मेरे तुम !


तुमने कहा
अकेले हो जाते हो
जब नही होती पास तुम्हारे
फिर तुम कह्ते हो
एकाकार हो मुझसे
आत्मा हूँ तुम्हारी
सुनो तो,
यह कैसी अजब बात है
अकेले होने का अह्सास
और एकत्व
अलग नही एक-दूसरे से?
लेकिन शायद यह ठीक भी है
क्युंकि तुम खुद भी विरुद्धो का सामंजस्य हो
बिल्कुल मेरे आराध्य की तरह
.......स्वयम्बरा
( विरुद्धो का सामंजस्य 'भगवान शंकर' के लिये कहा जाता है)

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