मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Sunday, June 9, 2013

डायरी के पन्ने

डायरी के पन्ने
दिनांक : 12.10.1998
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वह लावारिश लाश
पड़ी थी उधर
मुह खोले, टांग पसारे, हाथ फैलाये
सुना है कल रात किसी ने गोली मार दी उसे
यही बीच सड़क पर
तब भीड़ थी यहाँ
सुना है वह खूब चीखा, पुकारता रहा,
सबने अनसुनी, अनदेखी की,
भागते रहे गंतव्य की ओर,
झांकते रहे झिर्रियों से ,
जिसका चलन है शहर में
पुलिस आयी
लाल बत्ती, खाकी वर्दी, चमकते सितारे समेत,
उसके मरने तक खड़ी रही
इन्क्वायरी (?) के लिए
सुना है
वह लड़ता था ऊँची अट्टालिकाओं से
हक की लडाई
और कहते है,
इन्काउन्टर नहीं
मुठभेड़ हो गया, गुंडों का
मारा गया वह,
लोग गुजरने लगे है अब वहां से,
सफ़ेद रेखाओं के ऊपर से भी
पहियों, कदमो की धूल ने ढँक दिया  है
लाल धब्बों को,
अब तो ये भूली सी बात है
लोकतंत्र तो जनसमूह है न,
यहाँ अकेले की क्या बिसात है .

(जाने किस मनःस्थिति में इन शब्दों का सृजन हुआ था )

3 Comments:

At June 10, 2013 at 10:53 AM , Blogger Rajesh Kumari said...

आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ११ /६ /१ ३ के विशेष चर्चा मंच में शाम को राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी वहां आपका स्वागत है

 
At June 11, 2013 at 9:40 AM , Blogger expression said...

बेहद मार्मिक और सार्थक रचना....
मनोस्थिति का अंदाजा लगा सकते हैं......

अनु

 
At June 12, 2013 at 8:54 AM , Blogger स्वयम्बरा said...

आभार..:)

 

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