मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Saturday, October 5, 2013

ख्वाहिशे

















सुनो,
कभी ऐसा भी तो हो
कि इक सुबह 
चल पड़े हम नंगे पांव घास पर,
बटोरे
ढेर सारी ओस की बूंदे
कभी 
भींग जाये बरिशो में
गुनगुनाए एक गीत
चल पड़े 
किसी ओर, कही भी
बस, हम और तुम
बैठे रहे इक नाव पर
करते रहे बाते
खामोशियो मे
छत के उस कोने से
देखते रहे, ढलता सूरज 
साथ-साथ
कभी मै बोलु और तुम सुनो
सुनते रहो मुझे, 
थामे हुए मेरा हाथ
इक आखिरी ख्वाहिश भी है
वह तो सुनो
कभी ऐसा हो,
कि तुम्हारी गोद में सिर रखकर
पढ्ती रहू 'अमृता' को
तुम,
गुनगुनाते रहो एक ग़ज़ल
और ...और
उस पल मे ही 
थम जाये सबकुछ
बंद हो जाये मेरी पलके
हमेशा-हमेशा के लिये
........स्वयम्बरा

2 Comments:

At January 15, 2014 at 8:00 AM , Blogger Siddharth Vallabh said...

Nice !!

 
At February 6, 2014 at 8:32 AM , Blogger स्वयम्बरा said...

Thank you Siddarth Vallabh ji

 

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