साँझ नही प्रतिबिम्ब है मेरा

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साँझ  नहीं
प्रतिबिम्ब है मेरा
डूबते सूरज के साथ
तिरोहित मै ही होती हूँ
आकाश का लाल रंग है न
लहू है मेरी ख्वाहिशों का,
लौटते परिंदे
कुछ और नही
अकुलाया मन है मेरा
जो 'घर' को तलाशते फिरते है
प्रारब्ध के गहराते अंधेरे
धीरे-धीरे
लील जाते है सबकुछ
और मै
स्तब्ध देखती रह जाती हूँ
समय-चक्र की इस बाज़ीगरी को 
(बस एक चुप सी लगी है ...)



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