डायरी के पन्ने (05.03.2004) : मेरे शिशु मेरे नवगीत

साभार :  http://thebabypicz.com



मेरे शिशु मेरे नवगीत
जीवन बगिया के नन्हे फूल

गर्वित हर्षित ह्रदय मेरा
बन गया नवीन स्रष्टा तेरा,

मातृत्व -निर्झर में भींगा मन
हर पल सोचे कैसा है तू
मुझ जैसी  रुनझुन-पायलिया
या पौरुष का साकार रूप

नन्ही आंखे नन्ही बाहें
नन्हे अधरों की मुस्काने
है अभी कल्पना मेरी
पूरी होगी ये मन जाने

आये जो तू आँचल में मेरे
जी लुंगी फिर बचपन इक बार
तेरी स्मिति में ढूँढूँगी
अपना चेहरा, उनकी मुस्कान

हौले-हौले, चुपके-चुपके
कैसे आया तू जीवन में
अभी-अभी तो जाने था कहाँ
अभी-अभी कह गया तू 'माँ'

अपनी तुतलाती बोली से
'माँ' कहकर देगा ऐसी ख़ुशी
सारे-सारे सुखों में भी
जो कभी किसी को नहीं मिली


मेरी प्रतिकृति मेरा रक्त मांस ,
पल-पल जोहे तुझको ये साँस
पल-पल की ख़ुशी, पल-पल जीवन
पल ही पल में, पूरी होगी आस

......इसे अपनी अत्यंत प्रिय सखी को  लिखकर उपहारस्वरूप दिया था...वह 'माँ' बननेवाली थी...और उसकी ख़ुशी में 'मै' बावली हुए जा रही थी ....क्या दिन थे वे भी ...:)

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