कर्फ्यू -लघु कथा

खूब धूमधाम से विसर्जन संपन्न हुआ। नगाड़े बजे । जयकारे लगे। लाउडस्पीकर पर फ़िल्मी गाने भी बजे। भक्तगण नाचते -गाते- झूमते गए भी।

अब जाके चैन आया तो थकान का अहसास हुआ। लगा कि दस दिनों की जोरदार भक्ति के बाद थोड़ा मनोरंजन तो बनता है ।

तो अख्तर के ठेके पर मिलना तय हुआ। खा के, पी के तृप्त हो गए तब बचे पैसे का हिसाब शुरू हुआ। सब ठीक चल रहा था कि ललन अटक गया। उसने ज्यादा चंदा काटा था तो हिस्सा भी ज्यादा चाहिए था।

बहस से शुरू हुई बात गाली-गलौज से होती हुई लाठी-डंडे पर उतर आयी।अब गुत्थम-गुत्था होने लगा। घमासान चल ही रहा था कि ललन ने कब कट्टा निकाला और कब दाग दिया, पता ही न चला। गोली, बीच-बचाव कर रहे अख्तर को जा लगी।

आज पांच दिन हो गए हैं। हिन्दू-मुस्लिम दंगा हो गया था। कई लोग मारे गए। कितनी दुकाने जला दी गयीं .....और उसी दिन से शहर में कर्फ्यू जारी है....

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