मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Thursday, February 6, 2014

साँझ नही प्रतिबिम्ब है मेरा

my click
साँझ  नहीं
प्रतिबिम्ब है मेरा
डूबते सूरज के साथ
तिरोहित मै ही होती हूँ
आकाश का लाल रंग है न
लहू है मेरी ख्वाहिशों का,
लौटते परिंदे
कुछ और नही
अकुलाया मन है मेरा
जो 'घर' को तलाशते फिरते है
प्रारब्ध के गहराते अंधेरे
धीरे-धीरे
लील जाते है सबकुछ
और मै
स्तब्ध देखती रह जाती हूँ
समय-चक्र की इस बाज़ीगरी को 
(बस एक चुप सी लगी है ...)



0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

Links to this post:

Create a Link

<< Home