Sunday, June 29, 2008

हम औरते


हम औरते,
खिलखिलाते बचपन से ही,
तुमसब की तथाकथित इज्जत का सलीब
अपने नरम कांधों पर ढोते-ढोते,
झुर्रिया बन जाती हैं
हम
जिनके घर से बाहर निकला एक कदम
पूरे स-मा-ज के,
पतन का कारण बन जाया करता है
हम औरतें
जिनकी सांसे,
चलती  हैं अनुमति से 
बचपन में पिता
जवानी में पति
बुढ़ापे में बेटा
देते हैं अनुमति जीने की
हमारे जीने का आधार है हमारा शील
जिसका भंग होना,
निर्मम मौत का सबब होता है
हम औरतें,
जिन्हें वो,
देवी कहकर चुप रहने को करते हैं क्रूर इशारे
ताकि उन्हें मिले आज़ादी,
ताजिंदगी
और करते रहें हम बर्दाश्त,
उनकी सारी ताड़नाएं
हम औरते,
बुनती हैं सलाईयों पर,
अपने सपने
सिलती हैं बारम्बार,
अरमानो के चीथड़े 
भींगी आँखों से पोंछती हैं तुम्हारे आँसू
पर तुम नोचते हो 
हमारा ही जिस्म
हमारी रूह
हमारा 'पूरा का पूरा' वजूद

2 comments:

yawnika said...

पुरूष प्रधान समाज में ये कोई नई बात नहीं हैं नारी के भावनाओ की एक नारी ही बखूबी समझ सकती हैं । काफी दर्द हैं कविता में संघर्षशील ,त्यागी जीवन, ममतामई जीवन, प्यार भरा जीवन सब का सब नारीओं में भरा होता हैं कह सकतें हैं समाज में दिखने वाला सच्चाइयों भरा सच हैं । कोटिकोटि श्रधा कोटि कोटि नमन स्नेहमई , ममतामई , करुनामई नारी को और आपको लिखती रहें ............. इंतजार है नई रचना का ..........................

मीत said...

जिनकी सांसे chalati हैं अनुमति se
बचपन में पिता
जवानी में पति
बुढ़ापे में बेटा
देते हैं अनुमति जीने की
bilkul satya hai..
par ham sab chahein to ise badal sakte hain...