कच्ची धूप

बहुत रोई थी उस दिन घर आकर, जब जूलॉजी (इंटर) के क्लास में बेंच पर किसी ने लिख दिया था लव यु स्वयम्बरा....सहपाठियों (लड़कियों ने ही) ने दिखाया...फिर कलम से स्याही गिराकर उसे पोत दिया ताकि मेरी बदनामी(?) न हो...😂

मुझे भी लगा कि किसी ने सरे बाजार मेरी इज्जत उछाल दी...अजीब से ख्याल आने लगे थे कि पापा-मम्मी को पता चल गया तो ...मैंने तो उनका विश्वास ही खो दिया है...मानो ये कितनी भयानक गलती हो गयी हो...जबकि लिखनेवाले का पता तक नहीं था....

कुछ दिनों तक रोती रही थी...कॉलेज जाने की हिम्मत नहीं थी...असल में बहुत संकोची थी उन दिनों...एकदम शर्मीली..खुद को गलत मान लिए जाने के डर से किसी से कह भी न पाई...ऐसी ही कुछ और घटनाएं हुई...

परिणाम ये हुआ कि लड़कों से घबराने लगी.. लो सेल्फ एस्टीम की शिकार..संकोच अब अति संकोच में बदल गया...हालांकि बाद में मेरी खुद से खुद की लड़ाई शुरू हुई और स्वयं को पूरी तरह बदल दिया...

और अब, पिछले दिनों मेरी एक स्टूडेंट हाथ में एक पूर्जा लिए रोती हुई आयी...किसी ने लिख दिया था उसके नाम के साथ किसी का नाम...

मुझे सब कुछ याद आ गया....असल में इस उम्र की सबसे बड़ी परेशानी खुद को ही गलत समझ लिए जाने की होती है...... ये डर इतना ज्यादा कि बच्चे स्वयं को हानि भी पहुंचा दे..भावुकता भी अत्यधिक ... एकदम अनियंत्रित...इतनी कि उसके सैलाब में सबकुछ बह जाए.....

 ऐसे में बच्चों को एक ऐसा साथ चाहिए जो उनपर पूरा विश्वास होने का भरोसा दे सके ..जो उन्हें तसल्ली दे कि गलत हो या सही हम हर पल  तुम्हारे लिए खड़े है.... तो तुम जो चाहो, गलत या सही मुझसे कह सकते/सकती हो...कुल मिलाकर ये कि उनका सच्चा दोस्त बन जाने की कोशिश की जानी चाहिए...

तो शायद अपने बच्चों से खूब बातें करने का ही ये परिणाम था कि ये  बच्ची बिना झिझक मेरे पास आ गयी.... उसे चुप कराया....खूब इधर- उधर की बातें की..फिर शुरू हुई काउंसलिंग...

अंततः उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी...राहत भरी मुस्कान..शायद उसे विश्वास हो रहा था कि कोई और उसे समझे न समझे मैं हूँ उसके साथ....तो कभी भी, कही भी, बेझिझक वह कुछ भी कह सकती है...

सुकून तो मुझे भी मिल रहा था जैसे मैंने खुद को ही सहलाया, दुलराया हो...आश्वश्त किया हो कि कोई हो न हो मैं हूँ न....

😊😊😊

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