मैं और मेरी दुनिया

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी है सबकी दुनिया

Monday, August 25, 2008

दीपक, बुलंद इरादोवाला एक बच्चा


दीपक, एक ऐसा बच्चा जिसने मुझे जिन्दगी जीने कि प्रेरणा दी .कुदरत ने उसके साथ नाइंसाफी की है. वो गूंगा और बहरा है. पर उसके हौसले  हिमालय जैसे बुलंद हैं . उन दिनों मै सिविल सेवा के लिए इंटरव्यू में चयनित नही होने के कारन हताश थी. इसी समय मुझे इस मासूम के बनाये चित्रों की प्रदर्शनी में बुलाया गया. अनमने ढंग से देखने गई. दीपक और उसके बनाये चित्रों को देखकर अवाक् रह गई. हँसता-मुस्कुराता वह बच्चा कितनी आसानी से अपनी विकलांगता को ठेंगा दिखा रहा था और मै एक छोटी सी हार से हताश हो गई थी. उस बच्चे के इरादों ने मुझे फिर से लड़ने के लिए तैयार कर दिया. जैसे कि एक भयानक सपना देखकर जाग गई. घर आई तो मेरी लेखनी खुद ब खुद चल पड़ी, जिसने दीपक के ऊपर लिखी गई कविता का रूप ले लिया-

तू विधु शीतल कोमल-कोमल,
नन्हा-दीपक निर्झर झर-झर
असाधारण-अखंड -ज्योति तू जो
जलता है हरदम हर-हर पल
या की सतजुग का कोई ऋषि
उस, निराकार का अभिलाषी
या 'दिनकर' का तू 'रश्मिरथी'
संघर्षशील पुरुषार्थ वही
ना-ना तू है वो 'निराला-राम'
तम्-रावण को हरता हर कही
या जन्मा तू अवतार कोई
कहने महत्ता 'ढाई-आखर' की ,
कि मै औ' तू की भिन्नता छोड़ो
हो जाओ प्रकृति से एकाकार
आकृति, रंग ,तूलिका तेरे
देते ये संदेसा बार-बार
दीपक प्रज्जवल हो ज्वलित बन
जला कलि के सारे तम् को
करके झिलमिल-झिलमिल-झिलमिल
दिखलादे राह भटके हुए को
तू है दीपक, दीपक है तू
गुण-नाम धन्य स्रष्टा बनकर
अपनी चित्रों की पूर्णता से
बन जा तू भी संपूर्ण भास्कर

3 Comments:

At August 25, 2008 at 5:37 AM , Blogger मीत said...

दे राह भटके हुए को
तू है दीपक,दीपक है तू
गुन-नाम धन्य स्रष्टा बनकर
अपने चित्रों की पूर्णता से
बन जा तू भी संपूर्ण भास्कर
bahut khubsurat lekh se parichay karaya hai apne...
shukriya apka...
bahut cha likha hai
badhai

 
At August 25, 2008 at 7:29 AM , Blogger संगीता पुरी said...

आपकी माने तो वो अँधा ,गूंगा और बहरा है.पर उसके होसले हिमालय जैसे बुलंद हैं , उसका नाम जिसने भी दीपक रखा , बहुत अच्छा किया। आपके जैसे न जाने कितने लोग उससे प्रोत्साहित होकर आगे बढ़ने में कामयाब होंगे।

 
At August 25, 2008 at 11:33 PM , Blogger Bandmru said...

हो जाओ प्रकृति से एकाकार
आकृति, रंग ,तूलिका तेरे
देते ये संदेसा बार-बार
दीपक प्रज्जवल हो ज्वलित बन
जला कलि के सारे तम् को
करके झिलमिल-झिलमिल-झिलमिल
uttam- ati uttam lajwab.
dhanya ho deepak......

bhaut achchha likha hai aapne...

badhai

 

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