़ अपने मनोरंज़न के लिए जाया करते थे . भवन दो मंजिला है. एक बड़ा हाल  व् दो छोटे कमरे है. चारो और हवादार बरामदा भी है. नीचे शायद तहखाना है (जैसा मुझे लगा ) . पास ही एक कुए का अवशेष है...इतिहास की माने तो ये वह कुआ  है जिसे घेराबंदी के दौरान ब्रिटिशों ने खोदा था. पूरा भवन देखने में अत्यंत मामूली सा लगता है पर जैसे ही इसका जुडाव 1857 की क्रांति से होता है,  वीरों की हुंकार सुनाई पड़ने लगती है . विद्रोह का पूरा दृश्य एकबारगी आँखों के सामने से गुजरने लगता है. यह वो जगह है जिसने इतिहास में 'आरा' के नाम को सुनहरे अक्षरों में अंकित कर दिया. 

कॉलेज से निकलने के बाद भी इस भवन के प्रति लगाव बना रहा, इसलिए जानकारी लेती रही. पता चला भवन को गिराने की बाते बेबुनियाद थी . कुछ साल बाद उस भवन का नवीकरण किया गया..बरामदे में टाइल्स लगा दिया गया...रंग-रोगन किया गया....नया नाम 'वीर कुंवर सिंह संग्रहालय' हो गया है. युवा वहा बैठकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते है...सुनकर अच्छा लगता था...

कचरे का अम्बार
कुछ दिनों पहले वहा गयी...बहुत खुश थी...एक तो यादे दूसरा इमारत की ऐतिहासिकता बेचैन किये थी...बाहर से देखा तो ठीक-ठाक लगा ...सुकून मिला..जैसे ही अन्दर कदम रखा भीषण दुर्गन्ध ने रास्ता रोक लिया  ..बहुत हिम्मत कर अन्दर गयी...देखा की सीढियों पर कचरे का अम्बार लगा था..ऊपर की मंजिल पर बरामदे में कुछ युवा बैठे थे....वह ज़गह साफ़-सुथरी थी..पर हॉल के दृश्य ने रुआंसा कर दिया..चारो ओर कूड़ा पसरा था..ड्रग्स की सूई भी दिखी...लोगो ने हॉल और कमरों को शौचालय में तब्दील कर दिया था ,  जो मल-मूत्र से भरा था...दीवार टूटी हुई थी..बाहर पहले की ही तरह झाड़ उगे हुए थे... इमारत के दूसरे हिस्सों का भी यही हाल था....नए नाम 'वीर कुंवर सिंह संग्रहालय' के अनुरूप कुछ भी नहीं था ...संग्रहालय के नाम पर यह लोगो के साथ किया गया छल है...क्यूंकि एक भी ऐसी चीज़ यहाँ नहीं थी जो संग्रहालय को चरितार्थ करे... यह सब देखने के बाद मन बहुत भारी हो गया....

कचरे का अम्बार,  टूटी दीवार
आरा हाऊस 'कॉलेज प्रशासन' के अधीन है ...इस धरोहर की देख-रेख की  जिम्मेदारी इसी की है...ऐसा भी नहीं दोनों की दूरी ज्यादा है...या कॉलेज के पास इतना भी वित्त नहीं की इसकी नियमित सफाई हो सके ...फिर क्यूँ है इसकी नारकीय स्थिति? क्या कॉलेज  देशवासिओं के बलिदान का  प्रतीक इस भवन की जिम्मेदारी उठाने में अक्षम है ? पर जरा ठहरिये...दूसरों को दोषी ठहराने से हमारी जिम्मेदारी कम तो नहीं हो जाती...भोजपुर  के लोग 'कुंवर सिंह' के नाम की कसमे खाते है...गर्व करते हैं कि  हम उस माटी कि उपज है जहाँ के लोगो ने देश के लिए बलिदान दिया ..पर लगता यह सब झूठ है...दिखावा है...अन्यथा कही से तो आवाज़ उठाई जाती !...भले ही सफाई करने या करवाने के कर्त्तव्य प्रशासन  के सिर मढ़ कर हम खुश हो ले  पर  इससे गंदगी फ़ैलाने का लाईसेंस तो नहीं मिल जाता  ! ...इतनी जिम्मेदारी तो उठाई ही जा सकती है कि हम बलिदानियों  का सम्मान करे और इस भवन की उपेक्षा न करे , ...... क्यूँ !......

---स्वयम्बरा
www.swayambara.blogspot.com









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6 Comments:

At October 19, 2012 at 2:33 AM , Blogger boletobindas said...

ये कटु सच है कि जो नस्लें अपने इतिहास से परिचित नहीं होती वो नष्ट हो जाती है। देखिए बिहार सरकार की आंख कब खुलती है।

 
At October 19, 2012 at 4:07 AM , Anonymous Anonymous said...

BAHUT BADIA SUBJECT KO TOUCH KIYA HAI....

 
At October 20, 2012 at 12:23 AM , Blogger thusuk said...

arawalo ke liye ye best tyohar gift hai....kyoki ara house hamare liye ek pratik hai

 
At October 22, 2012 at 7:31 AM , Blogger ब्लॉ.ललित शर्मा said...

प्राचीन धरोहरों के साथ लोगों ने अभी तक बर्ताव करना ही नहीं सीखा है, उसके महत्व को नहीं जाना है, अज्ञानता मे वे प्राचीन संस्कृति एवं शिल्प का नुकसान कर रहे हैं, पता नही इस देश के लोग अपनी धरोहरों का सम्मान करना कब सीखेगें? जागरुक करती पोस्ट के लिए आपको साधुवाद, आभार.........

 
At October 23, 2012 at 8:36 PM , Blogger कविता रावत said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें

 
At October 23, 2012 at 10:19 PM , Blogger सतीश सक्सेना said...

इन धरोहरों का हमें ख़याल रखना चाहिए ! काश कुछ और स्वयम्बरा मिल जाएँ !
मंगल कामनाएं !

 

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